Friday, 20 November 2015

आत्मनिर्णय से वंचित स्त्री की मानसिक गुलामी




वर्तमान समय में यह देखा जा रहा है कि आज़ादी से पहले स्त्रियों की स्थिति समाज में जैसी थी, आज़ादी के अड़सठ साल बाद भी उसमें बहुत गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है। स्त्रियां स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, शिक्षित होकर उच्च पदों पर नियुक्त हो रही हैं लेकिन ज़्यादातर स्त्रियों के व्यक्तित्व में अभी भी आत्मविश्वास का अभाव बना हुआ है। अभी तक स्त्रियां पुरुषों के निर्णयों को ही सर्वोपरि मानकर जीवन के समस्त क्षेत्रों के मुख्य फैसले पुरुषों के फैसलों पर निर्भर रहकर ही ले रही हैं। अभी स्त्रियों का जीवन घर की चौहद्दी तक सीमित नहीं हैं; वे उस घेरे से बाहर निकल चुकी हैं। उन्होंने समाज को देखा-समझा है लेकिन अधिकतर स्त्रियां अपना निर्णय स्वयं लेने का अधिकार व क्षमता अब तक हासिल नहीं कर पाई हैं। उनके पहनावे से लेकर खान-पान तथा नौकरी में भी प्रेमी या पति के राय तथा इच्छा-अनिच्छा की बड़ी भूमिका होती है। स्त्रियां जीन्स पहने या साड़ी, कुर्ती पहने या सलवर-कमीज़, रंगीले-भड़कीले कपड़े पहने या सादा कपड़े, ज़्यादा सजकर घर से निकले या कम सजकर, चावल खाए या रोटी, वेज खाए या नॉन-वेज आदि-आदि निर्णय प्रेमियों/पतियों की हिदायतों के मुताबिक ही प्रेमिकाओं/पत्नियों के नित्यकर्म में शामिल हो रहा है।
 
ऐसी भी स्त्रियां हैं जो केवल संसार(घर) बसाने के उद्देश्य से ही नौकरी छोड़ रही हैं या पुरुष(पति) जिस तरह की नौकरी पसंद करता है या करने की अनुमति देता है, वैसी नौकरी ही स्वीकार कर लेती हैं। पति जिस –जिस तरह से अपनी और अपने पत्नी के संसार और जीवन को सजाना चाहता है उसी अनुरूप स्त्रियां भी परिचालित हो रही हैं और पुरुषों की हां में हां कर रही हैं। स्पष्ट है कि स्त्रियों के पास स्वायत्त निर्णय और अस्मिता-बोध का भयानक अभाव सामने आया है। सवाल उठता है कि क्या स्त्री-शिक्षा का उद्देश्य स्त्रियों को जीती-जागती गुड़िया में रूपांतरित करना है? क्या स्त्री-शिक्षा का अर्थ शिक्षित किंतु पति की आज्ञाकारी पत्नी बनाना है? क्या स्त्री-शिक्षा का अभिप्राय बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षित पत्नी का निर्माण करना लेकिन उसे पुरुषों के हिसाब से परिचालित कराना है?
ये चिंता की बात है कि शिक्षित होकर भी आधुनिकाएं आज्ञाकारी बेटी और पत्नी और प्रेमिका बन रही है यानी शारीरिक तौर पर आज़ाद होकर भी मानसिक गुलामी की शिकार हैं। हालांकि इस आज्ञाकारिता को हमारे प्राचीन पितृसत्ताक परिवार-व्यवस्था में बहुत सम्मान दिया जाता रहा है और आज भी आज्ञाकारी होना सबसे बड़ा गुण माना जाता है। लेकिन इस आज्ञाकारी मनोवृत्ति ने स्त्रियों की कितनी क्षति की है; उसका जितना भी बखान किया जाए वह कम है। इस आज्ञाकारिता ने स्त्री के व्यक्तित्व में कोई भी मूलभूत परिवर्तन नहीं होने दिया। वह हर बात में ‘हां’ कहनेवाली तथा अपनी बुद्धि का एक-तृतीयांश भी खर्च न करने वाली आज्ञाकारी गुलाम बनती जा रही है।

किसी भी प्रकार का निर्णय लेने के लिए बुद्धि, विवेक और अनुभव महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन जब स्त्रियां गुलाम मानसिकता में जीएगी तब इनके उपयोग की ज़रूरत ही महसूस नहीं होगी कारण सारे निर्णय पुरुष लेंगे और स्त्रियां उसे अनुसरण करने वाली आज्ञाकारी पत्नी बनी रहेगी। जाहिर है फिर स्त्रियां एक ऐसी गुलाम मानसिकता को समृद्ध कर रही है जो बुद्धि रहते हुए भी बुद्धिहीन, विवेक रहते हुए भी विवेकहीन और आत्ममर्यादा रहते हुए भी आत्ममर्यादाहीन है। वह चलती-फिरती गुड़िया में रूपांतरित हो रही है जो हंसती है, बोलती है, खाती है, कमाती है लेकिन ‘ना’ नहीं कहतीं। कारण ‘ना’ प्रतिवाद है और प्रतिवाद आज्ञाकारिता का विलोम रचता है। स्त्रीवादी ‘ना’ पुरुषवाद के लिए खतरा है। आज्ञाकारी स्वभाव पुरुषों को विशेष प्रिय होता है लेकिन स्त्रियों के व्यक्तित्व के विकास के लिए यह नुकसानदेह है। इस आज्ञाकारिता के कारण ही स्त्रियां अब तक पुरुषवाद के वैचारिक व दैहिक गुलामी का शिकार बनती आई है तथा अपने अधिकार व स्वायत्ता को समझने में असमर्थ रही है।

स्त्रियों के संदर्भ में शिक्षा का पहला अर्थ है अज्ञान से मुक्त होकर ज्ञान से रूबरू होना, दूसरा अर्थ है पुंसवादी गुलामी से मुक्त होना। यह मुक्ति केवल पुरानी श्रृंखलाओं से ही नहीं है जो अनादि काल से स्त्रियों के ईर्द-गिर्द बना हुआ है बल्कि उन मानसिकताओं से भी है जो स्त्रियों को परवश बनाती आई है। उन विचारधाराओं से भी है जो स्त्रियों को गुलाम बनाती आई है और उस दृष्टिकोण से भी है जो स्त्री-अस्मिता की पहचान और उसके विकास में लगातार बाधा बनती रही है। शिक्षा का सही कार्यान्वयन तब होगा जब पुरुषों की अधीनता वाली मानसिकता से स्त्रियां अपने आप को मुक्त करके जीवन में सही निर्णय ले सके व हर बात पर पुरुषों पर निर्भरशील ना हो। अपनी स्वतंत्र अस्मिता व अस्तित्व का स्वायत्त ढंग से विकास करें तथा अपने जीवन के फैसले स्वयं लें।

Saturday, 20 December 2014

बलात्कार के नए औज़ार— सारदा बैनर्जी


सोलह दिसम्बर, 2012 को मेडिकल की छात्रा निर्भया के साथ जिन अमानवीय हरकतों को किया गया उतने ही 'अमानवीय तरीके से बलात्कार करने' की धमकी देते हुए और रॉड जैसे हथियारों को साथ रखकर उसके ज़रिए दहशत पैदा करते हुए अब दूसरी लड़कियों के साथ बलात्कार को अंजाम दिेया जा रहा है। नृशंस बलात्कार की पुरानी घटनाएं अब होने वाले बलात्कार के समय औज़ार के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इसे बलात्कार के नए औज़ार के रूप में देखा जाना चाहिए। हाल में ही दिल्ली में उबेर नामक कंपनी के कैब में एक सत्ताइस साल की युवती के साथ कैब के ड्राइवर ने इसी युक्ति का सहारा लेते हुए बलात्कार किया। हरियाणा के हिसार ज़िले में बी.ए. के फार्म के लिए फॉटो खिंचवाने स्टुडियो पहुंची एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसका वीडियो बनाया गया और फिर वीडियो के ज़रिए लगातार तीन साल तक पीड़िता को ब्लैकमेल किया गया। पीड़िता ने साहस करके हाल में घटना का खुलासा किया है।
निर्भया बलात्कार कांड के अपराधियों को सज़ा दी गई। लेकिन इसके बाद भी देखा जा रहा है कि लगातार बलात्कार के वारदात होते रहे हैं। इन सारी घटनाओं ने पुराने सवालों को दोबारा उठाने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर स्त्रियां देश में कितनी सुरक्षित हैं? क्या स्त्रियों के पक्ष में दो-तीन कानून बना देने भर से ही स्त्रियां सुरक्षित हो जाएंगी? क्या समाज के गली-चौराहे कभी स्त्रियों के अनुकूल नहीं होंगे? निश्चिंत होकर कब स्त्रियां अपने घर पहुंचेगी? कब मर्द अपनी घिनौनी विचारधारा से मुक्त होगा?
निर्भया कांड ने पशुवत आचरण और हृदय रखने वालों को कितना संवेदनशील और मानवीय बनाया और बलात्कार जैसे अपराध के प्रति उन्हें कितना सचेत और सजग किया ये अब संशय के घेरे में है। शायद आए दिन आने वाली बलात्कारों की खबरें इन विकृत मानसिकता रखने वालों के लिए ईंधन का काम कर रहे हों ये भी संभव है कि जिन बर्बर बलात्कार की घटनाओं को अखबारों में पढ़कर हम सचेत और संवेदनशील नागरिक शर्मसार होते हों, वही खबरें इन पाशविक वृत्ति संपन्न इंसानों को नई ऊर्जा देती हो, नए औज़ार से लैस होकर ये बस बलात्कार करने का मौका तलाशते हों। यही वजह है कि किसी स्त्री को देखते ही सारी सभ्यताओं को तिलांजली देकर ये पुरुष अपने आदिम बर्बर रूप में आ जाते हैं जहां से स्त्री इन्हें केवलमात्र भोग्या के रूप में दिखाई देती है। सोचनेवाली बात है कि स्त्री-अनुभूति, स्त्री-संवेदना को दरकिनार कर स्त्री को केवलमात्र भोगवादी दृष्टि से देखने की यह आदिम प्रवृत्ति आई कहां से? क्या इसके लिए हम अशिक्षा को जिम्मेदार ठहराए? लेकिन बलात्कार जैसे अपराध तो एक बड़े शिक्षित समूह द्वारा भी निष्पन्न किए जा रहे हैं। फिर क्या हमारी शिक्षा-व्यवस्था में समस्या है? लेकिन ये समस्या आई कहां से? इसके कारण की पड़ताल करेंगे तो पता चलेगा कि इसके लिए सदियों से चली आ रही पितृसत्ताक विचारप्रणाली और पुसंवादी विचारबोध जिम्मेदार है जिसने समाज में उपभोग के अलावा किसी और रुप में स्त्री को देखने-समझने का मौका नहीं दिया। स्त्रियों के भोगवादी रूप को लगातार सामने रखा लेकिन एक इंसान के रूप में स्त्री की उपस्थिति को कभी दर्ज नहीं क्या गया, यही कारण है कि स्त्री-अस्मिता का विकास नहीं हो पाया। स्त्री-वजूद को सख्त बेड़ियों में बांधकर उसके स्त्री-अस्तित्व के मूल्य को बेहद संकुचित कर दिया गया।
ये हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि टेलीविज़न पर बलात्कार जैसी घटनाओं की अहर्निश निंदा हो रही है, बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों को केंद्र में रखकर विभिन्न बुद्धिजीवियों के बीच सवांद आयोजित किए जा रहे हैं, सोश्यल साइट्स में बलात्कार के खिलाफ़ खूब लेख लिखे जा रहे हैं, बलात्कार-पीड़िता के प्रति संवेदनावाक्य प्रकट हो रहा है, बलात्कार के अपराधी पर तीखे शब्दबाण बरसाए जा रहे हैं लेकिन बलात्कार है कि रुकने का नाम नहीं ले रहा। रुकना तो दूर की बात, बलात्कार नए-नए रूपों में, नए-नए तरीकों में, नए-नए औज़ारों के साथ, नित्यनूतन परिवेश में हर दिन दाखिल हो रहा है और हमारे देश की समाज-व्यवस्था की अक्षमता और असुरक्षा को जाहिरजहान कर रहा है। स्त्रियों के सामने नई-नई चुनौतियां उछाल रहा है और स्त्री-सुरक्षा को कठघरे में खड़ा कर रहा है।
हाल की परिस्थितियां यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि हमारे देश की सरकारें(केंद्र और राज्य) बलात्कार को रोकने में नाकाम हैं। बलात्कारियों को तुरंत सज़ा देने में भी असमर्थ हैं। निर्भया कांड को हुए दो साल पूरा हुआ लेकिन आज भी बलात्कार की घटनाएं नहीं थम रही। देश में स्त्रियां आज भी सुरक्षित नहीं है, सम्मान की नजर से नहीं देखी जा रहीं। ऐसी अवस्था में प्रशासन या सरकार से किसी भी प्रकार की अपेक्षा रखना बेमानी है। अभी ज़्यादा ज़रूरी है कि स्त्रियां मानसिक रूप से मज़बूत हों। राह चलते समय स्त्रियों को अपनी बुद्धि-विवेक का भरपूर प्रयोग करना होगा जिससे आने वाले खतरों को भांपकर उसी अनुसार कदम उठाया जा सके। अगर जरूरत पड़े तो कानून की हर तरह से मदद ली जाए। स्त्रियों को अपने दिल-ओ-दिमाग़ में यह साफ़ रखना है कि उन्हें अपना रास्ता खुद निकालना है, कोई और नहीं है जो उनकी मदद करे। इस दैनंदिन संघर्ष को जीवन का अंग मानकर, जीवन जीने का तरीका मानते हुए स्त्रियों तो आगे कदम बढ़ाना है।


Wednesday, 9 April 2014

किसानों की आर्थिक बदहाली और फलस्वरूप ‘आत्महत्या’ – सारदा बैनर्जी

           
देश में किसानों की आर्थिक बदहाली और उसके परिणामस्वरूप उनकी आत्महत्या की घटनाएं पिछले दो दशकों से एक बहुत बड़ी चुनौती के रुप में सामने आया है। यह बेहद परेशान करने वाली घटना है कि देश का प्रमुख उत्पादक वर्ग एवं देश की अन्नदाता शक्ति गरीबी और आर्थिक तनाव का बुरी तरह से शिकार हैं और इसकी मार को झेलने में असमर्थ, लगातार आत्महत्या के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा रह गया है।



ध्यानतलब है कि सन् 1990 से किसानों की आत्महत्या की खबरों ने लगातार समाचारों में जगह बनाई है। सर्वप्रथम महाराष्ट्र से किसान आत्महत्याओं की खबरें सामने आई। इसके बाद भारत के विभिन्न राज्यों से लगातार आत्महत्या की घटनाएं दर्ज होती गईं। एन.सी.आर.बी. (नैशनल क्राइम रेकार्ड्स ब्यूरो) के मुताबिक सन् 1995 से सन् 2010 तक भारत में कुल 256,913 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं।
भारत के अंतर्गत महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्णाटक, केरल और पंजाब जैसे राज्यों में किसान-आत्महत्याएं ज़्यादा हुई। नैशनल क्राइम रेकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक सन् 2006 में अकेले महाराष्ट्र में 4,453 किसानों की आत्महत्या की घटनाएं हुई जो देश में हुई कुल आत्महत्याओं(17,060) की संख्या का एक-चौथाई हिस्सा था। सन् 2008 में भारत में कुल किसान-आत्महत्याओं की संख्या 16,196 थी तो सन् 2009 में बढ़कर 17,368 हो गई। सन् 2010 में यह संख्या 15,964 हुई। सन् 2011 में यह संख्या 14,027 दर्ज हुआ। सन् 2013 में यह संख्या घटकर 11,700 दर्ज हुआ। सन् 2014 में 5,642 दर्ज हुआ।एन. सी. आर. बी. के अनुसार भारत में हर दिन 46 किसान आत्महत्या करते हैं। इन राज्यों के अतिरिक्त पश्चिम बंगाल जिसे ‘राइसबोल ऑफ़ ईस्ट’ कहा जाता है, में भी किसानों ने बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं की है जिनमें से अधिकतर किसान बर्धमान जिले से संबंधित हैं। बैंकों से लिए गए उधार का ब्याज चुकाने में असमर्थ तथा अपने पैदावार के अत्यधिक कम मूल्यों से परेशान होकर इन किसानों ने अपने प्राण त्याग दिए। इनके अतिरिक्त छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में भी आत्महत्या की घटनाएं हुई।

सन् 2002 में कारगिल(Cargill) और मॉनसैन्टो(Monsanto) कंपनियों ने भारतीय बाज़ार में जी.एम. बीज का प्रचार किया। ये सर्वप्रथम गुजरात में प्रयुक्त हुआ, धीरे-धीरे ये बाज़ार में फैलता गया और देशी कपासों की तुलना में जेनेडिकली निर्मित बी.टी. कपासों (Bt cotton) का प्रयोग ज़्यादा होने लगा। इन्हें कंपनियों से खरीदने में किसानों को भारी कीमतें चुकानी पड़ती है। उदाहरण के लिए, सन् 1991 में किसानों को देशी कपास का बीज 6 रुपया प्रति किलो की दर से प्राप्तहोता था लेकिन सन् 2014 में बी.टी. कपासों का वही बीज 4500 रुपया प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है। इससे किसानों की सुविधाओं का अनुमान किया जा सकता है। दूसरी समस्या, इन बीजों की उपज के लिए सिंचाई की ज़रूरत होती है यानि ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है, ज़्यादा कीटनाशकों और उर्वरकों की ज़रूरत होती है लेकिन पैदावार उस तुलना में कम ही होता है हालांकि इन्हें बाज़ार में प्रचार करते समय ये कहा गया था कि इसके पैदावार की संख्या देशी कपासों की तुलना में कई गुणा अधिक होगा। तीसरी समस्या, सिंचाई की सुविधा कमसंख्यक किसानों के पास है। अधिकांश किसान फसलों के लिए बरसात के पानी पर ही निर्भर रहते हैं। वर्तमान में जलवायु में आए विभिन्न बदलावों के कारण अक्सर बारिश ठीक से न होने से या सूखा हो जाने के कारण फसल मुरझा जाते हैं या मर जाते हैं, इससे किसानों की व्यापक हानि होती है। किसान ऋण की चपेट में आ जाते हैं और इस कर्ज को चुकाने का कोई वैकल्पिक माध्यम उनके पास नहीं होता। फलतः कोई उपाय न देख वे आत्महत्या की शरण लेते हैं। इसके अतिरिक्त पंजाब में किए गए एक शोध से ये भी पता चला है कि पंजाब के कई इलाकों में किसानों को कीटनाशकों के प्रयोग का सही मात्रा का कतई अनुमान नहीं है। फलतः वे अत्यधिक मात्रा में इन विषाक्त रसायनिकों का प्रयोग करते हैं जो कई बार उनकी मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार ठहरता है। इस तरह की घटनाएं आंध्र प्रदेश में भी देखने को मिली है, खासकर कपास-उत्पादक किसान इसके शिकार हुए हैं क्योंकि कपास के उत्पादन में कीटनाशकों की ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है।



बैंकों की सुविधाओं का न होना भी किसानों के लिए एक बड़ी मुसीबत है। सन् 1993 से ही बैंकों की ग्राम्य शाखाएं बंद कर दी गईं और शहरी इलाकों में जाकर शाखाएं खोली गई जहां विकास और प्रौद्योगिकी की सुविधाएं उपलब्ध थी। इससे किसानों और गांववासियों को निश्चित तौर पर असुविधाओं का सामना करना पड़ा। इधर गांवों में जो चंद बैंक बचे थे और हैं, वे किसानों को उधार नहीं देना चाहते। किसानों को हाई-टेक बीज और रसायन की खरीददारी के लिए सरकारी सुविधा के अभाव में गैर-सरकारी साहूकारों से उधार लेना पड़ता है और ये लोग अत्यधिक ब्याज-दर मांगते हैं। जायज़ है इन उधारों को लेने के चक्कर में कोई उपाय न देखकर किसान अपनी ज़मीन गिरवी रख देते हैं। अब अगर फसल खराब होते हैं तो किसानों का सब कुछ तबाह हो जाता है। न फसल बिकती है और न कर्ज चुकाने का कोई उपाय ही बचा रहता है। फलतः उन्हें न चाहते हुए भी साहूकारों का नौकर हो जाना पड़ता है। अंततः चिंताओं का बोझ सहन करने में असमर्थ होकर ये किसान कीटनाशक खाकर अपना प्राण स्वाहा कर देते हैं।


जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी तो उन्होंने किसानों की विविधमुखी समस्याओं को देखते हुए महाराष्ट्र के ‘विदर्भ’ इलाके में दौरा किया और केंद्र सरकार की तरफ़ से 110 अरब के आर्थिक पैकेज की घोषणा की। आत्महत्या करने वाले किसानों के घरों को भी एक-एक लाख रूपए देने की घोषणा हुई। यहां तक कि भारत सरकार ने पूरे देश के किसानों के कर्ज माफ़ कर दिए गए ताकि कर्ज के बोझ से पीड़ित किसानों को आत्महत्या से किसी तरह रोका जाए लेकिन देखा गया कि इसके बाद भी आत्महत्याओं की संख्या में कोई खास कमी नहीं आई। सवाल ये है कि सिर्फ कर्ज माफ़ कर देने भर से ही क्या किसानों की ज़िंदगी में परिवर्तन आता है? जवाब है, नहीं। किसानों के जीवन की चौतरफा समस्याएं हैं जिन्हें समझने की ज़रूरत है। सर्वप्रथम ज़रूरी शर्त ये है कि किसानों के कर्ज़ को माफ़ करने के साथ ही साथ फसलों के लिए नई रकम किसानों को दे दी जाए जिससे फसल उगाने के लिए जिस कीमत की ज़रुरत होती है उसे उपलब्ध करने में किसानों को दिक्कत न हो। साथ ही पैदावार फसलों को सरकार खरीदने की व्यवस्था करे चाहे फसल अच्छी हो चाहे खराब। यदि अच्छे फसलों को कंपनियां खरीदती है और खराब पैदावार को छोड़ देती है तो इसमें भी नुकसान किसानों का ही होता है, फिर जाहिरा तौर पर ये कदम अप्रत्यक्ष तौर पर किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर करता है।


किसान जिस गांव में रह रहे हैं वहां उनकी चिकित्सा के लिए सुलभ व अच्छे चिकित्सालय का प्रबंध हो तथा केंद्र सरकार की ओर से वहां निःशुल्क चिकित्सा की व्यवस्था की जाए अन्यथा दवाइयों का खर्च उठाते-उठाते किसान आर्थिक तंगी के शिकार हो जाते हैं और आर्थिक बोझ को झेलते हुए प्राण त्यागने के अलावा उनके पास कोई दूसरा उपाय नहीं होता। अगर चिकित्सालय दूर हैं तो जाने-आने का खर्च झेलना भी साधारण किसान परिवार जिसकी आमदनी 2500 रूपए हो, के लिए कष्टदायक है। इसलिए गांव में ही अच्छे निःशुल्क चिकित्सालय का होना निस्संदेह ज़रूरी है।  


किसानों के बच्चों की पढ़ाई की दिशा में भी हमें निःसंदेह सोचना चाहिए। किसान के बच्चे गांव में ही पढ़ पाएं और उन्हें दूर तक न जाना पड़े इसके लिए ज़रूरी है कि गांव में ही अच्छे स्कूलों की व्यवस्था हो तथा ऐसे स्कूलों में अच्छे शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। आम तौर पर देखा गया है कि गांवों के स्कूल बदतर हालात में पड़े रहते हैं, वहां न अच्छी शिक्षा-व्यवस्था होती है न अच्छे शिक्षक। ऐसी अवस्था में किसानों के बच्चे दूर-दराज के शहरों में शिक्षार्थ जाते हैं लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है। बच्चों की सवारी का खर्च उठाना किसानों पर भारी पड़ता है जिसके फलस्वरूप वे बच्चों को पढ़ाना छोड़ देते हैं। फलतः किसानों का भविष्य अंधकायमय हो जाता है। वह बच्चा जो भविष्य में किसान परिवार में वैकल्पिक आमदनी का बड़ा श्रोत हो सकता था, खर्च के बोझ के चलते उसकी पढ़ाई बीच में ही रोक दी जाती है। इसीलिए स्कूलों की समस्या और किसानों के बच्चों की पढ़ाई की ओर सरकार को खास तौर पर ध्यान देना चाहिए। 

हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि खेतों के आसपास के इलाकों में पेय पदार्थों का कारखाना न खोला जाए। कारण इस तरह के कारखानों के लिए बड़े पैमाने पर पानी की ज़रूरत होती है और ये पानी जाहिरा तौर पर गांव के तालाबों से ही खींचा जाता है। अगर पेय पदार्थों के लिए गांव में उपलब्ध पानी का भंडार प्रयोग में लाया जाएगा तो खेतों में प्रयोग किए जाने वाले पानी में स्वाभावतः कमी आएगी। इससे पानी का स्तर नीचे चला जाएगा। हरियाणा और पंजाब में इस तरह की समस्या से दो-चार होना पड़ा है जहां जलस्तर नीचे चला गया है और इसकी वजह से वहां ज़मीन दर ज़मीन पानी के अभाव में बिना खेती के पड़ा हुआ है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा के राज्यों के अधिकतर जिलों में जलस्तर 7.29 मीटर नीचे चला गया है, जबकि महेंद्रगढ़ इलाके में यह 19.45 मीटर और फतेहबाद में 15.79 मीटर नीचे हैं।[5]

इस प्रकार हम देखते हैं कि किसानों में हो रही आत्महत्याओं के मूल कारण ये हैं— कर्ज का बोझ, नए बीजों के ऊंचे मूल्यों के कारण उन्हें खरादने में परेशानी और फलस्वरूप कर्जगीर होना, अर्द्ध शुष्क इलाकों में खेती की समस्या, कृषि से कम आय, खराब फसलों के बिक्री की समस्या, वैकल्पिक आय के माध्यमों का अभाव, बैंक की सुविधाओं का न होना, अच्छे स्कूलों व चिकित्सालयों का अभाव।



किसान जो देश का प्रमुख उत्पादक वर्ग है, उनको आत्महत्या से रोकना और उन्हें हर संभव मदद करना केंद्र व राज्य सरकार का दायित्व व अहम कर्तव्य बनता है। अगर किसानों की समस्याओं की ओर से हम आंख फेर लेंगे तो देश का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। देश का पूंजीपति वर्ग जब पांच सितारा होटलों में बैठकर अच्छा खाना खा रहे होते हैं या फिर महंगे कपड़े पहनकर बड़ी-बड़ी सभाओं में हिस्सा ले रहे होते हैं, घर में चैन की नींद ले रहे होते हैं उस समय गरीब किसान दिन-रात कड़ी धूप में अक्लांत परिश्रम करके खद्य उत्पादन में लगा रहता है, वस्त्र उत्पादन के लिए जी-तोड़ मेहनत करता है लेकिन अंत में कष्ट और दुख के अलावा उसे कुछ नसीब नहीं होता। चुनाव के समय सारे दलों के प्रत्याशी बड़े बड़े प्रलोभनों और वायदों के साथ गांवों में दौरा करते हैं और भोले-भाले किसान परिवारों को यह आश्वासन देते हैं कि अगर उनकी सरकार बनती है तो किसानों की अवस्था में आवश्यक सुधार कर देंगे लेकिन चुनाव के बाद कौन किसान और कौन परिवार, अगले पांच साल तक फिर उन नेताओं को गांव के आसपास फटकते नहीं देखा जाता।

सोचने का विषय ये है कि इस महनतकश वर्ग को अगर असहाय अवस्था में तकलीफ़ भरी ज़िंदगी जीने के लिए छोड़ दिया जाए और आत्महत्याओं को रोकने के लिए सरकार कोई खास कदम ना उठाए तो वह दिन दूर नहीं जब हम दाने-दाने के लिए तरस जाएंगे। अगर दिन-व-दिन किसान खुदकुशी का पथ चुन लेंगे तो फिर किसानों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज होगी और ये सिलसिला शुरु हो गया है और जाहिरा तौर पर यह देश के लिए बहुत शुभ-संवाद नहीं माना जा सकता। इसलिए ये बेहद ज़रूरी है कि किसानों की अवस्था में ज़रूरी बदलाव आए और किसान खुश हों। जिन सुविधाओं के साथ आम जनता जी रही है किसानों को भी उन सारी सुविधाओं का हक बनता है। ये बदलाव तभी संभव है जब किसानों की बेहतर परिस्थिति की ओर सरकार ध्यान दें। उन्हें ऋणमुक्त किया जाए, उन तक सारी सुविधाएं पहुंचे। ये बेहद ज़रूरी है कि सरकार देश की जमा पूंजी में से एक मोटी रकम किसानों पर खर्च करें, किसान परिवारों को खुशहाल रखने की ओर नज़र डालें।





[1] . http://agrariancrisis.in/2011/12/20/ncrb-all-india-figure-1995-2010-256913-farm-suicides/
[2] . http://en.wikipedia.org/wiki/Farmers'_suicides_in_India
[3] . http://agrariancrisis.in/2011/12/20/ncrb-all-india-figure-1995-2010-256913-farm-suicides/
[4] . http://archive.indianexpress.com/news/2.90-lakh-farmers-committed-suicide-during-19952011-govt/995981/
[5]. http://timesofindia.indiatimes.com/india/Groundwater-levels-depleting-fast-in-Haryana/articleshow/15611030.cms

Thursday, 6 March 2014

स्त्री-जीवन में साहित्य की भूमिका — सारदा बैनर्जी

                      
                                     
स्त्रियों के व्यक्तित्व के सही विकास के लिए श्रेष्ठ किताबें पढ़ना और लगातार पढ़ना व पठन से प्राप्त श्रेष्ठ मूल्यों को जीवन में लागू करना बिना शर्त ज़रूरी है। निश्चित तौर पर जब स्त्रियां पढ़ने का अभ्यास विकसित करेंगी तो उन्हें इसके सकारात्मक फ़ायदे होंगे, वे व्यापक समाज से जुड़ पाएंगी और अपनी इच्छाओं के प्रति जागरूक बनेंगी तथा उसे एक नया मोड़ दे पाएंगी। स्त्रियों को खासकर साहित्य से अपना संबंध जोड़ना चाहिए। साहित्य किसी भी इंसान की सोच को विस्तार देता है, मानसिकता को उदार बनाता है, विभिन्न संकीर्णताओं से मुक्त कर स्वस्थ और सुंदर दृष्टिकोण प्रदान करता है और सबसे बढ़कर साहित्य हर एक इंसान को मानवीय बनाता है। साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति है, साधारणीकरण करने की क्षमता। साहित्य के पठन के दौरान कविता, कहानी, नाटक या उपन्यास के किसी पात्र की पीड़ा पाठक की पीड़ा बन जाता है, किसी पात्र का हर्षोल्लास पाठक के सुख में रूपांतरित हो जाता है। पाठक रचना से इस प्रकार एकमेक हो जाता है कि वह पाठ में खो जाता है, पाठ उसे आंदोलित करता है, उद्वेलित करता है और इस प्रकार पाठ से पाठक का एक गहन और आंतरिक संबंध बन जाता है। पाठ का पाठक पर यह प्रभाव बहुत गहरा व दूरगामी पड़ता है।


साहित्य के इस बहुआयामी प्रभाव से स्त्रियों का परिचित होना भी विशेष आवश्यक है। वे स्त्रियां जो साहित्य का अध्ययन नहीं करतीं, उनके लिए महान साहित्य से रुबरू होना इसलिए मायने रखता है ताकि वे अपनी सोच और सोच की परिधि को विस्तार दे पाएं, एक दैनन्दिन साहित्यिक रूचि-बोध विकसित कर पाएं। भारत में जिस चारदीवारी में कैद होकर अधिकांश स्त्रियां ज़िंदगी गुज़ारती हैं, उससे निकलने के लिए साहित्य जैसा विकल्प दूसरा नहीं है। इसका अर्थ कतई ये नहीं है कि स्त्रियां चारदीवारी के बाहर की दुनिया को बिल्कुल नहीं जानतीं या संबंधों की जटिलताओं को नहीं समझतीं, स्त्रियां बेशक समझती हैं और पुरुषों से बेहतर समझती हैं, लेकिन साहित्य का पठन उन्हें जीवन में एक दिशा दे सकता है, सदियों से स्त्रियां मुक्ति के जिस मार्ग की प्रतिक्षा कर रही हैं, साहित्य उस मुक्ति का पथ है। अनेक स्त्रियां आज नौकरी के सिलसिले में बाहर निकल रही हैं लेकिन क्या वे अपने लिए एक अलग अस्मिता और अस्तित्व का निर्माण कर पाई हैं? क्या स्त्रियां अपने व्यक्तिगत फैसले स्वयं ले रही हैं, क्या समानता के संवैधानिक घोषणा के बावजूद समाज ने स्त्री को उसका दर्जा और सही हक प्रदान किया है? अपवादों को छोड़ दें तो इन सवालों के उत्तर नकारात्मक हैं। कारण ये कि स्त्रियां भले ही बाहर निकलें, उच्च पदों पर काम करें लेकिन अपना संविधान-प्रदत्त हक अर्जित करना वे अब तक नहीं जानतीं। अपने विचारों को रखने के लिए जिस दृढ़ व्यक्तित्व की ज़रूरत है उसे स्त्रियां अब तक अर्जित नहीं कर पाईं। यानि स्त्रियां अपनी अस्मिता के प्रति आज भी सचेत नहीं हैं। इस सचेतनता की वृद्धि में साहित्य मदद करता है।
आज भी अनेक घरों में स्त्रियों को बोलने या फैसले सुनाने का अधिकार नहीं के बराबर है। साहित्य में यह गुण निहित है कि वह इंसान को अभिव्यक्ति की आज़ादी के प्रति जागरूक बनाता है और गलत विचारों को दृढ़तापूर्वक खंडित करने व अपनी बात दूसरों के सामने रखने का नैतिक साहस भी प्रदान करता है जो इस तरह की परिस्थिति में रहने वाली स्त्रियों के लिए बेहद ज़रूरी है। दूसरी ओर स्त्रियां यदि कविता या किसी दूसरी विधा के ज़रिए अपनी अनुभूतियों को सम्प्रेषित करें और उसे एक सार्थक रूप दे पाएं तो यह निश्चित तौर पर एक अच्छा कदम ही माना जाएगा।

अक्सर भारतीय परिवारों में रह रही स्त्रियों में अनेक रूढ़िवादी ढकोसलों और आडम्बरों का वास भी देखा जाता है। स्त्रियां अनेक ऐसी प्रथाओं और नियमों में आबद्ध रहती हैं या परिवार द्वारा आबद्ध कर दी जाती हैं जिनका कोई वैज्ञानिक अर्थवत्ता व स्वस्थ मूल्य नहीं होता। इन विभिन्न रूढ़ियों से मुक्त होने में भी साहित्य बड़ी भूमिका अदा करता है। सिर्फ एक नहीं विभिन्न भाषाओं के साहित्य का ज्ञान और उसका प्रसार होने पर स्त्रियां एक रूढ़िविहीन जीवन-शैली और वैज्ञानिक चेतना से सहज ही संपृक्त हो पाएंगी। उन्हें देश के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास की जानकारी मिलेगी। स्त्री अपने मन में जिस सीमित दुनिया को बसाई हुई है, उससे बाहर निकलेगी और व्यापक यथार्थ को ठीक-ठीक समझकर अपनी समस्याओं का हल करने में सक्षम होगी, सही मूल्यों की परख कर सकेगी। जिन रिवाज़ों को सही कहकर बरसों से स्त्रियों पर थोपा जाता रहा है उसकी सटीक पहचान कर उसे अपने जीवन से त्याग पाएंगी। सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार, “साहित्य तत्कालीन सामाजिक जीवन में भाग लेने, उसकी समस्याएँ हल करने आदि की प्रेरणा देता है; साथ ही उसका व्यापक प्रभाव मनुष्य के संस्कारों के निर्माण में देखा जा सकता है।”
वर्तमान दौर में बहुसंख्यक स्त्रियां साहित्य के प्रति आग्रह नहीं रखतीं, ये सच है। ये भी सच है कि यदि श्रेष्ठ साहित्य को वे अपने जीवन की कसौटी और प्रेरणा मान लें तो उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव दिखाई दे। क्षमा, त्याग, संवेदनशीलता, दया, सहानुभूति, सहृदयता आदि गुण साहित्य के अध्ययन से प्राप्त होता है लेकिन हकीकत ये है कि उपरोक्त सारे गुण अधिकतर स्त्रियों में स्वाभाविक तौर पर विद्यमान रहता है, स्त्रियों को जिन चीज़ों की ज़रूरत है, वे हैं अपनी अस्मिता का बोध, अपने अस्तित्व का ज्ञान तथा अपने संवैधानिक अधिकारों को अर्जित करने की इच्छा तथा मांग। इसे केवल साहित्य ही दे सकता है। साहित्य न केवल स्वस्थ मूल्यों वरन् प्रगतिशील मूल्यों से इंसान को जोड़ता है। सही और गलत का फैसला लेने में मददगार होता है। रूढ़िबद्ध सामंती विचारों से मुक्त होकर प्रगतिशील मनोदशा व विचारों को विकसित करने के लिए प्रगतिशील व आधुनिक दृष्टिकोण से लैस साहित्य का अध्ययन बेहद ज़रूरी है। साथ ही दुनिया की तमाम श्रेष्ठ स्त्रीवादी रचनाओं को पढ़ने से स्त्रियां अपनी अस्मिता के प्रति स्वयं सचेत होंगी और ये सचेतना ही है जो स्त्री-मुक्ति का मार्ग है।









Sunday, 18 August 2013

कबीर-तुलसी के काव्यों में स्त्री-विरोध – सारदा बैनर्जी

                    




























भक्तिकालीन साहित्य में पाखंड-विरोध के समानांतर स्त्री-विरोध का स्वर भी स्पष्टतः मुखर हुआ है। खासकर कबीर जैसे प्रगतिशील और भक्त कवि ने अपने दोहों में स्त्री को दो रुपों में विभाजित कर उसका चरित्रांकन किया है। ये दो रुप हैं, ‘पातिव्रत्य’ रुप और ‘कामिनी’ रुप। कबीर ने नारी के कामिनी रुप की भरसक निंदा की है और पातिव्रत्य की उँचे कंठ से भूरी-भूरी प्रशंसा की है। ऐसी स्त्रियाँ जो अपने पति के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखती हैं और पति की सेवा को ही परम धर्म के रुप में स्वीकार करती हैं, पति को हर एक विपत्ति से मुक्त कराके स्वयं उन विपत्तियों को गले लगाती हैं, उन्हें ही कबीर एवं तुलसीदास जैसे भक्त कवियों ने नारी का दर्जा दिया है। ये पतिव्रता नारियां भले ही कुरुपा हों, काली हों लेकिन ये उन कामिनियों की तुलना में भली हैं और इन पर कोटि सुंदरियों को न्योछावर किया जा सकता है। कबीर कहते हैं, “पतिबरता मैली भली, काली कुचिल कुरुप/ पतिबरता के रुप पर बारौं कोटि स्वरुप।” इसी तरह तुलसी भी लिखते हैं, “बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।” यानी जो स्त्री बिना छल-कपट के पातिव्रत्य में मन-प्राण समर्पित करती है वह परम गति(स्वर्ग) को प्राप्त होती है। लेकिन बाकि सब स्त्रियां जो पति की आज्ञा का पालन नहीं करतीं या अपनी इच्छा के अनुरुप ज़िंदगी जीती है, पति के अतिरिक्त किसी दूसरे पुरुष को आकर्षित कर सकती हैं, उनके प्रति प्रेमासक्त हैं, वें सभी स्त्रियां कामिनियां हैं यानी माया हैं, मोहिनियां हैं, निंदनीया हैं और त्यागने की योग्या हैं। ये कामिनी स्त्रियां डेंजरस हैं, केवल पुरुषों को भटकाने का काम करती हैं और इनकी संगति से पुरुष किसी भी क्षण अंधे हो सकते हैं यानी मार्ग से भटक सकते हैं। कबीर कहते हैं, “नारी की झांई परत अन्धा होत भुजंग/ कबिरा तिनकी कौन गति नित नारी को संग।”

सुंदरकांड में तुलसीदास लिखते हैं, “ढोल गंवार शुद्र पशु नारी/ सकल ताड़ना के अधिकारी।”  वहीं तुलसी में विरोधाभास की प्रवृत्ति भी दिखाई देती है जब वे लिखते हैं, “केहि विधि नारी रचि जग मांहि, पराधीन सपनेहु सुख नाहि।” ऐसा नहीं है कि तुलसी स्त्रियों की समस्याओं एवं उनके जीवन की प्रतिकूलताओं से अनभिज्ञ थे लेकिन कहीं न कहीं पुंसवादी मानसिकता से वे मुक्त नहीं हो पाए जिसका प्रमाण उपरोक्त पंक्तियां है।

विचारणीय ये है कि स्त्री पर ‘अच्छी’ और ‘बुरी’ का स्टैंप लगाने और भली-बुरी स्त्री का निर्णय लेने में सदा से पुरुष ही क्यों बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे हैं? ‘कामिनी’, ‘मायावी’, ‘विश्वमोहिनी’, ‘छलिया’ आदि विशेषणों से स्त्रियों को कलंकित और अपमानित करने का काम भी सदा से पुरुष अपनी ज़िम्मेदारी क्यों मानते रहे हैं? अपना मूल्यवान समय स्त्रियों को अपमानित करने में क्यों खर्च करते रहे हैं ये पुरुष? ये पुंसवादी समाज के पुरुष क्यों समझ नहीं पाते कि स्त्रियों ने अपने ऊपर सर्टीफ़िकेट देने की कोई महान ज़िम्मेदारी पुरुषों को नहीं सौंपी। लेकिन देखिए पुरुषों ने तो स्त्रियों पर अपनी राय देने को ही अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान लिया है।

भक्त (पुरुष) कवियों की मानें तो ये कामिनीयाँ यानी स्त्रियां जो कामिनी गुण-संपन्न हैं, वस्तुतः चरित्रहीना हैं। जायज़ है इन्हें स्वर्ग में तो कभी स्थान नहीं मिल सकता क्योंकि स्वर्ग में पुरुषों का अबाध प्रवेश पहले से निर्धारित है चाहे वे हज़ार बुरा कर्म करें, उनके(पुरुषों के) पश्चात स्वर्ग में पतिव्रता स्त्रियां जाती हैं, सो ये जो कामिनियां हैं ये मृत्यु के उपरांत नरक की गामिनी ही बनती हैं। तुलसीदास लिखते हैं, “वृद्ध रोग सब जड़ धन हीना/ अंध बधिर क्रोधी अति दीना/ ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना/ नारि पाव जमपुर दुखनाना।”  अर्थात वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी एवं अति-दीन पति का अपमान करने पर स्त्री अपने लिए नर्क का मार्ग प्रशस्त करती है जहां उसे अगणित दुख झेलने पड़ सकते हैं। वैसे सचमुच मृत्यु के उपरांत कामिनी स्त्रियां कहां जाती हैं ये किसी को नहीं पता लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि स्त्रियों के मन में नर्क का दहशत फैलाने और स्त्रियों को पति सेवा में रत कराने के लिए अनादि काल से बड़े एवं सम्मानीय कवियों द्वारा साहित्य और जीवन में पातिव्रत्य का पाठ ज़रुर पढ़ाया और सिखाया जाता रहा है। लेकिन जनाब लंपट, दुश्चरित्र और चरित्रहीन पुरुषों की क्या गति होगी, उन्हें नरक में स्थान मिलेगा या स्वर्ग में, इसका ज़िक्र तो आपने नहीं किया, बल्कि इसका ज़िक्र पूरे के पूरे भक्ति-साहित्य से नदारद है। क्या बात है ! पुरुषों के मामले में कनसेशन है क्या? या भूल गए कि जिन दोषों का आपने स्त्रियों के मामले में ज़िक्र किया है वो पुरुषों के मामले में भी फ़िट हो सकता है।

कबीर की मानें तो ये जो कामिनी स्त्रियां हैं, ये भुवनमोहिनियां हैं, मीठी वाणी बोलने वाली होती हैं, माया-मोह के जाल में पुरुषों को फट फंसा लेने वाली होती हैं। कबीर ने माया का जो रुप वर्णित किया है और उसकी स्त्री से जिस तरह तुलना की है, उससे तो यही स्पष्ट होता है, “माया महाठगिनी हम जानी/ निरगुन फांस लिये कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।” इसलिए भक्तिकाल के कवियों ने इन कामिनियों से दूर रहने का मूल्यवान उपदेश पुरुषों को बारंबार दिया है। अब पुरुष इनके उपदेशों को मानते हैं या नहीं ये दिगर बात है। लेकिन हे पुरुष ! ये तो ज़्यादती है ना, आकर्षित आप हों और दोष मढ़ा जाए स्त्रियों के सिर? मोह-माया के बंधनों से आप निकल न पाएं, बार-बार मनमोहिनी ‘कामिनियों’ के जाल में फंसते चले जाएं और ‘मोहिनी’ टैग स्त्रियां को ढोना पड़े? पत्नी से मन भर जाए और दूसरी स्त्रियों की ओर आप आकृष्ट हो जाएं और फंसाने वाली वही स्त्रियां कहलाए? नरक का द्वार भी सदा स्त्रियों के लिए आप खोल रखें। अरे आप तो ईश्वर की उपासना करने वाले उत्तम कोटि के भक्त हैं, तो आप ये स्वर्ग-नर्क वाला फैसला भी ईश्वर पर ही क्यों नहीं छोड़ दिए? प्लीज़, अब स्त्रियों की इच्छा से होने दीजिए फैसले।

आप लोगों ने बहुत चरित्र-चित्रण किए, फैसले दिए, कामिनियां निर्मित किए। अब नहीं, कतई नहीं। हम भुवन-मोहिनियां, कामिनियां स्वयं डिसाइड करेंगी कि हम क्या हैं? और डिसीशन ये है कि हम स्त्रियां हैं। केवल स्त्रियां, जो कामिनी-धामिनी टाइप अपशब्दों से मुक्ति की आकांक्षी हैं। जिन्हें पुरुषों के फैसले स्वीकार नहीं हैं। वे अपनी अस्मिता स्वयं निर्मित कर रही हैं, आप पुरुष चिंतित न हो, स्त्रियों को डिफ़ाइन करने के लिए शब्द ढ़ूढ़ने की निरर्थक कोशिश न करें। आपके लिखे विशेषणों को अब स्त्रियां नहीं मानतीं।

दूसरी बात, स्त्रियां (चाहे वह भक्त कवियों के शब्दों में कामिनी हो चाहे पतिव्रता) पुरुषों को फंसाने के लिए जन्म नहीं लेती, ज़िदंगी जीने के लिए लेती हैं। ध्यान देने वाली बात है कि ‘कामिनी’ शब्द के पीछे स्त्री-शरीर का संकेत है। कामिनी से दूर रहने का अर्थ स्त्री-शरीर से परहेज़ करना है। दिलचस्प बात ये है कि स्त्री की अस्मिता स्त्री के शरीर से ही निर्मित होती है। स्त्री का मुख, वक्ष-स्थल, हाथ, पैर इत्यादि शरीर का हिस्सा है, सम्मिलित रुप में ये स्त्री है। यही स्त्री-अस्तित्व का निर्माण करती है।

तीसरी बात, पातिव्रत्य पर ज़ोर देना एक खास किस्म के अर्थ को सामने लाता है। पातिव्रत्य में संलग्न होना यानी स्त्रियों को घर में ही कैद करके रखने की प्रवृत्ति। घर ही स्वर्ग हो, पति देवता और पति-सेवा मूल कर्म एवं धर्म। बाकि बाहरी काम घूंघट डालकर। यह मूलतः स्त्रियों को घरबंद करने की मानसिकता को ऊजागर करता है। उस दौरान सार्वजनिक स्थल में स्त्रियों की आवाजाही को रोकने के लिए पातिव्रत्य का पाठ एक कारगर हथियार रहा। ध्यान देने की बात है कि स्त्री जब सार्वजनिक क्षेत्र में पदार्पण करती है तो पितृसत्ताक पुंसवादी मानसिकता को चुनौती देती है। वह केवल घर से ही नहीं सामंती समाज की बेड़ियों से मुक्त होती है। समाज के सामने अपना अस्तित्व दर्ज करती है। अपनी अस्मिता का निर्माण करती है।

गौरतलब है कि जिस भोगवादी दृष्टिकोण से तुलसीदास और कबीर ने स्त्रियों को समझा है, वह स्त्री के मूल्यांकन का सही दृष्टिकोण नहीं है। स्त्री की बुद्धि, उसका विवेक, उसकी अस्मिता को ताक पर रखकर केवल भोगवादी दृष्टिकोण का सहारा लेकर स्त्रियों का मूल्यांकन हुआ है जो गलत है। जहां कामिनी रुप भोगवादी दृष्टिकोण का परिचायक है वहां पतिव्रता रुप शोषिता का जिसका प्रमुख कर्म एवं धर्म पति की नित्यसेवा है। विचारणीय है कि किसी भी पद या दोहे में स्त्री की स्वायत्त इच्छा की बात नहीं कही गई। कहीं भी स्त्री के स्वायत्त निर्णय को प्रधानता नहीं दिया गया। स्त्री की इच्छाएं-आकांक्षाएं पुरुषों के ईर्द-गिर्द घूमती रही है। स्त्री-इच्छा को प्रमुखता न देने के कारण ही पति से ही प्रेम करना स्त्री का मूलभूत कर्तव्य माना गया, उसे निश्चित कर दिया गया। पति के अतिरिक्त किसी और से प्रेम या संपर्क करने वाली स्त्रियों को चरित्रहीन की संज्ञा दी गई और इस तरह की मनोदशा समाज में आज भी बरकरार है।

यह स्त्रियों के लिए अत्यंत दुख की बात है कि कबीर जैसे सांप्रदायिकता-विरोधी, पाखंड-विरोधी एवं प्रगतिशील चेतना-संपन्न कवि ने भी नारी का मूल्यांकन पूर्णतः पुंसवादी दृष्टिकोण से किया। स्त्री-समस्याओं से परिचित एवं संवेदनशील कवि तुलसीदास ने भी स्त्री को स्वर्ग-नर्क की सीमाओं में आबद्ध कर दिया। स्त्री को इन बेड़ियों से मुक्त कराने की कोशिश नहीं की, एक स्वतंत्र फैसले लेने वाली स्त्री का रुप सामने नहीं रख पाए। 


Thursday, 9 May 2013

देश और दुनिया की तमाम खबरों से आख़िर स्त्रियां इतनी अनजान क्यों है? – सारदा बनर्जी


                      

स्त्रियों की एक भयानक नकारात्मकता ये है कि वे देश और दुनिया की तमाम खबरों से एकदम अनजान रहती हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घट रही विभिन्न घटनाओं से वे बिल्कुल बेखबर हैं। उन्हें इन सबसे कोई लेना-देना नहीं। वैसे इस अज्ञता की वजह से उन्हें कोई अपराध-बोध नहीं होता। वे अपनी तरह मस्त रहा करती हैं। जब टी.वी. चैनलों में रुचि लेने लगती हैं तो फिल्मी गाने सुनती हैं, फ़िल्म देखती हैं, कोई सीरियल, कोई प्रोग्राम देख हंस-हंसकर लोट-पोट होती हैं, दुखी भी होती हैं। और भी कई प्रतिक्रियाएं करती हैं। लेकिन खबरों में स्त्रियों की दिलचस्पी एकदम शून्य के बराबर है। यह बहुत कम देखा गया है कि स्त्रियां न्यूज़ में रुचि ले रही हैं, उसे नियमित रुप से सुन रही हैं, विभिन्न सोश्यल साइट्स पर इन खबरों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही हैं। यही वो जगह है जहां पुरुष स्त्रियों को मात दे जाते हैं।

देखा गया है कि पुरुष तुलनात्मक तौर पर खबरों में खास दिलचस्पी लेते हैं। इसे जीवन का ज़रुरी हिस्सा मानकर चलते हैं और देश-विदेश की खबरों के संबंध में अपनी राय भी रखते हैं, उसे इज़हार भी करते हैं। जब दोस्तों के साथ बैठे होते हैं तो उद्देश्यहीन वार्तालाप के साथ-साथ इन मामलों में भी रुचि लेते हैं। आलोचना-प्रत्यालोचना का एक ज़बरदस्त माहौल बनता है। लेकिन स्त्रियों के वार्तालाप के विषय घर से ही शुरु होकर घर पर ही खत्म हो जाता है। यही है चिंता की बात। स्त्रियों की बातचीत का विषय बहुत सीमित होता है। इसकी वजह है कि स्त्रियां अपने आप को घर की चारदीवारी में कैद करके रखती है। ये सोचने वाली बात है कि स्त्रियां आज बाहर निकल रही हैं, लिख-पढ़ रही हैं, नौकरी कर रही हैं, घर की ज़िम्मेदारियां भी बखूबी संभाल रही हैं फिर क्यों वे देश-विदेश की हकीकतों से अनजान बनी रहती हैं? क्यों उनकी मानसिकता घर के बाहर नहीं निकलता? ऐसा भी नहीं है कि घर में उन्हें समाचार देखने से रोका जाता है या पुरुष सदस्य द्वारा किसी समाचार चैनल को घूमाकर दूसरे चैनल में देने को कहा जाता है चूंकि पुरुष खुद समाचार में रुचि रखते हैं। अपितु ये देखा गया है कि स्त्रियां खुद समाचार से भाग रही हैं। जैसे ही घर के पुरुष सदस्यों का समाचार सुनना बंद होता है स्त्रियां तुरंत अपना प्रिय सीरियल लगा लेती हैं। आख़िर स्त्रियों का समाचार सुनने से भागने वाला रवैया क्यों है?  

नौकरी करने वाली स्त्रियां मजबूर होकर दुनिया का हाल-ओ-हकीकत जान तो लेती हैं लेकिन जब बात छेड़ी जाती है तो वे किसी विषय पर परिचर्चा या विचार-विमर्श करना पसंद नहीं करतीं। राजनीति पर बात होगी तो रवैया यही कि ‘ये सब तो फालतू चीज़ें हैं, नेता खराब है, राजनीति ही खराब है, दुनिया खराब है’ लेकिन इससे आगे क्या? देखा गया है कि अधिकतर स्त्रियां राजनीतिक पेंचिदगियों में रुचि नहीं लेतीं, राजनीति पर बात होती है तो पसंद नहीं करती, तुरंत विषय बदलने के लिए कहती हैं। अगर समाचार बलात्कार पर है तो पुरुष समुदाय को दस गाली देने के बाद फिर अपने पुराने पुंसवादी रवैये में आ जाती हैं। ‘क्यों रात को निकली थी, छोटे कपड़े पहनेगी तो तेरे साथ होगा या मेरे साथ’ या कहेंगी ‘आजकल लड़कियां भी कम नहीं, छोटे कपड़े पहनकर पुरुषों को आकर्षित करती हैं अपनी तरफ़, फिर रेप-रेप करती हैं।’ इस तरह की टिप्पणी कर ये स्त्रियां अपनी संकीर्ण मनोदशा का परिचय दे देती हैं। अगर समाचार किसानों, मज़दूरों, दलितों, अल्पसंख्यकों की बदहाली पर है तो प्रतिक्रिया दकियानूसी बातों द्वारा होती है, ‘देखो समाज में क्या क्या हो रहा है...अब ये ज़्यादा दिन नहीं चलेगा...पृथ्वी का ध्वंस करीब है।’

स्त्रियों का समाचारों से पलायन करने की इस मानसिकता के लिए ज़िम्मेदार वस्तुतः स्त्रियां खुद हैं। उन्हें अपने विज़न को बढ़ाना होगा, बड़े फ़लक पर जीवन को देखना होगा। समाचार को जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा मानना होगा अन्यथा इसमें रुचि नहीं बढ़ेगी और जब रुचि नहीं होगी तो जायज़ है समाचार सुना-समझा नहीं जाएगा। समाचार के प्रति उदासीन भाव बरकरार रहेगा। स्पष्ट होता है कि स्त्रियां सामाजिक माहौल से अपने आप को जोड़ ही नहीं पा रही हैं। वे भले ही बाहर निकले, स्वच्छंद जीवन जिएं पर कहीं न कहीं मानसिक तौर पर समाज, देश और दुनिया की तमाम वास्तविकताओं से कटी हुई रहती हैं और घर की गुलाम मानसिकता से छुटकारा नहीं पाती। ये ज़रुर है कि अल्पसंख्यक स्त्रियां न्यूज़ में रुचि लेती भी हैं, वे राजनीतिक कार्यों में शिरकत भी करती हैं लेकिन अधिसंख्यक स्त्रियों नहीं लेतीं।

इसलिए हर एक स्त्री को समाचार में दिलचस्पी पैदा करनी होगी। अपने ज्ञान के संकुचित दायरे को फैलाना होगा। विश्वपटल में घट रही विभिन्न घटनाओं से अवगत होना कोई खराब काम नहीं है, ये स्त्रियों को समझना है। जायज़ है जब ये बात समझ में आएगी तो फिर धीरे-धीरे समाचारों के प्रति अभिरुचि भी बढ़ती जाएगी। 

क्या घर में स्त्रियों के पास अपना एक स्वतंत्र कमरा उपलब्ध है? – सारदा बनर्जी


                   

स्त्री-विमर्श पर बात करते समय सबसे अहम सवाल ये उठता है कि क्या स्त्री मुक्त है या नहीं है? ये मुक्ति वैचारिक और कायिक दोनों स्तरों पर होना चाहिए। ये मुक्ति व्यक्तिगत भी है और सामाजिक भी। निजी भी है और सार्वजनिक भी। स्त्री-मुक्ति के लिए ज़रुरी सवाल ये है कि स्त्री के पास अपना स्वतंत्र स्पेस है कि नहीं? स्वतंत्र स्पेस से मतलब है कि क्या घर में स्त्री के पास अपना एक अलग कमरा उपलब्ध है जहां वो अपनी पढ़ाई कर सके, अपने विचारों को सही दिशा दे सके, अपनी प्रतिभा को सर्जनात्मक रुप दे सके और सबसे बढ़कर अपने आप को वक्त दे सके। भारत में स्त्रियों के उत्थान के लिए सबसे ज़रुरी शर्त है कि स्त्रियों के लिए घर में एक अलग कमरा हो जैसा कि आम तौर पर पुरुषों को उपलब्ध होता आया है। ‘अ रुम ऑफ वनस् ओन’ में वर्जीनिया वुल्फ़ लिखती हैं कि कल्पना पर लिखने के लिए स्त्री के पास अपने कमरे और पैसे का होना ज़रुरी शर्त है। स्त्री का अपना कमरा हो जो केवल उसी का हो, उसमें स्त्री का अपना पुस्तकालय हो और साथ ही वे सारी चीज़े प्राप्त हो जिससे उसे लगाव है। इससे विचारों को समृद्ध होने में मदद मिलती है दूसरी ओर कल्पना को भी फैलने का मौका मिलता है।

स्त्री का स्वतंत्र स्पेस जहां अपने कमरे के भीतर हो, वहीं वह स्पेस कमरे के बाहर भी होनी चाहिए। अक्सर देखा गया है कि जब कोई बहस या तर्क-वितर्क घर में छिड़ जाता है तो ज़्यादातर मामलों में उसमें पुरुष शामिल होते हैं। गरमागरम बहस होने लगती है, घर की स्त्रियां चुपचाप टुकुर-टुकुर पुरुषों का मुंह निहारती हैं। समझने की कोशिश करती है कि क्या कहा जाए और बाद में स्त्रियां शिरकत करने की भी अथाह कोशिश करती हैं। अपने लिए स्पेस ढूंढ़ने की कोशिश करती है। अगर एक-आध स्त्री उस बहस में शामिल होने की कोशिश करती है तो जैसा कि अधिकतर घरों में होता है कि उसे चुप करा दिया जाता है। स्त्रियों को ये एहसास दिलाया जाता है ये बहस बुद्धिजीवियों के लिए है, बेवकूफ़ों के लिए नहीं। और बुद्धि तो केवल जन्मजात रुप से पुरुषों को ही प्राप्त हुआ करता है। सो स्त्रियां चुप हो जाए, अपना काम करें(रसोई संभाले) वजह ये कि उसके द्वारा कहा गया पॉएंट किसी काम का नहीं है। अगर पुरुष किसी पुरानी पुंसवादी घिसी-पिटी थ्योरी पर भी बहस कर रहे हों तो स्त्रियों का फ़र्ज़ है कि वे उनकी हिमायत करें। यही आदर्श स्त्री-लक्षण है। लेकिन अगर वह स्त्री उसे काटने की कोशिश करती है तो पुरुष कई बार अपनी आवाज़ को ऊंची करके बोलने लगते हैं ताकि स्त्रियां खुद-व-खुद ‘शट अप’ हो जाएं। जायज़ है ज़्यादातर मामलों में घर की स्त्रियां चुप्पी साध लेती हैं। और अगर कोई स्त्री चुप नहीं होती या अपने मुद्दों पर अड़ी रहती है तो वह स्त्री आवारा, बदचलन, ज़िद्दी, अकड़ू, अहंकारी, शैतान, घमंडी, असभ्य जैसे कई कई सुंदर उपाधियों से अलंकृत होती है। 

सवाल यहीं से शुरु होता है कि आखिर क्यों? क्यों स्त्रियां अपनी बात को कमतर या कम वज़न संपन्न बात समझकर चुप्पी साध लें? क्यों उसे बहस करने के लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित होना पड़े और वह भी उसके अपनों से जो स्त्री को रसोई संभालने वाली तो मान सकते हैं लेकिन नागरिक नहीं? आखिर कब स्त्रियों को नागरिक मानकर उनकी बातों को मूल्य दिया जाएगा और उनकी अवहेलना नहीं होगी?

यही वह जगह है जिसे स्त्रियों को अपने लिए बनाना है। यानि अपना स्थान बनाना है। सोचने का, बोलने का, शिरकत का, पढ़ने का, हंसने का, रोने का, अपनी निजता का, अपनी मुक्ति का स्पेस बनाना है। स्त्रियों के लिए बेहद ज़रुरी है कि वे अपनी अभिरुचियों को समझे और जाने। जब तक वे खुलकर अपने आप को समय नहीं देगी, जब तक उन्हें घर के छोटे-छोटे कामों से फुरसत नहीं मिलेगी तब तक वे नहीं समझ सकतीं कि उनकी रुचि किन विषयों में है। जब स्त्री फ्री होगी तब वह निर्धारित कर पाएगी कि वह क्या चाहती है, कौन सी ज़िंदगी चाहती है, ज़िदगी में क्या-क्या चाहती है और क्या नहीं चाहती।



ज़ायज़ है जब स्त्री सिर्फ़ खाना नहीं पकाएगी, जब स्त्री सिर्फ़ बच्चे 
नहीं जनेगी तब वह अन्य सर्जनात्मक कार्यों के प्रति भी रुचि रखेगी। देश और दुनिया की तमाम हकीकतों पर नज़र रखेगी, उससे परिचित होगी और खुद को कामयाबी के मकाम पर भी देखना चाहेगी। ये होगा स्त्री-मुक्ति का पहला आयाम। दूसरा आयाम तब तय होगा जब स्त्री कामयाबी हासिल कर लेगी। युग-युग से स्त्री की ‘घरबंदी’ इमेज को तोड़ने में सक्षम होगी। जब स्त्री घर से बाहर निकलेगी, अपने वैचारिक रुढ़ियों से मुक्त होगी तभी अपने इच्छित कार्यों में सफलता हासिल कर पाएगी।

पुस्तक और अवसरवाद

  मध्यवर्ग में एक अच्छा खासा वर्ग है जो पुस्तकों को 'शो-केस' में सजाकर अन्य को प्रदर्शित करना पसंद करते हैं। लेकिन अपने ही शो-केस से...