Sunday, 6 September 2020

जगदीश्वर चतुर्वेदीः व्यक्तित्व एवं विचारधारा


आज हम ऐसे दौर में हैं जहां ज्ञानवान, ईमानदार, बेबाक, समय के पाबंद, विद्यार्थियों के साथ उदार एवं मित्रवत व्यवहार रखने वाले, समस्या के समय विद्यार्थियों को सही परामर्श देने वाले मर्मज्ञ शिक्षकों का घोर अभाव है। ऐसे वक्त में इन गुणों को अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं कर्म के ज़रिये चरितार्थ करते हुए प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी शिक्षा जगत के लिए एक मिसाल हैं। प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी यानि अपने विद्यार्थियों के प्रिय ‘जे.सी. सर’। कलकत्ता विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं के लिए यह केवल एक शिक्षक को सम्बोधित करने का नाम भर नहीं है अपितु अपार ऊर्जा, प्रचंड साहस, प्रखर बुद्धिमत्ता, जानदार वक्ता, अथाह ज्ञान, जोशीला अंदाज़, हँसमुख स्वभाव, विचक्षण दृष्टि, भरपूर श्रद्धा, आंतरिक भरोसा एवं सम्मान का नाम है ‘जे.सी. सर’।

मैं पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर शहर से प्रेसिडेन्सी कॉलेज में स्नातक की पढ़ाई के लिए आई थी। जब स्नातकोत्तर के बारे में सोचा तो पहली उलझन यह थी कि प्रेसिडेन्सी से किया जाए(उस समय विश्वविद्यालय नहीं बना था लेकिन स्नातकोत्तर की पढ़ाई होती थी) या कलकत्ता विश्वविद्यालय से? मेरे माता-पिता, पिता के परिचित, मेरे कोलकाता में रहने वाले रिश्तेदारों की राय थी कि प्रेसिडेन्सी एक नामचीन कॉलेज है सो वहीं से करना चाहिए। मैंने अपने से एक साल वरिष्ठ दीदियों से पूछा कहाँ दाखिला लूँ तो उनका जवाब था, ‘तुम पागल हो यह सवाल पूछ रही हो? वहाँ जे.सी. हैं यार!’ मैंने पूछा ‘यह जे.सी. कौन हैं?’ यह सवाल पूछते ही सारे वरिष्ठ मुझे ऐसे निहारने लगे जैसे मैं कोई अजूबा प्राणी हूं जिसने ऐसा पूछा हो और जिसने जे.सी. का नाम न सुनकर बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। ऐसा था सर का प्रभामंडल जो कलकत्ता विश्वविद्यालय के बाहर तक फैला हुआ था! अंततः मुझे सर के बारे में जानकारी दी गई कि वे कितने प्रतिभाशाली और ज्ञानी हैं, जे.एन.यू. से पढ़कर आए हैं, उनके पढ़ाने का तरीका हिन्दी के आम शिक्षकों से बिल्कुल अलग है, कितने हैंडसम और स्मार्ट भी हैं आदि आदि। उन्होंने बताया कि वे प्रेसिडेन्सी कॉलेज में तृतीय वर्ष की छात्रा रहते समय ही कलकत्ता विश्वविद्यालय जाकर जे.सी. सर की कक्षा कर आई थीं। कुछ सर के ज्ञान से परिचित होने तो कुछ सर की सुंदरता को निहारने। मैं अचम्भित थी! मैंने ठान लिया था कि अब तो सी.यू. में ही दाखिला लेना है कारण वहां कोई ‘जे.सी.’ हैं। घर और रिश्तेदारों के ज़बरदस्त दबाव का सामना करके मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय पहुँची बस एक ‘जे.सी.’ नाम के भरोसे। यह मानकर कि वे जो कोई भी हों कोई तो बात होगी उनमें। उन्हें देखना है, जानना है, उनसे पढ़ना है।

जे.सी. सर वे हैं जिनसे स्नातकोत्तर पढ़ने के लिए विद्यार्थी प्रतिष्ठित कॉलेज और विश्वविद्यालय का मोह भी छोड़ सकते थे; जिनकी कक्षा छूट जाने पर अपना आना व्यर्थ मान लेते थे। किसी विद्यार्थी की ओर देखकर हँस देते थे तो वह धन्य धन्य हो उठता था। एम.ए. के दौरान आँखों देखा एक वाकया कुछ ऐसा हुआ— जे.सी. सर की कक्षा से पहले जिस शिक्षक की कक्षा होती थी वे नहीं आए। उनकी नामौजूदगी के कारण कुछ विद्यार्थियों ने जे.सी. सर को उनकी अपनी कक्षा के निर्धारित समय से एक घंटे पहले बुला लिया। उसी कक्षा के कुछ अन्य विद्यार्थी उस शिक्षक के न आने के कारण बाहर गए हुए थे। उन्हें इस बात की सूचना नहीं थी कि सर बुला लिए जाएंगे। वे बड़ी आशा लेकर घंटे भर बाद आए तो जानकर बहुत निराश हुए कि सर ने अपनी कक्षा निर्धारित समय से पहले ही ले ली। वे सीधे सर से ही लड़ने चले गए कि आप उन विद्यार्थियों के कहने पर कैसे मान गए? हम बाहर गए थे और आपकी कक्षा के लिए प्रतीक्षारत थे? आज तो हमारा आना ही व्यर्थ हो गया! ऐसी थी सर की लोकप्रियता! सर की कक्षा के लिए विद्यार्थियों की छटपटाहट!

सर की कक्षा सबसे अंत में होती थी लेकिन सुखद आश्चर्य यह कि सारे विद्यार्थी उनकी कक्षा के लिए अंत तक बैठे रहते थे। उनकी खासियत यह थी कि वे हर दिन आते थे और समय के बेहद पाबंद। पचास मिनट की कक्षा एक से लेकर डेढ़ घंटे तक तन सकती है लेकिन बीस मिनट पढ़ाकर अपने शिक्षण-दायित्व एवं कर्तव्य की इतिश्री समझना उनके स्वभाव का हिस्सा बिल्कुल न था। वे निर्धारित ढर्रे पर कभी नहीं पढ़ाते थे। उनके शिक्षण का तरीका सबसे जुदा था। पाठ्यक्रम में अंतर्भुक्त शीर्षकों के अनुसार निर्धारित पद्धति की पढ़ाई को सर ‘उपभोक्तावादी पद्धति की पढ़ाई’ मानते हैं। इस तरह की पढ़ाई विद्यार्थियों में सामाजिक व राजनीतिक चेतना नहीं जगाती, सही-गलत का विवेक पैदा नहीं करती। सर के अनुसार पाठ्यक्रम की पढ़ाई सीमित नज़रिया बनाती है। वह सोच के दायरे को संकीर्ण कर देती है, उसे व्यापक फैलाव का अवसर नहीं देती।

शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य होता है अधिक से अधिक सचेतनता पैदा करना। शिक्षा नागरिक चेतना पैदा करता है। लेकिन अभी शिक्षा एक तयशुदा पैटर्न बन गया है। यह पैटर्न जितना अनुत्पादक है, उतना ही क्षतिकारक। सूत्रबद्ध पढ़ाई जड़ता और बुद्धिहीनता को प्रश्रय देता है तो वहीं मौलिक सोच व चिंतन में सबसे बड़ी बाधा होती है। कॉलेज से पढ़कर जब विद्यार्थी कलकत्ता विश्वविद्यालय में दाखिला लेते थे तो पाठ्यक्रम आधारित पढ़ाई के अभ्यस्त विद्यार्थी जे.सी. सर की कक्षा में द्वंदग्रस्त रहते थे कि पाठ्यक्रम में लिखित प्रत्येक बिन्दु-दर-बिन्दु क्यों नहीं पढ़ा रहे! करीब तीन-चार महीने बाद विद्यार्थियों को पता चलता था कि यही शिक्षण की सटीक प्रणाली है जिसका पता अब तक उन्हें न था। बस क्या था अब तो सर के ज्ञान, उनकी दृष्टि, उनके विचार को जानने के लिए उनके जोशीले अंदाज़ वाली कक्षा हर विद्यार्थी के लिए अनिवार्य बन जाता था। वे तूफ़ान की तरह प्रवेश करते थे और पूरी कक्षा को नये विचारों से लबरेज़ करके जाते थे। पीएच.डी. कोर्स-वर्क के समय भी सर की कक्षा के वक्त पूरी कक्षा भर जाती थी। अन्य शिक्षकों के पाठ्यक्रम से संबंधित जिज्ञासाओं का समाधान भी जे.सी. सर की कक्षा में होता था। विद्यार्थी यह मानकर चलते हैं कि सर के पास हर जिज्ञासा का समाधान है।

दिलचस्प यह कि उनसे असहमत होने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी कम नहीं। इस असहमति के बावजूद वे उनके ज़बरदस्त मुरीद और इस बात के प्रति सहमत कि सर असाधारण पढ़ाते हैं। पढ़ाते समय रपटनदार भाषा का प्रयोग सर कभी नहीं करते थे। उनके पढ़ाने की शैली काफ़ी ‘बोल्ड’ और खुली होती थी। समाज में यह धारणा बनाई गई है कि प्रकांड विद्वान बड़े गंभीर ढंग से, धीरे-धीरे, रुक-रुककर एक-एक शब्द श्रोताओं के समक्ष रखते हैं। कई प्रोफेसर इस धारणा का अक्षरशः पालन करते हुए भी पाए जाते हैं। सर ने अपनी अध्यापन-शैली के द्वारा इस पुराने ‘क्लीशे’ को तोड़ा है और अध्यापन की एक नई शैली स्थापित की है। जे.सी. सर का पढ़ाना ऐसा था जैसे वे हँस-हँसकर विद्यार्थियों से वार्तालाप कर रहे हों। वे विद्वता-प्रदर्शन का भाव बिल्कुल नहीं रखते थे अपितु विद्यार्थियों से सहज एवं मित्रसुलभ ढंग से पेश आते थे। दूसरी ओर बिना विराम के धाराप्रवाह बोलने के लिए सर मशहूर हैं। सर ने इसे प्रमाणित किया कि ज्ञान किसी तयशुदा नियम में बंधा नहीं होता और प्रकृत ज्ञानी नकली व्यक्तित्व ओढ़कर नहीं चलते। पढ़ाते समय किसी संजीदे विषय को नीरस ढंग से न पढ़ाकर उसकी उपादेयता को समझाने के लिए यथार्थ से, जन-जीवन से तथ्य और उदाहरण देते रहते थे। कभी खूब हँसना और हँसाना तो कभी खूब गंभीर रवैया, हर बेंच की ओर घूमकर पढ़ाना उनके अध्यापन की विशेषता थी। जे.एन.यू के अपने छात्र-जीवन के संघर्षों तथा अनुभवों को बीच-बीच में सुनाकर विद्यार्थियों का हौसला-अफ़ज़ाई करते रहते थे। कई विद्यार्थियों की ज़िंदगी बदलने में भी उनकी अहम भूमिका रही है।

जे.सी. सर के व्यक्तित्व के प्रभाव को समझने के लिए स्नातकोत्तर के दौरान का एक अनुभव बताना ज़रूरी है। मेरी एक बंगाली दोस्त है जो बिल्कुल मेरे बगल में बैठती थी। उसने एक दिन अपने ममेरे भाई को अपनी कुछ किताबें देने के लिए कलकत्ता विश्वविद्यालय बुला लिया। कहा ठीक ढाई बजे ही आना; दस मिनट पहले आना लेकिन बाद में मत आना। उस दिन ठीक ढाई बजे जे.सी. सर की कक्षा होती थी। मुझसे कहा कि आज एक चीज़ होगी जो तुम्हें बाद में बताऊंगी। ढाई बजे तक जिस शिक्षक की कक्षा थी वे पढ़ाकर निकले तो उसका भाई बाहर खड़ा था। मेरी दोस्त किताबें लेकर गई और तीन-चार मिनट बात करती रही जब तक जे.सी. सर स्टाफ़रूम से न निकले और हमारी कक्षा में न प्रवेश करें। ज्योंही सर निकले वह तुरंत बोली ‘सर आश्छेन...’। उसके भाई ने सर को मुड़कर देखा और पूछा, ‘इनी सर?’ सर दोनों के सामने से आकर कक्षा में प्रवेश किए। मेरी दोस्त भी कक्षा में घुस गई। मेरे पास बैठकर बोली कि उसने सर को देख लिया; मैं यही चाहती थी। मैंने पूछा कि इससे क्या होगा? उसने कहा, ‘पॉरे बोलबो तोके’(बाद में बताऊँगी)। अगले दिन आकर बोली कि उसके भाई ने फ़ोन पर पूछा, ‘तोमादेर सर तो भीषोन शुंदोर आर स्मार्ट! कि बेक्तित्तो! उनी हिन्दी पॉरान? ओनार नाम की?’ (तुम लोगों के सर तो बहुत सुंदर और स्मार्ट हैं! क्या व्यक्तित्व है! उनका नाम क्या है?)

बस क्या था! उस लड़की ने तुरंत जे.सी. सर की लंबी फ़ेहरिस्त दे डाली, “वे जे.एन.यू. से पढ़कर आए हैं, सिर्फ़ सुंदर ही नहीं हैं असामान्य मेधावी भी हैं...मीडिया पढ़ाते हैं....बहुत पढ़ते हैं और खूब सारी किताबें लिख चुके हैं....पढ़ाते समय अंग्रेज़ी शब्दों का बीच-बीच में प्रयोग करते हैं। वैसे ये तो कुछ भी नहीं हैं और भी हैंडसम और स्मार्ट शिक्षक हैं हिन्दी विभाग में...” हालांकि वह खुद भी जानती थी कि जे.सी. जैसे कोई नहीं तभी सर की कक्षा के पहले भाई को हिन्दी विभाग का दृष्टांत पेश करने के लिए बुलाई थी। दरअसल मेरी दोस्त इस बात को लेकर परेशान थी कि बंगालियों में हिन्दी विभाग के शिक्षकों के बारे में एक किस्म की धारणा प्रचलित है जिसे वह बदलना चाहती थी। इसीलिए उसने यह सारा प्रपंच रचा और पुरानी धारणा को तोड़ने के लिए एकमात्र मुकम्मल इंसान हैं जे.सी. सर और उनका सम्मोहक व्यक्तित्व।

आदर्श शिक्षक का कोई पैमाना नहीं होता लेकिन बेहतरीन शिक्षक वह होता है जो विद्यार्थियों में देश की समसामयिक समस्याओं के प्रति बोध निर्मित करता है। वर्तमान राजनीतिक, समाजार्थिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रति जागरुकता पैदा करता है, लोकतांत्रिक चेतना पैदा करता है। जे.सी. सर नोट्स आधारित पढ़ाई और नौकरी केन्द्रित पढाई के घोर विरोधी हैं तो दूसरी ओर प्रयोजन-मुक्त पढ़ाई या ज्ञानार्जित पढ़ाई के प्रबल समर्थक। स्नातकोत्तर में मीडिया पढ़ाते समय सर साम्प्रदायिकता जैसी समस्या की गंभीरता पर खूब बात करते रहे हैं। उसके असली कारण और कट्टरपंथी ताकतों के मंसूबों, उपभोक्तावाद, पितृसत्ता की आंतरिक रणनीति एवं उसके अंतर्विरोध उनकी चिंता के केन्द्र में होते थे। स्त्रीवाद पढ़ाते समय छात्राओं के अंदर लगातार संवैधानिक अधिकारों को लेकर सचेतनता निर्मित किया करते थे।

पीएच. डी. के दौरान शोध-निर्देशक खोजते समय मुझे खासा दिक्कत का सामना करना पड़ा। उसी साल यू.जी.सी. ने यह नियम तय कर दिया कि किसी भी निर्देशक के अंतर्गत अधिकतम स्कॉलरों की संख्या आठ होगी। एक तो मेरा कलकत्ता विश्वविद्यालय के किसी भी प्रोफेसर से कोई व्यक्तिगत जान-पहचान न था, दूसरा, किसी भी निर्देशक के पास जगह खाली न थी। मैंने दो-तीन कॉलेज के प्रोफेसरों से बात की लेकिन बाद में पता चला कि चूँकि मैं जे.आर.एफ़ थी सो यह नियम था कि मुझे कलकत्ता विश्वविद्यालय में ही पढ़ाने वाले किसी शिक्षक के साथ अपना पंजीकरण करना होगा।

मैं ऐसी दशा में पहुंच चुकी थी कि कोई न ले पाए और मैं अपने जे.आर.एफ. से हाथ धो बैठूं। पंजीकरण करने के बाद उसका प्रमाण दिल्ली भेजने की अंतिम तारीख में बस एक सप्ताह बाकी था। विश्वविद्यालय के जे.आर.एफ. विभाग से लगातार तगादा दिया जा रहा था। मेरी आर्थिक परिस्थिति भी ऐसी न थी कि बिना आर्थिक सहयोग के थीसिस लिख लूँ और वह भी अपने घर से दूर पेयिंग-गेस्ट में रहकर। एम.ए. प्रथम श्रेणी और जे.आर.एफ. हाथ में लेकर मैं एक प्रोफेसर से दूसरे प्रोफेसर के पास जाती रही लेकिन नकारात्मकता ही हाथ लगी। किसी प्रोफेसर ने उत्तरबंग विश्वविद्यालय में आवेदन करने का परामर्श भी दे डाला। ऐसी हताश अवस्था में एकमात्र सकारात्मक व्यवहार जे.सी. सर से मिला।

हालांकि सर से जुड़ने के लिए विद्यार्थी दो-ढाई साल तक प्रतीक्षा करते थे लेकिन इस विकट समस्या और मेरी पीएच.डी. के प्रति प्रतिबद्धता को ध्यान में रखते हुए अततः जे.सी. सर मेरे शोध-निर्देशक बनने के लिए राज़ी हो गए। मुझे लेने का एक और कारण मेरा गैर-तिकड़मी होना भी रहा है, सर तिकड़मी विद्यार्थियों को सख्त नापसंद करते थे। निर्धारित अंतिम दिन के दो दिन पहले मेरा पीएच.डी. में पंजीकरण हुआ। सर उस दिन साथ न होते तो न मुझे जे.आर.एफ. की सुविधा मिल पाती न मेरी थीसिस ही लिखी जाती। उनका मानना है कि लड़कियाँ अनेक बाधाएँ तोड़कर आगे आती हैं, उनकी हर तरह से सहायता की जानी चाहिए। इत्तेफ़ाक से उनके साथ जुड़े विद्यार्थियों में लड़कियों की संख्या अधिकतम रही है। सर तहेदिल से चाहते थे कि लड़कियाँ बढ़िया से शोध-प्रबंध लिख ले, इसके लिए सर भरपूर विचारात्मक, ज्ञानात्मक और किताबों से सहयोग देते रहे। यह भी सत्य है कि पढ़ने, मेहनत करने एवं किताबें खरीदकर खूब पढ़ने वाले विद्यार्थी उनके प्रिय रहे हैं। शोधार्थियों से घर का काम करवाना, रसोईघर में सब्ज़ी-पराठे बनवाना उनकी आदत में शुमार नहीं था अपितु इस तरह की मानसिकता से सर घृणा करते हैं। वहीं अपने घर आए विद्यार्थियों को स्वयं अपने हाथों से पकाकर खिलाते रहे हैं।

अन्य शोध-निर्देशकों के अंतर्गत काम करने वाले शोध-छात्राओं की जे.सी. सर को लेकर जो उत्सुकता थी वह काबिल-ए-गौर और दिलचस्प थी। मेरे शोध-निर्देशक का नाम पता चलते ही किस्म-किस्म के अजीबोगरीब सवाल विभिन्न विद्यार्थियों के मन के अंधेरे तहों से झांकते हुए मुझ तक पहुँचते थे। सवालों के साथ-साथ उनके गंभीर सुझाव भी आते थे। कुछ नमूने पढ़िए— “सर से घर में मिलती हो? अगर घर नहीं जाती हो तो जाना चाहिए। कहाँ बैठती हो? सोफ़े हैं घर में? कितने रूम हैं? क्या! नहीं पता! तुम्हें घूमकर देखना चाहिए पूरा घर। घर में डाइनिंग टेबिल है? कहाँ खाते होंगे? घर का राशन सर खुद खरीदते हैं? नौकरानी है घर पर या सारा काम खुद करते हैं? घर में क्या पहनते हैं?” ऐसे ही कितने गैर-अकादमिक सवाल थे जो कायदे से शिक्षक को लेकर नहीं पूछे जाने चाहिए। ऐसे ही किसी उत्सुक शोधार्थी(मेरी हमउम्र) ने शोध-निर्देशक का नाम पूछा तो मैंने बहुत धीरे से कह दिया ‘जे.सी. सर’। उसे सुनाई न दिया तो ज़रा ज़ोर से कहा। वह सुनते ही चहक उठी, बोली, “सर का नाम इतने धीरे ले रही हो। तुम भाग्यशाली हो सर मिले हैं बतौर गाइड। तुम्हें सर का नाम ज़ोर से उच्चारण करना चाहिए।” फिर उच्चारण करके समझाने लगी कि ऐसे कहो। जैसे सर न हुए इलेक्ट्रिक शॉक हुए! ऐसा था ‘जे.सी.’ नाम का आकर्षण!

बतौर निर्देशक सर ने सबसे पहली बात जो कही वह थी, प्रथम श्रेणी की किताबें पढ़ोगी; द्वितीय या तृतीय श्रेणी की नहीं। शुरु में मेरे लिए पुस्तकों में प्रथम और द्वितीय का भेद करना ज़रा मुश्किल था लेकिन काम करते हुए मैं स्वयं इससे वाकिफ़ होने लगी। यह ज्ञान जीवनभर के लिए मेरी पूँजी बनी हुई है। अपने साथ काम करने वाले विद्यार्थियों को तराश कर निखारने में सर की विशिष्ट भूमिका रही है। मुझे प्रथम अध्याय ‘जनतंत्र’ पर लिखना था जिसके लिए राजनीति-विज्ञान की किताबों को पढ़ना ज़रूरी था। मैंने सर से कुछ महत्वपूर्ण किताबों का नाम पूछा तो उन्होंने शुरु में ही ‘कन्स्टिट्यूशन असेम्ब्ली डिबेट्स’ (Constitution Assembly Debates) पढ़ने के लिए कहा। यह बारह खंडों में विशालकाय किताबों का संकलन है। मैंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का भरपूर प्रयोग करते हुए सारे खंड पढ़ लिए और इसने मेरे दृष्टिकोण और लेखन की दिशा को बदलने में अहम भूमिका अदा की।

मैंने पी.एच.डी. के पाँच साल के अपने कार्यकाल के तहत दो पुस्तकें लिखने का काम किया। पहली, मेरी थीसिस तथा दूसरी ‘बलात्कार, संस्कृति और स्त्रीवाद’ शीर्षक पुस्तक। यह दुनिया में पहली और आखिरी घटना होगी कि किसी गाइड ने अपनी शोध-छात्रा को बिना परेशान किए शोध लिख लेने के बाद बचे हुए कार्यकाल में दूसरी किताब लिखने की अनुमति दे दी। मैंने समय का सदुपयोग किया और दो किताबों को अंजाम दे दिया। बलात्कार वाली किताब लिखते समय किसी भी शंका व दुविधा के दौरान लगातार सर से बहुमूल्य सहयोग मिलता रहा।

हालांकि सर ने बतौर शोध-निर्देशक हर तरह सहयोग किया। लेकिन उनका मानना है कि नौकरी खोजने का कर्म स्वयं का है। विद्यार्थियों को पीएच.डी. में लेते समय पहले ही कह देते थे कि वे नौकरी लगाने में मदद नहीं करेंगे। यह जानते हुए भी जो विद्यार्थी उनसे जुड़े हैं उनमें लड़कियों की संख्या अधिक है। यही वजह है कि जे.सी. सर लड़कियों को साहसी मानते आए हैं। वे मानकर चलते हैं कि विद्यार्थी अपनी लड़ाई स्वयं लड़ना सीखें। इस तरह वे परनिर्भरता के बजाय आत्मनिर्भरता पर ज़ोर देते रहे हैं।

हालांकि सर की विशेषज्ञता का क्षेत्र मीडिया है लेकिन उन्हें राजनीतिक विषय विशेष पसंद है। वे हिन्दी साहित्य तथा साहित्य के अतिरिक्त किसी भी विषय पर चाहे पर्यावरण हो, आदिवासी हो, फ़िल्मी नायक-नायिका हो, पक्षी हो पर ज्ञानवर्धक और सरस ढंग से घंटों बोल सकते हैं। संगोष्ठी में बुलाने वाले उन्हें आम तौर पर स्त्री-विमर्श या मीडिया पर ही बोलने के लिए बुलाते हैं जबकि वे अन्य विषयों पर इतनी गहन जानकारी रखते हैं कि जब तक आप न सुनें आप समझ न पाएं। संगोष्ठियों में अन्य वक्ताओं के बाद जब जे.सी. सर बोलने आते थे तो बोरियत की पराकाष्ठा तक पहुँच चुके सुप्तप्राय श्रोताओं को झकझोर देते थे। सिर्फ़ अपनी तेज़ आवाज़ और दमदार भाषण-शैली से ही नहीं अपने मौलिक दृष्टिकोण से भी वे श्रोताओं में हलचल, जिज्ञासा और कौतूहल पैदा कर देते हैं। यह संभव ही नहीं कि आपने उनका भाषण सुना और उन्हें भूल गए। वे बोलते नहीं हैं सिहरन पैदा करते हैं। उनकी बातें चेतना की गहराई में धँस जाती है, नयी दृष्टि देती है, पढ़ने का नया उत्साह जगाती है। संगोष्ठियों में भाषण के ज़रिये जिनकी धारणाओं का खंडन करते थे, वे उनके तीखे शब्दबाणों से काफ़ी दिन तक घायल पड़े रहते थे।

स्त्री-साहित्य या स्त्रीवाद पर जितना शानदार भाषण सर देते हैं वैसा ऊर्जस्वित करने वाला भाषण शायद ही कोई दे पाए। लक्ष्य करने वाली बात यह है कि पितृसत्ता के प्रति उनकी घृणा केवल लेखन का विषय मात्र नहीं है; उनके ज़ेहन व उनकी चेतना का अंग है। इसके लिए वे रामचंद्र शुक्ल से लेकर रामविलास शर्मा और नामवर सिंह तक को भी नहीं बख्शते। यही वजह है कि स्त्री पर बात करते समय वे पुंसवाद की परतें खोलकर पुंसवाद की बेहद तीक्ष्ण आलोचना करते हैं। पढ़ाते समय विद्यार्थियों को दहेज-प्रथा, बुर्क़ा जैसे सामंती आचारों से मुक्त करने का सचेत प्रयत्न भी करते रहे हैं। इसमें सफल भी हुए हैं। उनके मानवीय आचरण के कुछ नमूने हमारे बैच में ही घटित हुए। जिस समय मैं एम.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा थी उसी बैच में दो लड़कियाँ गर्भवती थीं। जुलाई में जिस समय परीक्षा होनी थी उसी समय उनका प्रसव होना था। सो उन्होंने सर से अनुरोध किया(उस समय जे.सी.सर विभागाध्यक्ष थे) कि परीक्षा कुछ दिन पीछे कर दी जाए। सर ने परीक्षा सितंबर में तय करके पूरी कक्षा में यह बात कही और उन तीनों की समस्या के प्रति उदार और संवेदनशील होने के लिए कहा। स्त्रीवादी होना सिर्फ़ लेखन का विषय नहीं है उसे व्यवहार में भी चरितार्थ करना होता है। सर ने हर संभव तरीके से इसे कर दिखाया।

शिक्षक केवल उन्हीं विद्यार्थियों के नहीं होते जिन्हें उन्होंने पढ़ाया है। वे हर एक जिज्ञासु के होते हैं। सर सिर्फ़ विचार और लेखन में ही जनपक्षधर नहीं हैं इसे उन्होंने अपने कर्म में भी उतारा है। किसी भी निर्देशक के अंतर्गत काम करने वाले विद्यार्थियों को अगर काम के सिलसिले में कोई सवाल पूछने हों, चाहे वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के हों या बंगाल के बाहर के किसी भी कॉलेज या विश्वविद्यालय के हों, सर तुरंत अपने मौलिक विचारों का सम्भार खोलकर उनके हितयशी बन जाते हैं। कल या परसों फ़ोन कीजिए या अलां-फलां दिन मिलिए तब हम अपने ज्ञान का पिटारा खोलेंगे या सोचकर बतायेंगे वाली मनोदशा व व्यक्तित्व सर की कभी नहीं रही। वे तत्क्षण किसी भी विषय पर बिना पूर्व तैयारी के बोल सकते हैं। किसी भी परिचित या अपरिचित विद्यार्थी की कभी भी मदद कर देते हैं।

सर को सबसे ज़्यादा पसंद है अपने साथ जुड़े शोधार्थियों के साथ खुलकर हर विषय पर बात करना और उनकी बातें सुनना। अधिकांश शिक्षक शोधार्थियों को स्पेस नहीं देते, वे स्वयं बोलते हैं लेकिन अपने विद्यार्थियों की नहीं सुनते। परंतु जे.सी. सर विद्यार्थियों को एक स्वतंत्र स्पेस देते रहे हैं। यही वजह है कि उनसे जुड़े सारे शोधार्थी खुलकर अपने मन के विचार, अपनी दुविधा, व्यक्तिगत दुख-सुख आदि साझा करते रहे हैं और सर से उचित परामर्श लेते रहे हैं। शोध-विषय से संबंधित बात करने के लिए सर को कभी भी मुकरते या व्यस्तता का अभिनय करते नहीं देखा। वे तुरंत बुलाते थे और शंकाओं का समाधान कर कुछ अच्छी पुस्तकों का नाम बताते या कभी-कभी पुस्तक पढ़ने के लिए देते थे। वास्तव में एक शोध-निर्देशक की भूमिका प्रेरक की होती है। शोधार्थियों को परेशान करना, उनसे कहना कि एक अध्याय लिखकर लाइए तब फ़ेलोशिप के फ़ॉर्म पर हस्ताक्षर करेंगे, उन्हें किसी जगह बुलाकर उनसे न मिलना आदि खराब आदतें उन्हें कतई पसंद नहीं। सर ने ऐसा कभी किया भी नहीं। वे शोधार्थियों के लिए प्रेरणाश्रोत का काम करते रहे हैं। सर मेरे लिए हमेशा प्रेरक रहे हैं और सदा रहेंगे।

सर के शख़्सियत की खासियत है कि वे मार्क्सवादी और उदारचेता दोनों हैं। मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध होते हुए भी वे विरोधी विचारधारा के लोगों के साथ सहृदयतापूर्वक वार्तालाप करते हैं। ज्ञान की अपनी गरिमा होती है। यह गरिमा सर में समाहित है। उनकी किताब से उनका ज़िक्र न करते हुए हूबहू उतारने वालों के बारे में उनकी राय है कि करने दो, ज्ञान का विस्तार हो रहा है....यही तो हमारा उद्देश्य है कि जनमानस में नये और अच्छे विचार फैले।

अब तक सर की लगभग पैंसठ किताबें प्रकाशित हो चुकी है। वैसे तो उनकी हर किताब महत्वपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक है लेकिन कुछ खास किताबों का ज़िक्र करना चाहूँगी जिसे हिन्दी साहित्य के हर विद्यार्थी को पढ़ना चाहिए। मसलन् ‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’, ‘मीडिया समग्र’, ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’, ‘उत्तर-आधुनिकतावाद’, ‘कामुकता, पॉर्नोग्राफी और स्त्रीवाद’, ‘उंबर्तो इको, चिह्नशास्त्र, साहित्य और मीडिया’(मीडिया सिद्धांतकार-4) आदि।

‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’ हिन्दी साहित्य में स्त्रीवादी दृष्टिकोण से लिखी गई आलोचना की पहली पुस्तक है। हिन्दी साहित्य में स्त्री रचनाकारों की पहचान भक्तिकाल में मीरा और आधुनिक काल में महादेवी तक सिमटकर रह गई थी। प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने इस सीमित पहचान को विस्तार दिया और पुरुष-आलोचकों की कलम-शिलाओं तले दबी पड़ी उपेक्षिता कवयित्रियों एवं निबंध लेखिकाओं को उनकी रचनाओं सहित पुनर्जीवित किया।

इतिहास ग्रंथों की मानें तो निर्गुण काव्यधारा की शुरुआत कबीर एवं अन्य संत पुरुष कवियों से होती है। प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने सावित्री सिन्हा की शोध-पुस्तक ‘मध्यकालीन हिंदी कवयित्रियाँ’ के हवाले से उमा और पार्वती से भक्तिकाल का एवं निर्गुण काव्यधारा का आरंभ माना है। उन्होंने मध्यकाल के स्त्री रचित काव्य को दो वर्गों में विभक्त किया—पहला लोकप्रिय स्त्रीवादी काव्यधारा तथा दूसरा अभिजनवादी स्त्री काव्यधारा। लोकप्रिय स्त्रीवादी काव्यधारा में उमा, पार्वती, मुक्ताबाई, झीमा चारिणी, मीराबाई, गंगाबाई, रत्नावली, शेख रंगरेजन, ताज, सुंदर कली, इंद्रामती, दयाबाई, सहजोबाई आदि कई कवयित्रियाँ आती हैं। अभिजनवादी स्त्री काव्यधारा में महारानी सोन कुंवरि, वृषभानु कुंवरि, चंपा दे, ठकुरानी काकरेची, मधुर अली, पद्माचारणी, प्रवीण पातुर राय, रूपवती बेगम, जुगल प्रिया आदि आती हैं।

यह दुखद है कि किसी भी विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रम में भक्तिकाल की पहली कवयित्री के तौर पर उमा और पार्वती की कविताएं अब तक शामिल नहीं हो पाई, अन्य कवयित्रियों एवं लेखिकाओं की तो बात ही क्या! प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी एवं सुधा सिंह की ‘स्त्री-काव्यधारा’ शीर्षक पुस्तक में इन्हीं मध्यकालीन एवं आधुनिककालीन (सन् 1388-1950 तक) कवयित्रियों की चुनिंदा कविताएं संकलित है तथा ‘स्वाधीनता-संग्राम, हिन्दी प्रेस और स्त्री का वैकल्पिक क्षेत्र’ शीर्षक पुस्तक में विभिन्न आधुनिक लेखिकाओं द्वारा देश की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों एवं समस्याओं पर लिखा गया विचारशील निबंध संकलित है।

‘स्त्रीवादी साहित्य विमर्श’ पुस्तक पितृसत्तात्मक साहित्य की गंभीर आलोचना तथा स्त्रीवादी साहित्यालोचना की दृष्टि से स्त्री-साहित्य के इतिहास-लेखन एवं मूल्यांकन पर केन्द्रित है। इस पुस्तक में संस्कृत स्त्री लेखिकाओं एवं पुरुष लेखकों के काव्यों का विस्तार से विवेचन हुआ है। स्वतंत्रता-पूर्व एवं स्वातंत्र्योत्तर स्त्री साहित्य, लेस्बियन स्त्री-साहित्य सैद्धांतिकी पर भी गंभीरता से विवेचन हुआ है। एलेन शोवाल्टर, मिशेल बरेट, ज्यांक लाकां, लूस इरीगरी, हेलिनी सिक्साउस, एद्रीनी रीच आदि विभिन्न स्त्रीवादी सिद्धांतकारों के सिद्धांतों एवं स्त्री भाषा संबंधी चिंतन का विश्लेषण किया गया है। राजेंद्रबाला घोष, उषा देवी मित्रा, कमला चौधरी, होमवती देवी, सत्यवती मल्लिक, शिवरानी देवी, महादेवी वर्मा से लेकर सुभद्राकुमारी चौहान तक के कथा-साहित्य का भी मूल्यांकन हुआ है।

कुल मिलाकर स्त्री साहित्य एवं विचारधारा की विस्तृत जानकारी हेतु यह पुस्तक हिन्दी साहित्य के अध्येताओं के लिए एक बहुमूल्य धरोहर से कम नहीं। इस पुस्तक के प्रकाशित होने का सकारात्मक परिणाम यह निकला कि विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में ‘स्त्री-साहित्य’ का समावेश हुआ एवं अनेक अनुसंधानात्मक कार्य भी हुए और लगातार हो रहे हैं।

प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी की दूसरी महत्वपूर्ण कृति ‘मीडिया समग्र’ है। यह कुल ग्यारह खंडों में है। मीडिया समग्र समय-समय पर प्रकाशित मीडिया संबंधित पुस्तकों में से चुनिन्दा पुस्तकों का संग्रह है। इसमें हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास का मास-मीडिया के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण हुआ है। इस पुस्तक में माध्यम, जनमाध्यम से लेकर जनसंचार माध्यम की संचार क्रांति के इतिहास, उसकी विचारधारा, संस्कृति और समाज के अंतस्संबंधों का विस्तृत विवेचन हुआ है। इसके अतिरिक्त साम्प्रदायिकता, युद्ध और आतंकवाद, माध्यम साम्राज्यवाद, ब्लॉगिंग तथा साइबर संस्कृति पर भी पूरी संजीदगी से विचार-विमर्श हुआ है। कहा जा सकता है कि मीडिया की अंतर्वस्तु, उसकी आंतरिक रणनीति, समाज एवं संस्कृति पर उसके प्रभाव को समझने के लिहाज से मीडिया समग्र का कोई विकल्प नहीं।

‘साहित्य का इतिहास दर्शन’ पुस्तक इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें अस्मिता के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी साहित्य के इतिहास का पुनरावलोकन हुआ है। हिन्दी साहित्य के जितने भी इतिहास अब तक लिखे गए हैं वे सब पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से लिखे गए हैं। यही वजह है कि उसमें स्त्री और दलित साहित्येतिहास सिरे से गायब है। प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी के अनुसार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने विधेयवादी इतिहास-दृष्टि के अंतर्गत जो नायककेंद्रित मॉडल चुना है, उससे साम्प्रदायिक नज़रिये का विस्तार होता है। उनका मानना है कि दलित तथा स्त्री साहित्येतिहास को हिन्दी साहित्य के इतिहास में शामिल किया जाए। साथ ही इतिहास के नए परिप्रेक्ष्य में नई विधाओं जैसे फिल्मी पटकथा, सीरियल पटकथा आदि को भी हिन्दी साहित्य का हिस्सा माना जाए।

जे.सी. सर के लेखन की धुरी है अंतर्विषयवर्ती दृष्टिकोण। उनके लेखन का फ़लक काफ़ी बड़ा है। जहाँ मार्क्सवादी विचारधारा मदद नहीं करती वहां उन्होंने अन्य विचारधारा को अपने मूल्यांकन का आधार बनाया है। मसलन् स्त्रीवाद, विखंडनवाद, मनोविज्ञान, मानवाधिकार का दृष्टिकोण आदि। अंतर्विषयवर्ती दृष्टि आधुनिक मार्क्सवादी दृष्टि है जिसका उन्होंने विभिन्न दायरे के लेखन के क्षेत्र में प्रयोग किया है। उनके लेखों में मानवाधिकार का दृष्टिकोण भी प्रबल है। भारत जैसे बहुलतावादी सांस्कृतिक देश में मानवाधिकार के धरातल पर ही समन्वयवादी समाज की स्थापना संभव है।

वर्तमान युग में किसी भी इंसान के लिए जनतांत्रिक चेतना एवं नज़रिए का विकास बेहद ज़रूरी शर्त है। लोकतंत्र का अर्थ केवल मतदान नहीं होता; लोकतंत्र का अर्थ आचरण भी होता है। लोकतंत्र और लोकतांत्रिक नियम के साथ-साथ लोकतांत्रिक मनुष्य का अस्तित्व भी ज़रूरी होता है। लोकतांत्रिक मनुष्य के बिना लोकतंत्र अधूरा है। जे.सी. सर ने लोकतांत्रिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्य तथा लोकतांत्रिक आचरण को अपने सम्पूर्ण चरित्र में विकसित किया। एक लेखक एवं चिंतक के तौर पर किसी विचार पर लिखना और बतौर शिक्षक एवं इंसान उस विचार को आचरण में उतारना मुश्किलदेह हुआ करता है। किसी भी पद-प्रतिष्ठा से मोहमुक्त रहते हुए, एक सामान्य जीवन जीते हुए सर ने अपने शिक्षण-दायित्व का पूरी ईमानदारी के साथ निर्वाह किया। अपनी विचारधारा के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध रहते हुए देश की समसामयिक महत्वपूर्ण समस्याओं पर बिना विचलन के उन्होंने लगातार लिखा और अभी भी लिख रहे हैं। किसी भी राजनीतिक दल का जनविरोधी पक्ष चाहे वह साम्प्रदायिकता का सवाल हो या जन-उत्पीड़न का, जे.सी. सर ने उसके खिलाफ़ लगातार अपनी जनपक्षधर आवाज़ उठाई। यही बात एक लोकतांत्रिक मनुष्य होने का प्रमाण है।

 


Thursday, 12 December 2019

नोट्स-संस्कृति के खतरे


                                   
 आज भारत में उच्च-शिक्षा के क्षेत्र में युवा-वर्ग में स्वायत्त पढ़ाई की अपेक्षा नोट्स आधारित पढ़ाई बेहद प्रचलन में है। कॉलेज और विश्वविद्यालय से जुड़े विद्यार्थी मूलतः पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ने के अभ्यस्त हैं। पाठ्यक्रम के बाहर के विषयों में उनकी रुचि कम है। वे पाठ्यक्रम को ही पढ़ाई मानकर चलते हैं। साथ ही ये विद्यार्थी यह भी चाहते हैं कि यह पढ़ाई कष्टसाध्य न हो और परीक्षा में नंबर भी बढ़िया आए जिससे बाद में नौकरी मिलने में कोई असुविधा न हो।फलतः कॉलेज या विश्वविद्यालय में दाखिला मिलने के दूसरे दिन से ही बनी-बनाई लेखनी या तथाकथित नोट्स जुगाड़ की पद्धति चलती रहती है। उसके बाद ठीक परीक्षा के कुछ चंद महीने पहले से इन नोटो को रटने की रटंत-विद्या शुरु होती है। किसी तरह से नोट्स रटकर परीक्षा के उपरांत डिग्री हासिल करना इनके जीवन का मूल उद्देश्य और लक्ष्य होता है।                      
                         इस दौरान कमसंख्यक छात्र-छात्राएं होते हैं जो व्यक्तिगत श्रमसाध्य कोशिश के तहत लाइब्रेरी की ख़ाक छानकर पढ़ते हैं,हर रोज़ कक्षा में जाते हैं और खुद की मेहनत से लिखे लेख के आधार पर परीक्षा की तैयारी कर परीक्षा देते हैं।बाकि छात्र-छात्राएं इस कोशिश में रहते हैं कि किसी तरह पढ़ाई की लड़ाई में तेज़-तर्रार और आगे रहने वाले सीनियरों से पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाने वाले विषयों पर नोट्स उपलब्ध हो जाए। इस दौरान ये छात्र-छात्राएं अपनी सारी महनत सीनियरों की चाटुकारिता या पैरोकारी में गुज़ारते हैं।बाकि समय मौज-मस्ती में व्यतीत करने में लगे रहते हैं।कक्षा में भी ये गैर-हाजिरी लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराते हैं। 

                      
                         इसी प्रकार आगे चलकर विभिन्न प्रतियोगितामूलक परीक्षाओं जैसे नेट, सेट और एस.एस.सी. में भी ये महान विद्यार्थी व्यक्तिगत श्रम-अर्जित पढ़ाई न कर विभिन्न जगहों से जुगाड़े नोट्स को तोते की तरह रटकर यानी रटंत पद्धति से परीक्षा में उत्तीर्ण होने की जी-तोड़ कोशिश में लगे रहते हैं।इस दौरान भी इन्हें किसी भी तरह के पुस्तकालयों में पढ़ते न देखा जाता है और न किताब खरीदते।फलतः गहरे ज्ञान के अभाववश परीक्षा हॉल में भी विभिन्न तरह की गलत हरकतों मसलन् कानाफूसी कर उत्तर जानना, इशारों से दूसरों तक उत्तर पहुँचाना, उत्तर के लिए चीट इत्यादि की सहायता लेना आदि में ये पारदर्शी नज़र आते हैं।दिलचस्प बात यह है कि इन हरकतों के बावजूद भी अगर ये परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं होते तो शिक्षकों पर या कॉपी जांचने वालों पर सारा दोष मढ़ देते हैं और जिस विद्यार्थी को सफलता मिलती है उसके बारे में गलत अफवाह फैलाने में लगे रहते हैं।कायदे से इस तरह की हरकतें बंद होनी चाहिए।                       
                         यह समस्या प्रायः हर विषय की है चाहे वह कला का विद्यार्थी हो, विज्ञान का, वाणिज्य का या किसी और विषय का।किंतु खास तौर पर साहित्य के क्षेत्र में यह समस्या ज़्यादातर नज़र आ रहा है जहां इस तरह की विद्यार्थियों के सुंदर नमूने हैं।इन विद्यार्थियों का सीधा तर्क है – गहन अध्ययन की क्या ज़रुरत है, बने-बनाए नोट्स पढ़ो और पास करो। इससे दो चीज़ साफ होती है --- एक, विद्यार्थियों में अध्ययन करने यानी मेहनत करके पढ़ाई करने की प्रवृत्ति का लोप हो रहा है और दूसरा, ज्ञान अर्जित करने की इच्छा का व्यापक तौर पर अभाव दिखाई दे रहा है। नौकरी की हुड़दंग में लगे ये विद्यार्थी किसी भी विषय से संबंधित अधकचरी जानकारी रखते हैं। डिग्री हासिल कर अपने को शिक्षित समझ अपनी अधूरी जानकारी के आधार पर पढ़ने वाले विद्यार्थियों से तर्क करते हैं। कम ज्ञान के बावजूद इनके व्यवहार में विद्वतापूर्ण अचरण भी गौरतलब है।
                          किंतु यह चिंता की बात है कि यदि इस तरह की रटी-रटंत या नौकरी-आधारित पढ़ाई क्रमशः प्रचलन में आता जाएगा तो आने वाली नई पीढ़ी भी इन पूर्वजों से दीक्षा लेकर इसी ओर मुखातिब होगी। फलतः शिक्षा के स्तर में भयानक गिरावट आएगी। शिक्षा के स्तर और मूल्य में इस गिरावट का नतीजा यह होगा कि शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर से लेकर विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों के ज्ञान स्तर के अभाव का हमें हर पग पर सामना करना होगा। फलतः देश में शिक्षित अज्ञानी की संख्या में भी इज़ाफा होगा जो हर हाल में ग्रहण योग्य नहीं हो सकता। इस अज्ञान की वजह से ही आज शिक्षित होने के बावजूद युवा-वर्ग की मानसिकता में बदलाव नज़र नहीं आ रहा। शिक्षित होकर भी वे भयंकर पिछड़े और संकुचित मानसिकता के शिकार नज़र आते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि व्यक्ति को तराशने में शिक्षा की बहुत बड़ी भूमिका होती है। बेहतर शिक्षा के फलस्वरुप एक बेहतर इंसान का निर्माण होता है। किंतु यदि शिक्षा डिग्री के कारण ली जा रही है और हमें अधजल गगरी भेंट कर रही है तो ऐसी शिक्षा का कोई मूल्य नहीं है। इस तरह की शिक्षा से व्यक्ति में अवसरवादिता, चाटुकारिता जैसी बीमारियां घर कर जाती है और आगे चलकर भी वे अपने जीवन में इसी तरह के हथकंडे अपनाते नज़र आते हैं। स्वाभाविक तौर पर यह एक गंभीर विवेचन का मसला बनता है चूंकि यह धड़ल्ले से समाज में फैलता जा रहा है। इसका पार्श्व-प्रभाव है, ज्ञान में कमी और संबंधित विषय में गहराई का अभाव।
                          
वस्तुतः इस मामले में देश की शिक्षा विभाग की ओर से पहल बेहद ज़रुरी है। विभिन्न विश्वविद्यालयों के निर्धारित पाठ्यक्रम में बदलाव ज़रुरी है। हर दो साल के अनन्तर इस पाठ्यक्रम में बदलाव होना चाहिए। इसके साथ ही नए-नए विषयों की ओर रुझान हो और विभिन्न वर्तमानकालिक मुद्दों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। खासकर साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न नए उपन्यासों, कहानियों, कविताओं और आलोचनाओं को पाठ्यक्रम में फेर-बदल कर रखा जाए। हालिया दौर की सूचनाओं से छात्र-छात्राओं को अवगत कराया जाए। पाश्चात्य साहित्य में हो रहे परिवर्तन से उन्हें वाकिफ़ कराया जाए। इससे विद्यार्थियों के पढ़ने की रुचि में इज़ाफा होगा और तथाकथित ढर्रे पर चली आ रही नोट्स पद्धति की पढ़ाई का मौका उन्हें नहीं मिलेगा। चूंकि नए विषयों पर नोट्स मिलना मुश्किलदेह है, अतः वे संबंधित विषयों से संबंधित विभिन्न पुस्तकों का अध्ययन करने में अपना मन लगाएंगे। इसके लिए विभिन्न पुस्तकालयों में जाकर पढ़ने की आदत विकसित होगी। पुराने घिसे-पीटे विषयों की विदाई होने पर सुधी और अध्ययनशील विद्यार्थियों को भी नए अनुसंधान का मौका मिलेगा। पढ़ाई में उनकी रुचि बढ़ेगी और वे नए-नए विषयों पर आधारित शोध-कार्यों की ओर मुखातिब होंगे।




Monday, 2 December 2019

स्त्री के वस्तुकरण में विज्ञापन की भूमिका


                                  

स्त्री के वस्तुकरण में जितनी मदद विज्ञापन ने की है उतना किसी और माध्यम ने नहीं।विज्ञापन ने स्त्री के इमेज को वस्तु में तब्दील करके उसे लोकप्रिय बनाने में गहरी भूमिका अदा की है।यही वजह है कि आज स्त्री घर में प्रयोग होने वाली सामान्य वस्तुओं से लेकर खास किस्म के प्रोडक्ट को भी विज्ञापनों के ज़रिए प्रोमोट करती हुई नज़र आती है। स्त्री साबुन, शैम्पु, हैंडवाश, बर्तन, फ़िनाइल, डीओ, तेल, विभिन्न तरह के लोशन, क्रीम, टॉयलेट क्लीनर से लेकर पुरुषों के दैनंन्दिन प्रयोग की चीज़ों के विज्ञापनों में भी दिखाई देती हैं। पुरुषों के अंर्तवस्त्रों या डीओड्रेंट्स के विज्ञापनों में तो अधनंगी स्त्रियां पुरुषों के साथ एक खास किस्म के कामुक अंदाज़ में प्रस्तुत की जाती हैं। इसका उद्देश्य होता है, स्त्रियों के कामोत्तेक हाव-भाव और सम्मोहक अंदाज़ के ज़रिए पुरुष दर्शकों को निर्दिष्ट विज्ञापन के प्रति आकर्षित करना और उस निश्चित ब्रांड के प्रति दर्शकों के रुझान को बढ़ाना जिससे वे उसे जल्द खरीदें।

                    यह देखा गया है कि खास किस्म के विज्ञापनों में भी स्त्री-शरीर के ज़रिए विज्ञापनों का प्रचार किया जाता है। मसलन् मोटापा कम करने या कहें स्लिम-फिटहोने के विज्ञापन मुख्यतः स्त्री-केंद्रित होते हैं। चाहे यह विज्ञापन मशीनों द्वारा वज़न कम करने का हो या रस और फल-सेवन के उपाय सुझाने वाला लेकिन हमेशा स्त्री-शरीर ही निशाने पर रहता है। इसमें एक तरफ ज़्यादा वज़न वाली अधनंगी (बिकिनी पहनी) स्त्री पेश की जाती है तो दूसरी तरफ स्लिम-अधनंगी स्त्री। एक तरफ ज़्यादा वज़न वाली के खाने का चार्ट दिखाया जाता है तो दूसरी तरफ कम वज़न वाली का। फिर दोनों की तुलना की जाती है कि किस तरह कम वज़न वाली स्त्री मशीन के प्रयोग से या कम सेवन कर आकर्षक, कामुक और सुंदर लग रही है, दूसरी तरफ अधिक वज़न वाली स्त्री वीभत्स, अकामुक और कुत्सित लग रही है। इसलिए फलां फलां चीज़ सेवन करें या फलां मशीन उपयोग में लाएं ताकि आप भी आकर्षक और कामुक दिख सकें।

                  आजकल फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइट्स में भी इस तरह के विज्ञापनों का खूब प्रचलन हो रहा है। इस तरह के विज्ञापनों का स्त्री को अपमानित करने और वस्तु में रुपांतरित करने में बड़ी भूमिका है। मध्यवर्ग की कुछ स्त्रियां इन विज्ञापनों से प्रभावित भी होती हैं। वे या तो मशीन का उपयोग करने लगती हैं या फिर डाइटिंग के नुस्खे अपनाती हैं। इससे स्पष्ट होता है कि विज्ञापन केवल स्त्री-शरीर ही नहीं स्त्री-विचार पर भी हमला बोलता है। वह तयशुदा विचारों को लोगों के दिमाग में थोपता है और इसमें खासकर स्त्रियां निशाने पर होती हैं।
                 यह विज्ञापनों का स्त्री-विरोधी या पुंसवादी रवैया है जो स्त्री की व्यक्तिगत इच्छाओं और आकांक्षाओं पर हमला करता है। स्त्री के शरीर को केंद्र में रखकर स्त्री को कमसिन होने के लिए उत्तेजित करना कायदे से उसे पुंस- भोग का शिकार बनाना है। स्त्री के ज़ेहन में यह बात बैठाया जाता है कि अगर वह कमसिन होगी तो वह पुरुषों को आकर्षित कर पाएगी। स्त्रियों में विज्ञापनों के ज़रिए यह जागरुकता पैदा किया जाता है कि वो अपने शरीर को लेकर सचेतन हो, उसे सही शक्ल दें। जायज़ है कि स्त्रियां अपनी इच्छाओं को महत्व न देकर दूसरों की या कहें पुरुषों की इच्छानुसार अपने को ढालने की जी-तोड़ कोशिश में लगी रहती है। वह अपने को आकर्षक और कामुक स्पर्श देने के लिए अपार मेहनत करती रहती है। धीरे-धीरे स्त्री अपनी स्वायत्त इच्छाओं के साथ-साथ अपना स्वायत्त व्यक्तित्व तक खो देती है और हर क्षण पुरुषों की इच्छानुसार परिचालित होती रहती है। अंततः स्त्री व्यक्तिकी बजाय पुरुषों के लिए एक मनोरंजक वस्तुया भोग्याबनकर रह जाती है।

                   सवाल यह है कि अधिकांश विज्ञापन स्त्री-शरीर केंद्रित ही क्यों होते हैं ? क्या स्त्री के अधोवस्त्र या निर्वस्त्र शरीर के ज़रिए विज्ञापन प्रचारित करने पर वस्तु के मार्केटिंग में इज़ाफा होता है? क्या इससे विज्ञापन कंपनी को फायदे होते हैं? ध्यान देने की बात है कि विज्ञापनों ने स्त्री के परंपरागत रुप को तवज्जो दी है लेकिन स्त्री का आधुनिक रुप विज्ञापनों में एक सिरे से गायब है। टी.वी. विज्ञापनों में स्त्री हमेशा अच्छी खरीददार के रुप में नज़र आती हैं लेकिन उसकी निर्णायक भूमिका शून्य के बराबर होता है। वह विज्ञापनों में धड़ल्ले से विभिन्न वस्तुओं को खरीदती, प्रयोग करती नज़र आती हैं, पुरुष के फैसले पर अमल करती दिखाई जाती है जो उसका परंपरागत रुप है। किंतु उसके आधुनिक रुप को सामने नहीं लाया जाता जिसमें वह खुद फैसले लेती हो और उसे भी पुरुषों के समान अधिकार उपलब्ध हों। स्त्री के परंपरागत रुप को तवज्जो देने वाले विज्ञापन स्त्री को फिर से सामंती मानसिकता और सामंती विचारों से जोड़ने लगता है। उसे मुक्त सोच और मुक्त कार्य की आज़ादी से वंचित करता है। स्त्री के दूसरे दर्जे की पुरानी इमेज को कायम रखने में मददगार होता है।
                    बुद्धि और मेधा पर ज़ोर देने वाले विज्ञापनों में स्त्रियों की भूमिका केवल मां तक सीमित रहती है। मसलन् टी.वी. पर आने वाले विभिन्न पेय पदार्थों (कॉमप्लैन, हॉरलिक्स से लेकर पीडिया-स्योर तक)के विज्ञापनों में मुख्यतः लड़कों को ही हेल्थड्रींक पीकर लंबाई बढ़ाते और मेधा का विकास कराते दिखाया जाता है। सिर्फ मां के किरदार में एक औरत अपने बेटे को हेल्थड्रींक पिलाती हुई दिखाई देती हैं। लेकिन लड़कियों को केंद्र में रखकर कभी इस तरह के विज्ञापन नहीं बनाए जाते। इन हेल्थड्रींक्स के प्रयोग से मेधा में इज़ाफा होता है या नहीं यह दीगर बात है लेकिन इस बात की पुष्टि ज़रुर होती है कि विज्ञापन स्त्रियों के उन्हीं रुपों को प्रधानता देता है जो शरीर के प्रदर्शन से संबंध रखता है, उसकी बुद्धि और मेधा के विकास से नहीं, उसकी पढ़ाई से नहीं, उसकी सर्जनात्मकता से नहीं, उसकी अस्मिता से नहीं।

                  कायदे से उन विज्ञापनों पर सख्त़ पाबंदी लगनी चाहिए जो स्त्री-अस्मिता के बजाय स्त्री शरीर को प्राथमिकता दे और स्त्री को माल में तब्दील होने में भरपूर मदद करें। यह बेहद ज़रुरी है कि ऐसे विज्ञापन बनाए जाएं जो स्त्री के आधुनिक रुपों को सामने लाए। स्त्री हमें मौलिक फैसले लेते हुए दिखाई दे। ऑब्जेक्टके बजाय व्यक्तिके रुप में स्त्री सामने आए।



Wednesday, 22 May 2019

सोश्यल मीडिया और बधाईवादी


यह बधाईवाद का युग है। आभासी माध्यम में किसी की सद्य प्रकाशित पुस्तक, प्रकाशित आलेख पर आप बधाई और शुभकामनाएँ न दें तो आप असामाजिक और अन्य की उपलब्धि और खुशियों पर ईर्ष्या करने वाले व्यक्तित्व माने जा सकते हैं। एक समय था जब किताब आने पर लोगों में उसके पठन की आदत थी। अब किताब के प्रकाशक की जानकारी लेना, अनुक्रम देखना, किताब मंगवाना, उसे खरीदकर पढ़ना, पढ़कर आलोचना करना मूल्यहीन हो गया है। प्रकाशित आलेख को पढ़ना महत्व नहीं रखता; आलेख का छपना महत्वपूर्ण है। आलेख में परिश्रम दिखाई दे रहा है या नहीं यह महत्वपूर्ण नहीं है; महत्व रखता है छपना। ध्यान रहे प्रकाशित आलेख पर ही आभासी बधाईयाँ मिलती हैं। इसी तरह किताब छपना ज़रूरी है। कई समय किताब छपने के नाम पर ही आप बुद्धिजीवी की श्रेणी में आ जाते हैं। तो महत्व की बात है कि बधाई ही परम सत्य है!

कई समय देखा गया है कि किसी लेखक ने पांच साल पुरानी अपनी किताब की जानकारी देते हुए फेसबुक में अपने पुस्तक की छवि डाली। बधाईवादियों ने त्वरित गति से आकर बिना कुछ पढ़े केवल चित्र के आधार पर उसे नई किताब मानकर बधाइयों का तांता लगा दिया। एक मिनट में पच्चीस बधाइयाँ। इस प्रकार बधाईवाद में अपार शक्ति है कि वह क्रमशः पुरानी किताब को ताज़ी किताब में रूपान्तरित कर दे और आपको बधाई-सागर में डुबकी लगाने पर मजबूर कर दें। आप लाख समझाएं बधाईवादी न माने कि पुस्तक पहले प्रकाशित हुई है। मान लेने पर वे बधाई कैसे दें? सनद रहे बधाईवादी केवल बधाई के शेर हैं।


आभासी माध्यम में मिठाई देखकर उसका आभासी स्वाद लेने का जो सुख है वही खोखला सुख लेखक को ‘बधाई’ नामक शब्द से मिलता है! आभासी में ‘बधाई’ प्राप्ति की कुल संख्या से भी लेखक की लोकप्रियता व प्रतिष्ठा का संबंध जुड़ गया है। यह बधाईवाद की परंपरा सोश्यल मीडिया यानि आभासी समाज से शुरु होते हुए दफ्तर और असली समाज तक व्याप्त हो गया है। लगातार बधाई पाते-पाते आप लोगों की नज़रों में अलग विशेषता रखते जाते हैं। सामान्य इंसान से महान लेखक की यात्रा तय करने लगते हैं। लेकिन यह बधाई देने वाले पढ़ते नहीं है, न किताब, न आलेख, वे केवल बधाई देते हैं। स्पष्ट है ज्ञानहीन बधाईवादियों के बीच में आप ज्ञान का परचम लहराते हैं और बधाईप्राप्ति से गदगद हो उठते हैं। जब ‘लेखन’ मूल्यहीन हो जाए और ‘बधाई’ मूल्यवान तो उस युग को हम ‘बधाईवाद’ का युग कहते हैं।

Sunday, 3 March 2019

धर्मनिरपेक्षता और रामविलास शर्मा





राजनीतिक तौर पर सांप्रदायिकता एक संवेदनशील मुद्दा है। सांप्रदायिकता अनेकरुपा है, बावजूद इसके उसका लक्ष्य एक है— वह है सामाजिक विभाजन पैदा करना तथा राष्ट्रीय एकता को खंडित करना। रामविलास शर्मा ने सांप्रदायिकता के आर्थिक आधार, सामाजिक आधार और अंतर्राष्ट्रीय सहजिया संप्रदाय का गंभीरता से उद्घाटन किया है। यह ध्यान देने की बात है कि रामविलास शर्मा ने आज़ादी के बाद इस मसले पर सबसे अधिक बारीकी से विश्लेषण प्रस्तुत किया है। आम तौर पर हिन्दी के लेखक सांप्रदायिकता के सवाल पर तदर्थ रुख अपनाते रहें हैं। हिन्दी लेखकों में एक वर्ग सीधे हिन्दू सांप्रदायिकता की हिमायत करता रहा हैं। दूसरी कोटि ऐसे लेखकों की है जो राजनातिक अवसरवाद के शिकार रहें हैं।

          रामविलास शर्मा के सांप्रदायिकता विरोधी लेखन का महत्व इस संदर्भ में भी है कि उन्होंने आधुनिक साहित्य, जातीय साहित्य, जातीय संस्कृति और भारतीय साहित्य की अवधारणाओं के साथ सांप्रदायिकता विरोधी साहित्य दृष्टि का विकास किया। रामविलास शर्मा के लिए सांप्रदायिक समस्या महज राजनीतिक समस्या नहीं हैं बल्कि वे इसे साहित्य के धर्मनिरपेक्ष परिप्रेक्ष्य के विकास के पथ की प्रमुख समस्या मानतें हैं।

 रामविलास शर्मा ने सांप्रदायिकता को पूंजीवादी संवृत्ति माना। एक साक्षात्कार के दौरान सांप्रदायिकता के विकास के कारणों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “मेरे खयाल से दो कारण हैं। एक कांग्रेस ने जो गलत नीतियां अपनाईं उससे जनता में असंतोष बढ़ा। इसका लाभ सांप्रदायिक ताकतों ने उठाया। यह तो मुख्य कारण है। दूसरा कारण यह है कि आम जनता में जो असंतोष बढ़ा उसे लेकर वामपंथी दलों को जो काम करना चाहिए था—जैसे जनता को इकट्ठा करना, गरीबों को संगठित करना और गलत नीतियों के खिलाफ जनमत तैयार करना—वह नहीं हुआ। इस वजह से भी सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ने का मौका मिला।”

                            रामविलास शर्मा ने कांग्रेस की सांप्रदायिकता-विरोधी दृष्टिकोण की आलोचना की और कांग्रेस की नीतियों में निहित प्रतिक्रियावादी रवैये में इसकी जड़ें तलाश कीं। उनके अनुसार कांग्रेस का सन् बीस, तीस और छियालिस के क्रांतिकारी उभार को रोकने, सन् पैंतीस के काले-कानून को लागू करने का परिणाम हुआ भीषण दंगे। भारत का विभाजन और विभाजन के बाद और भी भीषण दंगे। जैसे-जैसे दंगे हुए वैसे-वैसे सांप्रदायिक संगठन और भी मजबूत हुए।
रामविलास शर्मा ने सांप्रदायिकता  के साथ साम्राज्यवाद के अंतस्संबंध की खोज की है। उनके अनुसार सांप्रदायिकता के खिलाफ़ संघर्ष का आधारभूत कार्यक्रम साम्राज्यवाद के खिलाफ़ सुसंगत संघर्ष से जुड़ा है। उनके अनुसार, “भारत में फासिस्टवाद का खतरा वास्तविक है। यह फासिस्टवाद जर्मनी की तरह एकाधिकारी पूंजीवाद का प्रतिनिधि नहीं है। वास्तव में वह साम्राज्यवाद का सहयोगी है और उसका मुख्य आधार सामंती अवशेष अथवा अनुत्पादक पूंजीपति वर्ग है। राष्ट्रवाद की विचारधारा को तोड़-मरोड़कर और जातीय संस्कृति को साम्प्रदायिक जामा पहनाकर वह अपनी शक्ति बढ़ाता है।”                                                                    
                उनके अनुसार फासीवाद विरोधी संघर्ष में प्रत्येक जाति के इतिहास की उपलब्धियों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसका जनता पर गहरा असर पड़ता है। रामविलास शर्मा का मानना था कि सांप्रदायिकता और बुनियादपरस्ती एक ही चीज़ है। इन दोनों का धर्म से कोई संबंध नही है।बल्कि धर्म के मूल सिद्धांतों को तोड़-मरोड़ कर वर्तमान पूंजीवादी हितों से जोड़ना उसका लक्ष्य रहता है। सांप्रदायिकता के तर्कजाल को विश्लेषित करते हुए उन्होंने लिखा कि सांप्रदायिक दल राष्ट्रीय एकता पर बल देतें हैं, किंतु बहुजातीय राष्ट्रीयता की उपेक्षा करतें हैं। वे धर्म आधारित जातीयता की वकालत करते हैं। वे कहतें हैं कि हिन्दुत्ववादी भारत में अनेक भाषाओं का अस्तित्व स्वीकारतें हैं किन्तु इन भाषाओं के बोलने वाली जातियों का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। ऐसे अनेक प्रगतिशील समीक्षक हैं जो रामविलास शर्मा को संघ के दृष्टिकोण का प्रतिपादक कहतें रहें हैं। इन राष्ट्रवादी और हिन्दुत्ववादी इतिहासकारों को ध्यान में रखकर उन्होंने कहा ,“जितने भी सम्प्रदायवादी इतिहासकार हैं,उनका मूल उद्देश्य यह दिखाना है कि हिन्दुओं के वास्तविक शत्रु मुसलमान हैं और मुसलमानों के हिन्दू हैं,और दोनों के सबसे बड़े हितैषी अंग्रेज हैं।”

     रामविलास शर्मा ने सांप्रदायिकता की प्रकृति में निहित दंगे की संस्कृति का विस्तार से विश्लेषण किया है।दंगे क्यों होतें हैं? दंगों की प्रकृति क्या एक जैसी रही है?उनका मानना है कि ये दंगे नही ,जनता का कत्लेआम है। पुलिस और फौज के बड़े अफसरों,नवाबों,राजाओं और बड़े-बड़े ज़मींदारों और पूंजीपति नेताओं, मुनाफाखोरों और चोर-बाजार के आढ़तियों की साजिश से ये संगठित किए गए हैं।उनके अनुसार सांप्रदायिकता का हमला जनता पर ही नही बल्कि संस्कृति और इन्सानियत पर किया गया हमला है।यह हमारे स्वाधीनता संग्राम की धर्मनिरपेक्ष विरासत के खिलाफ खुली जंग है। यह चुनौती है समूची जनता को और खास तौर पर लेखकों के लिए कि वे अगला कदम ज़िंदगी की तरफ उठातें है या मौत की तरफ। यह चुनौती हमारी मनुष्यता और देशभक्ति के लिए भी है।
                           रामविलास शर्मा के अनुसार सांप्रदायिकता वस्तुत: प्रतिक्रियावाद है जो वर्ग-संगठनों को तोड़ता है और वर्गीय-शक्तियों को क्षीण करता है। किसानों और मजदूरों की एकता में भी संप्रदायवाद बहुत बड़ा बाधक है। इतने स्पष्ट रुप में अपने विचारों को रखने के बावजूद रामविलास शर्मा को सांप्रदायिक कहा गया और उनके सांप्रदायिकता विरोधी दृष्टिकोण को नजरअंदाज किया गया। उन्होंने कहीं भी संघ के समर्थन में बात नहीं कही।कभी भी उन्होंने सांप्रदायिक शक्तियों का साथ नहीं दिया। इसके विपरीत उन्होंने बराबर सांप्रदायिकता के विपक्ष में लिखा है। संप्रदायवादियों की तीखी आलोचना की है।उनका मानना था “यदि हम धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा दे सकें,सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष कर सकें और इतिहास और संस्कृति का सही ज्ञान दे सकें तो यह हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।”






Tuesday, 13 June 2017

कोलकाता की स्त्रियां तथा उनका रूपांतरण- डॉ.सारदा बैनर्जी




किसी भी जाति की संस्कृति को बचाए रखने का श्रेय उस जाति की स्त्रियों को ही जाता है। एक ज़िंदादिल एवं उमंगभरे शहर के रूप में विख्यात कोलकाता अगर प्राणवंत है तो इसमें बंगकन्याओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अपनी भाषा के प्रति प्रेम जितना इस शहर में है उतना शायद ही कहीं मिले। बंगाली स्त्रियां चाहे कितनी भी आत्याधुनिक हो गईं हो लेकिन आपस में बांग्ला में ही बातें करना पसंद करती हैं। वहीं अपनी लोकसंस्कृति के प्रति जुड़ाव भी अब तक बंगाली स्त्रियों में मौजूद है। इस लेख में मैं उन पहलुओं पर चर्चा करना चाहती हूं जिनसे लोग अनभिज्ञ हैं और जो चिंताजनक है।

यह माना जाता है कि बंगाली जनसमुदाय में साहित्य का पठन-पाठन कमोबेश हर घर में होता रहता है। एक समय बांग्ला साहित्य का एक बड़ा पाठक वर्ग बंगाली स्त्रियां रही हैं जबकि आज हकीकत दूसरी है। आज पढ़ी-लिखी आधुनिकाओं में साहित्यिक अभिरुचि का लगातार ह्रास हुआ है। पुरानी पीढ़ी में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास पढ़ने की उत्कंठा अभी भी बरकरार है जबकि आधुनिक सुशिक्षित व नौकरीज़दा पीढ़ी को ना बांग्ला के प्रमुख कवियों-लेखकों के नाम मालूम है और ना ही उनकी रचनाओं का कोई ज्ञान। ये ना विवेकानंद को पढ़ती हैं, ना रवीन्द्रनाथ को, केवल उनका नाम जानती हैं। वास्तविकता यह है कि कोलकाता के चर्चित नाट्यघरों में जहां हर दिन नाटक खेला जाता है, पंद्रह से ज़्यादा दर्शक नहीं आते और उनमें स्त्रियों की संख्या नगण्य है। रवीन्द्रनाथ पढ़ने वाली लड़कियों को उबाऊ और लिजलिजी कहा जाता है। यह दुखद है कि बंगाली आधुनिकाओं की रुचि लैपटॉप में फ़िल्में देखने, मॉल घूमने और परनिंदा तक सीमित होकर रह गई है।

वर्तमान दौर में पूरे भारतीय मध्यवर्गीय स्त्रियों में आत्मनिर्भरता का भयानक अभाव दिखाई देता है। कोलकाता की स्त्रियां भी इससे जुदा नहीं है। वे सुशिक्षित, बढ़िया कपड़े पहनने वाली, ऊपर से बनी-ठनी दिखती हैं लेकिन हैं घरेलू कर्म में अदक्ष। वे ना सिलाई के कर्म में सिद्धहस्त हैं, ना बुनाई, ना घर की साफ़-सफ़ाई, ना खाना पकाना और ना ही साहित्य से सरोकार। आज बंगाली लड़कियां सबसे ज़्यादा कमज़ोर है। कमसिन व मेदहीन बनने की होड़ ने उसे शरीर, ज्ञान और बुद्धि से कमज़ोर किया है। घर से बाहर निकलते समय उसे एक प्रेमी रूपी अंगरक्षक की ज़रूरत पड़ती है। फलतः वह व्यक्तित्वहीन तथा दब्बू बनती जा रही है, प्रतिरोधी व प्रतिवादी चेतना से हीन होती जा रही है। यही वजह है कि कोलकाता में स्त्रियों पर हमले भी ज़्यादा हो रहे हैं। एन.सी.आर.बी. के आंकड़ों के अनुसार सन् 2015 में पश्चिम बंगाल बलात्कार के मामले में दूसरे स्थान पर है। विचारणीय है कि सबसे उन्नत जाति के रूप में जाना व माना जाने वाला बंगाली समाज व उनकी स्त्रियों में इतना बड़ा तारतम्य का कारण क्या है?

बंगाली स्त्रियों में व्यक्तित्व का जो रूपांतरण दिखाई दे रहा है उसका प्रधान कारण यह है कि पूरी बंगाली जाति ने अपने को विकसित करना बंद कर दिया है। नवजागरण ने कोलकाता में मौजूद पिछड़ेपन को दूर करने के लिए सांस्कृतिक दबाव डाला था जिसका बड़ा प्रभाव यह पड़ा कि नवजागरण के दौरान संस्कृति का विकास हुआ। संस्कृति तभी बचती है जब उसका निरंतर विकास होता जाता है। बंगाली जाति ने लगातार अपने को विकसित किया जिसके कारण राष्ट्रीय व वैश्विक स्तर पर उसकी अलग पहचान बनी। स्त्रियां पढ़ने-लिखने लगी और आगे चलकर स्कूल-कॉलेज जाने लगी। लेकिन मौजूदा समय में स्त्रियां केवल उपभोग कर रही हैं, वे टी.वी. देखती हैं, मॉल्स में जाकर कपड़े खरीदती हैं, फ़ास्ट फुड खाती हैं लेकिन देश की दैनंदिन समाचारों में दिलचस्पी नहीं लेतीं। उनके पास राजनीति की कोई जानकारी व समझ नहीं होती, अपने मोहल्ले की कोई जानकारी नहीं होती और यह हाल मध्यवर्गीय स्त्रियों की है। जबकि निम्नवर्ग की स्त्रियों में सामाजिक सचेतनता होती है, उनके पास पूरे मोहल्ले की खबरें मौजूद होती हैं, उनके पास दूसरे वर्गों को लेकर आलोचनात्मक दृष्टि होती है लेकिन मध्यवर्गीय स्त्रियां अपनी स्थानीय राजनीतिक खबरों से बिल्कुल कटी, देश व दुनिया की तमाम समस्याओं से अनजान अलगाव की अवस्था में जी रही है। इस प्रवृत्ति ने कोलकाता के शहरी मध्यवर्ग को संवेदनहीन और अमानवीय बनाया है। इस तरह की अमानवीयता के किस्से हर दिन बांग्ला न्यूज़ चैनलों में सुनने को आते हैं। रास्ते में दुर्घटना का शिकार व्यक्ति तड़पकर मृत्यु का शिकार होता है लेकिन उसे अस्पताल पहुचाने में कोई मदद नहीं करता। संवेदनाशून्यता का आलम यह है कि बंगाली स्त्रियों के लिए वास्तविक दुनिया सीरियलों की दुनिया है, उन्हें सीरियल की नायिका का दर्द दिखाई देता है लेकिन पड़ोसिन अथवा कुलिग की समस्याओं को सुनने का वक्त नहीं है।



इसी अलगाव के कारण बंगालियों में नवजागरण के पहले वाला पिछड़ापन लौट आया है। स्वाधीनता आंदोलन ने स्त्रियों की सामाजिक समस्याओं को लेकर सजग दृष्टिकोण अपनाया था। फ़िलवक्त कोलकाता के मध्यवर्ग की स्त्रियों में बलात्कार की घटनाओं को लेकर गंभीरता का भयानक अभाव है। खासकर आधुनिक स्मार्ट लड़कियों का मानना है कि बलात्कार, मीडिया द्वारा किया गया दुष्प्रचार है। अन्य लड़कियों का मानना है कि बलात्कार का कारण स्त्रियां स्वयं है; इसमें पुरुषों की कोई गलती नहीं है। दामिनी बलात्कार-कांड के एक महीने बाद तक कई लड़कियां इस घटना से अनभिज्ञ थीं। जब क्राइम पैट्रोल में घटना को फिल्माते हुए दिखाया गया तब वे वाकिफ़ हुईं।
नवजागरण के दौरान बाल-विवाह को रोकने के लिए, कॉलेजों-विश्वविद्यालयों तक स्त्रियों की पहुंच के लिए कितने आंदोलन लड़े गए लेकिन कोलकाता की सत्तर प्रतिशत लड़कियों के जीवन की हकीकत यह है कि कॉलेज की पढ़ाई खत्म होने से पहले ही उनके हाथ पीले हो जाते हैं, विवाह के बाद नौकरी की कोई परिकल्पना भी इनके पास नहीं होती। ये मानकर चलती हैं कि उनका जन्म घर बसाने के लिए हुआ है।

सबसे परेशानीमूलक बात यह है कि इन लड़कियां के पास आलोचनात्मक दृष्टि का घोर अभाव है। ये हर तरह की फिल्में देखती हैं, चाहे आर्ट हो चाहे कमर्शियल, चाहे अंग्रेज़ी हो, बांग्ला हो या हिन्दी और हर फ़िल्म देखकर ‘भालो’ कहती है। लेकिन ‘भालो’ किस वजह से है, फ़िल्म में समस्या कहां-कहां है, मध्यवर्ग/निम्नवर्ग की किन-किन समस्याओं को उठाया गया है या कोई समस्या है ही नहीं; इनसे उन्हें कोई संबंध नहीं। वे केवल ‘उपभोक्ता’ की भूमिका अदा करती हैं। उनकी चर्चा व रूचि का विषय दुपट्टा, कुर्ती, इयरिंग आदि से घिरी होती है। इस उपभोक्तावादी मनोदशा ने कोलकाता में एक समय मौजूद तर्कवादी, विवेकवादी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा विचारप्रणाली को खत्म कर दिया है। अब हर चीज़ अंधविश्वास से चलती है। बिल्ली का रास्ता काटते ही रुक जाना और किसी की प्रतीक्षा करना, हर बंगाली की उंगलियों में तीन-चार या उससे ज़्यादा ग्रहरत्नों का होना इस बात को दर्शाता है कि वे अवैज्ञानिक दृष्टि व रूढ़िवादी मानसिकता से घिरे हुए हैं। 

बंगाली मध्यवर्ग की सबसे बड़ी क्षति ज्ञानविहीन कैरियरिस्ट मनोदशा ने की है। कैरियर बनाने की होड़ ने आधुनिक युवतियों को विचारों से दूर किया है। हर विषय में बढ़िया नंबर लाने के बावजूद किसी भी विषय में उनकी गहरी पकड़ नहीं है। उनके पास कोई सामाजिक व राजनीतिक दृष्टि नहीं है, उनकी कोई सामाजिक चिंता नहीं है, देश को बदलने, समस्याओं को दूर करने की कोई फ़िक्र नहीं है। वे केवल नौकरी के लिए पढ़ती हैं, परीक्षा में अच्छे नंबर के लिए पढ़ती हैं।

यह सही है कि आज भी कोलकाता तथा बंगाली स्त्रियों में कुछ ऐसी विशेषताएं मौजूद हैं जो उन्हें अन्य राज्य की स्त्रियों से अलग करती है लेकिन बंगाली संस्कृति का जो अवमूल्यन लगातार हो रहा है उसमें उपरोक्त समस्याओं की अहम भूमिका रही है। जब तक समय के अनुसार स्त्रियां अपने को नहीं बदलेंगी तब तक संस्कृति विकसित नहीं होंगी और संस्कृति के स्थिर हो जाने का अर्थ है एक जाति का नष्ट होने के कगार पर पहुंच जाना। संस्कृति को बचाने के लिए यह ज़रूरी है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ-साथ शारीरिक व मानसिक आत्मनिर्भरता भी विकसित हो, वैज्ञानिक दृष्टि तथा साहित्य-बोध विकसित हो, हम लगातार अपग्रेड हों।


Saturday, 26 March 2016

स्त्री- मुक्ति के सवाल और यशपाल —सारदा बैनर्जी


यशपाल ने अपने उपन्यासों में स्त्री-मुक्ति के विषय को प्रमुख स्थान दिया। स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व तथा उसके अस्मिता-बोध के विकास के लिए पितृसत्ताक विचारधारा और मानसिकता से स्त्री की मुक्ति ज़रूरी है, इसे यशपाल भली-भांति समझते थे। यही वजह है कि यशपाल ने अपने उपन्यासों में ऐसे स्त्री-चरित्रों का निर्माण किया है जो पुंसवादी माहौल में पुंसवादी मान्यताओं से घिरे होकर भी अपने परतंत्र अस्तित्व की बाधाओं व परवश अस्मिता की समस्याओं से परिचित होकर पितृसत्ता की श्रृंखलाओं से स्वयं को कुछ हद तक मुक्त करने में सक्षम होते हैं। यशपाल के उपन्यास पितृसत्ताक मानसिकता, मूल्यबोध, विचारधारा तथा दृष्टिकोण के लिए बहुत बड़ी चुनौती पेश करते हैं। साथ ही यशपाल ने करुणा की मूर्ति, त्रासदी की अंतर्गाथा तथा रूदन करने वाली नायिका के रूप में स्त्री को चित्रित न करके बुद्धिमती, ज्ञानी, विवेकशील, निर्भीक, स्पष्टवादी व सामाजिक शिरकत करने वाले स्त्री-स्वरूप को सामने रखा है। इससे स्पष्ट होता है कि यशपाल समाजवाद की स्थापना केवल एक समाज-व्यवस्था के तौर पर ही नहीं अपितु स्त्री-पुरुष के आंतरिक संबंधों में भी समानता को प्रतिष्ठित करना चाहते थे।

यशपाल पुरुष की संपत्ति के तौर पर स्त्री की स्वीकृति के सख्त विरोधी थे। स्त्री विवाह से पहले पुरुष की संपत्ति और विवाह के बाद पति की संपत्ति वाले पुंसवादी मॉडेल को यशपाल नापसंद करते थे। यशपाल इसके समर्थक थे कि स्त्रियां अपनी इच्छाओं को प्रमुखता दे तथा पुरुषाश्रय से मुक्त होकर आत्मनिर्भर बन सकें। ‘दादा कॉमरेड’ उपन्यास की नायिका शैल स्वतंत्र विचारों से लैस है। वह पुरुषाश्रित नहीं है, अपनी इच्छाओं को महत्व देती है तथा उसे यथासंभव अपने जीवन में लागू भी करती है। अपने आप को पुरुष की संपत्ति के रूप में देखना उसे नागवार लगता है। क्रांतिकारी हरीश से बातचीत के दौरान हरीश के मत को जानने के उत्साह से वह सवाल करती है, “तुम्हारा भी खयाल है न, स्त्री को किसी न किसी व्यक्ति की सम्पत्ति बन ही जाना चाहिये और पुरुष उदारता से एक दूसरे को अपनी-अपनी सम्पत्ति की स्त्री पर पूर्ण अधिकार भोगने का अवसर देते रहें!”

‘पूँजीवाद की भोग्य महिला और समाजवाद की आत्म-निर्भर नारी!’ शीर्षक निबंध में यशपाल ने पूँजीवादी समाज-व्यवस्था और समाजवादी समाज-व्यवस्था में स्त्री के प्रति दृष्टिकोण के फ़र्क को सामने रखा है। इस निबंध में बड़े ही व्यंग्यात्मक लहज़े में कथोपकथन की शैली में स्त्रियों की वर्तमान अवस्था तथा उससे बेहतर अवस्था बनाने के उपायों की चर्चा हुई है। यशपाल ने लिखा है, “समाजवादी विचारधारा के अनुसार स्त्री को सम्पत्ति नहीं समझा जा सकता। उसका दान नहीं किया जा सकता। उसे खरीदा और बेचा नहीं जा सकता। वह किसी भी प्रकार की सम्पत्ति नहीं, स्वतंत्र आत्म-निर्भर व्यक्ति है।”

यशपाल के अनुसार समाजवादी समाज चूंकि स्त्री को संपत्ति के रूप में नहीं देखता इसलिए वहां स्त्री के चारित्रिक विकास की पूरी संभावनाएं मौजूद होती हैं। लेकिन पूँजीवादी समाज-व्यवस्था में स्त्री की स्वतंत्रता भी अंततः गुलामी का ही पर्याय है। जब तक स्त्रियों के प्रति समाज में वस्तुकेंद्रित मानसिकता बनी रहेगी तब तक पुंसवादी बंधन से स्त्रियों की मुक्ति संभव नहीं। लेकिन अधिकतर स्त्रियां अपने इस गुलाम अस्तित्व की अवस्थिति से अनभिज्ञ रहती हैं। ‘दादा-कॉमरेड’ की शैल स्त्री-पुरुष के समतावादी सह-अस्तित्व में विश्वास रखने वाली स्त्री है, पूंजीवादी समाज में स्त्री की अवस्था का अवलोकन करते हुए वह हरीश से सवाल करती है, “यदि स्त्री को किसी न किसी की बन कर ही रहना है तो उसकी स्वतंत्रता का अर्थ ही क्या हुआ? स्वतंत्रता शायद इसी बात की है कि स्त्री एक बार अपना मालिक चुन ले परन्तु गुलाम उसे ज़रूर बनना है।”
‘दिव्या’ उपन्यास में यशपाल ने समाज में स्त्री की भोग्या की इमेज को बार-बार पाठकों के सामने रखा और इसके ज़रिए पुंसवादी मानसिकता की हकीकत को बेपर्दा किया है। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के अनुभव से दिव्या को यह ज्ञान होता है कि पुरुषों की दृष्टि में स्त्री का अस्तित्व केवलमात्र भोग्या का है। अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए दिव्या कभी ‘दारा’ बनती है कभी ‘अंशुमाला’। पितृसत्ताक सामाजिक संरचना में स्त्री की परतंत्र दशा पर अंशुमाला बनी दिव्या सोचती है, “गत संध्या वह अपने मन का दुख प्रकट करने के लिये स्वतन्त्र थी। इस समय वह विनोद का साधन बनने के लिये विवश है। रसिक समाज अपने नेत्रों से उसका लावण्य भोग रहा है। वह परवश होकर भोग के लिये उपस्थित है।”

यशपाल इस बात के विरोधी थे कि स्त्री की पहचान पुरुष की पहचान के आधार पर तय हो। स्त्री की स्वतंत्रता उसकी आर्थिक मुक्ति में है, पुंस-सत्ता से पृथक सत्ता निर्मित करने में है। ‘दिव्या’ उपन्यास में मारिश जब अंशुमाला को विवाह का प्रस्ताव देता है तो अंशुमाला उसे तुरंत अस्वीकार कर देती है। मारिश के यह कहने पर कि नारी के जीवन की सार्थकता के लिए पुरुष का आश्रय आवश्यक है और नारी पुरुष का आश्रय भी है तो अंशुमाला मारिश को दो टुक जवाब देती है, “आर्य, इस प्रश्रय में नारी के जीवन की सार्थकता क्या है पुरुष द्वारा उसका भोग और उपयोग! जैसे पान की इच्छा होने पर पानपात्र की सार्थकता है। आर्य, उस प्रश्रय की इच्छा न करने पर ही नारी स्वतंत्र है।”

यशपाल स्त्रियों की मानसिक गुलामी और उनके शारीरिक दासत्व से उनकी मुक्ति के पक्षधर थे। वे चाहते थे कि स्त्रियां अपने सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण करें लेकिन यह तभी संभव होगा जब स्त्रियां आर्थिक रूप से मज़बूत हों। संवैधानिक तौर पर स्त्री के पास समानता का अधिकार होने के बावजूद व्यवहार में स्त्रियां असमान पारिवारिक व सामाजिक संरचना में जी रही हैं। समतावादी समाज के निर्माण के लिए यह ज़रूरी है कि स्त्रियां स्वावलंबी बनें। यशपाल ने उपरोक्त निबंध में लिखा है, “यदि स्त्री आर्थिक रूप से पुरुष के अधीन और आश्रित रहेगी तो समाज में उसकी स्थिति पुरुष के समान कभी नहीं हो सकेगी। समाज में पुरुष के समान अधिकार और स्थिति पाने के लिये स्त्री का आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर होना आवश्यक है।”

‘मनुष्य के रूप’ उपन्यास में यशपाल ने सोमा और मनोरमा को परनिर्भरता से मुक्त होकर क्रमशः आत्मनिर्भर बनते दिखाया है। अशिक्षित व असहाय सोमा को कभी प्रेम के लिए तो कभी आश्रय(आवास) के लिए पुरुषों पर आश्रित होना पड़ता है; केवल आश्रयदाता बदल जाता है। बदले में वह पुरुष को अपना शरीर और श्रम देती है। सोमा के परिप्रेक्ष्य में स्त्रियों की इस पराश्रित अवस्थिति पर मनोरमा सोचती है, “..सभी स्त्रियां आश्रय का मूल्य, प्रेम का मूल्य अपने शरीर से चुकाती हैं। आत्म-तुष्ट प्रेम तो वही है जो मूल्य में आश्रय न मांगे....प्रेम करने का अधिकारी वही है जो आश्रय न मांगे, जो अपने पांव पर खड़ा हो।”

लेकिन स्त्री को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में देखने वाले पितृसत्ताक समाज में आधुनिक सोच से संपन्न स्त्रियों के लिए भी हर कदम पर बाधाएं हैं। उनके मुक्त अस्तित्व को समाज स्वीकार नहीं कर पाता। ‘दादा कॉमरेड’ की शैल आधुनिक ढंग से जीना चाहती है लेकिन समाज में व्याप्त सामंती मानसिकता का बंधन कहीं न कहीं उसकी आधुनिकता में बाधा बनती है। उसका प्रेमी खन्ना उसे व्यक्तिगत संपत्ति मानते हुए उसके शरीर पर पूर्णाधिकार चाहता है। जब उसे यह पता चलता है कि अपने पूर्वप्रेमी के साथ शैल का केवल आत्मिक प्रेम ही नहीं शारीरिक संबंध भी था तब वह शैल से अपना रिश्ता तोड़ देता है। शैल अपने मित्र हरीश से कहती है, “मन की अपवित्रता क्षमा हो सकती है शरीर की नहीं......और यही खन्ना कहते थे कि वे मुझे आत्मा से प्रेम करते थे परन्तु शरीर पर एकाधिकार चाहते थे।”

यशपाल का मानना था कि प्रेम, स्त्री के शरीर और मानव-संबंधों को सिर्फ नैतिकता की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। विवेकपूर्ण नैतिकता और आरोपित नैतिकता में भेद होता है। यशपाल ने आरोपित नैतिकता को इंसान के लिए खतरनाक माना है जो इंसान को शारीरिक और मानसिक नैतिकता की जकरबंदी में कैद रखता है। वे विवेकपूर्ण नैतिकता को सही मानते थे। समाज में प्रेम के साथ नैतिकता को नत्थी करके देखा जाता रहा है। पुरुष किसी स्त्री से प्रेम करता है तो वह उस स्त्री के शरीर पर एकाधिकार चाहता है। इसके अतिरिक्त पुरुष स्त्री को यौन-शुचिता की दृष्टि से भी संपूर्ण चाहता है। यानि पुरुष का प्रेम केवल स्त्री की आत्मा व उसके शरीर से ही नहीं उसकी योनी जनित नैतिकता से भी तय होता है।

यशपाल प्रेम के मामले में शारीरिक और मानसिक हर तरह की वर्जनाओं को, हर प्रकार की कुंठाओं को तोड़ना  चाहते थे। यशपाल ने वायवीय प्रेम को सारहीन माना है और आध्यात्मिक प्रेम में विश्वास रखने वालों का मखौल उड़ाया है। साथ ही पार्थिव प्रेम को महत्व दिया है। ‘साहित्य, कला और प्रेम’ शीर्षक निबंध में लिखा है, “साहब, आध्यात्मिक प्रेम नपुंसक प्रेम है। वासना को पूरा करने की जब सामर्थ्य न हो तो मन को बहलाने का तरीका है। स्वयं जो कुछ कर सकने का अवसर नहीं, भगवान के नाम से उसकी कल्पना कर मन को बहला दिया।” ‘देशद्रोही’ उपन्यास की चंदा, भगवानदास खन्ना से प्रेम करते हुए भी विवाहित स्त्री का विवाह के बाद गैर-पुरुष से शारीरिक संबंध अनैतिक मानती है। जब खन्ना उसके हाथ को स्पर्श करता है तो चंदा दूर हट जाती है। इस पर डॉ. खन्ना अपनी राय रखता है, “शरीर तो केवल साधन मात्र है। उससे तो अच्छे-बुरे सभी स्पर्श होते हैं। प्रश्न तो है, किसी बात को बुरा समझ कर करना अवश्य उचित नहीं है परन्तु प्रत्येक स्पर्श में मनोविकार भी अवश्य हो, यह मैं विश्वास नहीं करता।”

समाज में विवाहेतर प्रेम को आम तौर पर उच्छृंखलता का पर्याय मान लिया जाता है। प्रेम और उच्छृंखलता की परिभाषा देते हुए ‘पूँजीवाद की भोग्य महिला और समाजवाद की आत्म-निर्भर नारी!’ शीर्षक निबंध में यशपाल ने लिखा है, “उच्छृंखलता तो तब होती है, जब प्रेम दिल बहलाव के लिये होता है और कला के लिये कला होती है।...हम तो प्रेम को जीवन के विकास और रक्षा का साधन मानते हैं। वह केवल व्यक्तिगत वस्तु नहीं, सामाजिक कर्तव्य के आधार पर दो व्यक्तियों का संबंध है।”

पुरुषों में स्त्रियों पर अधिकार स्थापित करने की पुंसवादी अधिकार-भावना पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए यशपाल ने उसे गलत और निस्सार बताया है। ‘देशद्रोही’ उपन्यास के डॉ. खन्ना दस साल बाद जब भारत लौटते हैं तब यमुना से उन्हें पता चलता है कि उसकी पत्नी राज का इस गलतफ़हमी में कि खन्ना की मौत हो चुकी है, खन्ना के दोस्त बद्री बाबू से विवाह हो चुका है। पहले तो वह बहुत निराश होता है लेकिन बाद में उसे अपनी निराशा का कारण राज पर उसकी पुंसवादी अधिकार-भावना नज़र आती है। अपने मन को समझाते हुए खन्ना सोचता है, “स्त्री पति को खोकर उसकी स्मृति के प्रति वफ़ादार बनी रहे, यह पुरुष का गरूर है। मर जाने के बाद पुरुष को गरूर से संतोष भी नहीं मिलता परन्तु स्त्री का जीवन और सर्वस्व भस्म हो जाता है। स्त्री के जीवन और सर्वस्व का मूल्य पुरुष के निरर्थक गरूर से भी गया बीता है? राज ने ऐसा कौन काम किया जो मैं नहीं कर आया? नर्गिस और गुलशां क्या मेरे जीवन में नहीं आईं?”

ससुराल में पति के जीवन के उत्थान-पतन को पत्नी के भाग्य के साथ नत्थी करके देखा जाता है। बहू का ससुराल में आने के साथ-साथ ससुराल के संदर्भ में बहू के कदमों के शुभ-अशुभ फलों की चर्चा शुरू हो जाती है। ‘देशद्रोही’ में यशपाल ने इसी मानसिकता पर प्रहार किया है। जब राज ने पहली बार ससुराल में कदम रखा तो ससुरालवालों का रूख अलग था लेकिन जब खन्ना की मृत्यु की खबर आई तब उसी राज के लक्षण खराब माने गए, “नये ढंग की पढ़ी-लिखी बहू के घर आने से बुआ और जेठानी ने परेशानी अनुभव की थी परन्तु डाक्टर के ऊंची नौकरी पा जाने के उत्साह में वह भुला दी गई थी। घर में बहू के आने पर लक्ष्मी के चरण पड़ने के कारण वह लाला ईश्वरदास की दृष्टि में सुलक्षणा लक्ष्मी और लाड़ली बन गई थी। सास के आसन की अधिकारी बुआ और जेठानी उसे कुछ न कह सकती थीं। परन्तु कुलक्षणा विधवा बन जाने पर वही बहू बोझ बन गई।”



स्त्रियों ने पुंसवादी फ्रेमवर्क में अपने आप को इस तरह ढाल लिया है कि उन्हें इस बात का अहसास ही नहीं होता कि उनकी अपनी स्वतंत्र इच्छाएं व स्वतंत्र व्यक्तित्व भी होना चाहिए। पुंसवादी समाज की आंतरिक संरचना में कैद स्त्री इतनी बंधनयुक्त होती है कि प्रेम के मामले में भी उसे मुक्त निर्णय का अधिकार नहीं होता। ‘देशद्रोही’ में यशपाल ने इसी निर्धारित प्रेम की सीमा पर सवालिया निशान लगाया है। विवाह संस्थान में तयशुदा या गुलाम प्रेम के चरित्र को उजागर किया है। राज इस कदर परतंत्र है कि अपने पूर्व-पति को भी आश्रय देने में असमर्थ है। हालांकि उसी राज ने अपने पति(डॉ. खन्ना) की मृत्यु की खबर सुनकर अफीम खाकर प्राण त्यागने की कोशिश की थी। यानि विवाह-संस्थान के नियमों में बंधी स्त्री मानवीयता दिखाने के लिए या अपनी इच्छाओं को व्यक्त करने के लिए भी स्वतंत्र नहीं है; उसका प्रेम भी बंधनयुक्त होता है, तयशुदा होता है। स्त्री के जीवन में इंसानियत के लिए भी कोई स्थान नहीं है कारण समाज स्त्री के इंसानियत को भी संदेह की नज़र से देखता है। इसलिए स्त्री इंसानियत को जाहिर करने से भी डरती है, मन की इच्छाओं को अभिव्यक्ति करने से भी डरती है कि कहीं उसका संसार उजड़ न जाए। उपन्यास के अंत में राज पहले तो अपना संसार उजड़ने के डर से बहन चंदा और घायल खन्ना को शरण देने से इनकार कर देती है, बाद में रात भर बिताने के बाद चले जाने को कहती है। खन्ना इस निर्णय से बेहद आहत होता है और कहता है, “मैं राज के लिए शत्रु हो गया? वह दीवार की ओट पड़ी है? मुझे देखने भी नहीं आ सकती? वह तो मेरे प्रेम में प्राण न्योछावर कर रही थी! ...आज क्या हो गया? हाय रे स्त्री! तेरा प्रेम भी मजबूरी का है, गुलामी का है...।”

इन पंक्तियों में इस बात को भी सामने रखा गया है कि गरीब मज़दूरों के हक की बात करने वालों(बद्री बाबू और राज) के अंदर जनसेवा का भाव कितना खोखला होता है कि राज किसी पीड़ित इंसान की मदद इसलिए नहीं कर सकती कि उसकी सांसारिक प्रतिष्ठा को ठेस न पहुँचे, उसके सुसरालवाले उस पर संदेह न करें।
यह दुखद है कि यशपाल के उपन्यासों के स्त्री-मुक्ति के पक्ष पर आलोचकों की दृष्टि नहीं गई। अपितु यशपाल के उपन्यासों के स्त्री–पुरुष पात्रों को अश्लील, अनैतिक और अस्वस्थ कहा गया तथा परंपरागत पात्रों से हटकर नए ढंग के पात्रों को निर्मित करने के कारण उनकी जमकर आलोचना भी हुई। ‘यशपालजी और अश्लीलता’ शीर्षक निबंध में रामविलास शर्मा ने लिखा है, “खन्ना की प्रेम कहानी एक अनैतिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ आदमी की प्रेम कहानी है। यहाँ प्रश्न अश्लीलता का नहीं वरन् उसके कमज़ोर अनैतिक आचरण का है।”
 समस्या यह है कि उपन्यास के स्त्री-पुरुष चरित्र जब तयशुदा पुंसवादी नियमों के तहत आचरण करते हैं तब वे नैतिक, संस्कारी व निष्ठावान माने जाते हैं लेकिन जब वे उस फ्रेमवर्क से तोड़कर पुरुषसत्ता विरोधी, परंपरा-विरोधी और स्वच्छंद आचरण करते हैं तब वे मर्यादाहीन-चरित्रहीन तथा अनैतिक घोषित किए जाते हैं। यशपाल इसी संकीर्ण मनोवृत्ति पर चोट करना चाहते थे। इसीलिए वे शैल के ज़रिए आधुनिक, अपनी अस्मिता के प्रति सचेत, आत्ममर्यादा संपन्न स्त्री को सामने रखते हैं। डा. खन्ना, डॉ. प्राणनाथ, भूषण और हरीश के ज़रिए यशपाल ऐसे पुरुष-चरित्रों को पेश करते हैं जो स्त्रियों का सम्मान करते हैं, स्त्री-इच्छा को प्रधानता देते हैं; स्त्रियों पर पुंसवादी दबाव नहीं पैदा करते।

‘झूठ-सच’ उपन्यास के डा. प्राणनाथ के माध्यम से यशपाल एक ऐसे पुरुष-चरित्र को चित्रित करते हैं जो अपने व्यवहार में बेहद मानवीय है। प्राणनाथ तारा से प्रेम करता है। यह जानते हुए भी कि तारा बलात्कृत हो चुकी है प्राणनाथ तारा को विवाह का प्रस्ताव देता है। तारा की चिकित्सा के लिए भी राज़ी होता है और अंततः दोनों विवाह-सूत्र में बंधते हैं। स्पष्ट होता है कि यशपाल तारा के माध्यम से आत्मनिर्भर, जीवटसंपन्न, व्यक्तित्वशालिनी व मेधावी स्त्री-चरित्र को सामने रखते हैं वहीं प्राणनाथ के माध्यम से एक ऐसे पुरुष-चरित्र को पेश करते हैं तो स्त्री को उसकी यौन-शुचिता तथा नैतिकता से पृथक करके देखता हो। प्राणनाथ इस टैबू से मुक्त है कि स्त्री केवल शरीर है और उस पर अधिकार स्थापित करना है। वह स्त्री को इंसान के तौर पर देखता है और एक इंसान के रूप में ही तारा से प्रेम करता है। जब हम स्त्री को एक इंसान के तौर पर देखेंगे तो स्त्री की समस्याएं भी नज़र आएंगी। स्त्री के नागरिक अधिकार भी दिखाई देंगे। प्राणनाथ तारा तथा दूसरी स्त्रियों के साथ बेहद आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करता है। इससे स्पष्ट होता है कि यशपाल किस तरह के पुरुषों को समाज में देखना चाहते थे।

हालांकि यशपाल के चित्रण की यह सीमा थी कि उन्होंने स्त्रियों को मुक्त होते तो दिखाया लेकिन दोबारा बंधनयुक्त होने के लिए। उनकी स्त्रियां समाज में समान अधिकार चाहती हैं, वस्तुकेंद्रित मानसिकता से संघर्ष भी करती हैं लेकिन वापस पुरुषों की शरण में जाने के लिए; वापस तयशुदा विचारों में बंधने के लिए। उनके उपन्यासों के आधुनिक स्त्री-चरित्र वैचारिक आत्मनिर्भरता को समझते-पहचानते हैं लेकिन मानसिक और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाते। ‘झूठा-सच’ की तारा को अपवादस्वरूप छोड़ दिया जाए तो उनके उपन्यासों की नायिकाएं अंततः पुरुष को ही अपने त्राणकर्ता के रूप में वरण करती हैं। ‘दिव्या’ उपन्यास में दिव्या मारिश के व्यवहार से अवगत होते हुए भी शेष में मारिश को ही जीवनसंगी के रूप में अपनाती है। ‘देशद्रोही’ की चंदा उपन्यास के अंत तक मर्यादा, उचित-अनुचित, भय आदि रूढ़िबद्ध भावनाओं से मुक्त हो जाती है और यह निर्णय लेती है कि वह स्वयं अपने जीवन के फैसले लेगी लेकिन अंत तक इसकी रक्षा नहीं कर पाती। ‘दादा कॉमरेड’ की शैल जो सुशिक्षित आधुनिक विचारों की युवती है, वह भी अंततः बिना आत्मनिर्भर बने(नौकरी किए) दादा को शरण में लेने के लिए कहती है। ‘मनुष्य के रूप’ की मनोरमा मानसिक रूप से सर्वदा भूषण पर आश्रित रहती है और उसके आत्मनिर्भर बनने में भी भूषण का ही योगदान रहता है। ‘मनुष्य के रूप’ की सोमा भी फ़िल्मों की प्रतिष्ठित नायिका बन जाने के बाद भी सर्वदा बनवारी पर अपने निर्णयों के लिए आश्रित बनी रहती है। हालांकि यशपाल स्त्रियों के आर्थिक और मानसिक स्वावलंबन के पक्षधर थे और यह भी जानते थे कि स्त्री की मुक्ति में इनकी बड़ी भूमिका है, तब भी अपने उपन्यासों में पूर्णतः आत्मनिर्भर स्त्री-चरित्र नहीं प्रस्तुत कर पाए।

यशपाल के उपन्यासों का मुख्य ज़ोर इस बात पर रहा है कि समाज में स्त्रियों के पराश्रित अस्तित्व की समस्या को पाठकों के सामने रखा जाए तथा स्त्रियों को उनकी मातहत अवस्था और अधीन मानसिकता से मुक्त किया जाए। आधुनिक समाज में पुरुषों को जितने अधिकार प्राप्त हैं वे सारे अधिकार स्त्रियों को भी मिले। इसके अतिरिक्त यशपाल पुरुषों में मानवीय, संवेदनशील तथा स्त्री-मुक्ति के पक्षधर विचारधारा को विकसित करना चाहते थे।

पूंजीवादी समाज में रहते हुए परंपरागत व गुलाम मनोदशा से स्त्रियों की मुक्ति संभव नहीं कारण पूँजीवादी समाज-व्यवस्था में अन्य वस्तुओं की तरह स्त्री भी एक वस्तु ही है। स्त्रियों का अपने इस वस्तु-बोध से मुक्त होना ज़रूरी है। स्त्रियों में यह सचेतनता होनी चाहिए कि वे अन्य की संपत्ति नहीं हैं। स्त्री एक मनुष्य है और मनुष्य होने के नाते उसका भी वही अधिकार है जो एक पुरुष का है। अधिकार-बोध की यह भावना स्त्री में अस्मिता-बोध को जागृत करता है। स्त्री की स्वंतत्र अस्मिता के निर्माण के लिए उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता ज़रूरी है। आर्थिक आत्मनिर्भरता उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता को पुख्ता करता है। इसके साथ ही स्त्री के पास एक वैकल्पिक समाज और सामाजिक संबंध होना ज़रुरी है ताकि वह समय का सदुपयोग कर सके। यशपाल हर तरह से आत्मनिर्भर स्त्रियों को ही समाज में देखना चाहते थे।



संदर्भ-सूची -

1 . यशपाल, दादा-कामरेड, विप्लव कार्यालय, लखनऊ, 1965, पृ.-28
2.  यशपाल, यशपाल के निबंध(खण्ड-2), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994, पृ.-134
3. यशपाल, दादा-कामरेड, विप्लव कार्यालय, लखनऊ, 1965, पृ.-28
4. यशपाल, दिव्या, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1987, पृ.-150
5.  वही, पृ.-159
6. यशपाल, यशपाल के निबंध(खण्ड-2), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994, पृ.-131
7. यशपाल, मनुष्य के रूप, लोकभारती प्रकाशन, लखनऊ, 1983, पृ.-189
8. यशपाल, दादा-कामरेड, विप्लव कार्यालय, लखनऊ, 1965, पृ.-36
9. यशपाल, यशपाल के निबंध(खण्ड-2), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994, पृ.-11
10. यशपाल, देशद्रोही, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1984(नवां संस्करण), पृ.-172
11. यशपाल, यशपाल के निबंध(खण्ड-2),लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994, पृ.- 132
12. यशपाल, देशद्रोही, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1984(नवां संस्करण), पृ.-138
13. वही, पृ.-34
14. वही, पृ.-246
15. शर्मा, डॉ. रामविलास शर्मा, मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1994, 2008, पृ.-350

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