Sunday, 3 March 2019

धर्मनिरपेक्षता और रामविलास शर्मा





राजनीतिक तौर पर सांप्रदायिकता एक संवेदनशील मुद्दा है। सांप्रदायिकता अनेकरुपा है, बावजूद इसके उसका लक्ष्य एक है— वह है सामाजिक विभाजन पैदा करना तथा राष्ट्रीय एकता को खंडित करना। रामविलास शर्मा ने सांप्रदायिकता के आर्थिक आधार, सामाजिक आधार और अंतर्राष्ट्रीय सहजिया संप्रदाय का गंभीरता से उद्घाटन किया है। यह ध्यान देने की बात है कि रामविलास शर्मा ने आज़ादी के बाद इस मसले पर सबसे अधिक बारीकी से विश्लेषण प्रस्तुत किया है। आम तौर पर हिन्दी के लेखक सांप्रदायिकता के सवाल पर तदर्थ रुख अपनाते रहें हैं। हिन्दी लेखकों में एक वर्ग सीधे हिन्दू सांप्रदायिकता की हिमायत करता रहा हैं। दूसरी कोटि ऐसे लेखकों की है जो राजनातिक अवसरवाद के शिकार रहें हैं।

          रामविलास शर्मा के सांप्रदायिकता विरोधी लेखन का महत्व इस संदर्भ में भी है कि उन्होंने आधुनिक साहित्य, जातीय साहित्य, जातीय संस्कृति और भारतीय साहित्य की अवधारणाओं के साथ सांप्रदायिकता विरोधी साहित्य दृष्टि का विकास किया। रामविलास शर्मा के लिए सांप्रदायिक समस्या महज राजनीतिक समस्या नहीं हैं बल्कि वे इसे साहित्य के धर्मनिरपेक्ष परिप्रेक्ष्य के विकास के पथ की प्रमुख समस्या मानतें हैं।

 रामविलास शर्मा ने सांप्रदायिकता को पूंजीवादी संवृत्ति माना। एक साक्षात्कार के दौरान सांप्रदायिकता के विकास के कारणों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “मेरे खयाल से दो कारण हैं। एक कांग्रेस ने जो गलत नीतियां अपनाईं उससे जनता में असंतोष बढ़ा। इसका लाभ सांप्रदायिक ताकतों ने उठाया। यह तो मुख्य कारण है। दूसरा कारण यह है कि आम जनता में जो असंतोष बढ़ा उसे लेकर वामपंथी दलों को जो काम करना चाहिए था—जैसे जनता को इकट्ठा करना, गरीबों को संगठित करना और गलत नीतियों के खिलाफ जनमत तैयार करना—वह नहीं हुआ। इस वजह से भी सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ने का मौका मिला।”

                            रामविलास शर्मा ने कांग्रेस की सांप्रदायिकता-विरोधी दृष्टिकोण की आलोचना की और कांग्रेस की नीतियों में निहित प्रतिक्रियावादी रवैये में इसकी जड़ें तलाश कीं। उनके अनुसार कांग्रेस का सन् बीस, तीस और छियालिस के क्रांतिकारी उभार को रोकने, सन् पैंतीस के काले-कानून को लागू करने का परिणाम हुआ भीषण दंगे। भारत का विभाजन और विभाजन के बाद और भी भीषण दंगे। जैसे-जैसे दंगे हुए वैसे-वैसे सांप्रदायिक संगठन और भी मजबूत हुए।
रामविलास शर्मा ने सांप्रदायिकता  के साथ साम्राज्यवाद के अंतस्संबंध की खोज की है। उनके अनुसार सांप्रदायिकता के खिलाफ़ संघर्ष का आधारभूत कार्यक्रम साम्राज्यवाद के खिलाफ़ सुसंगत संघर्ष से जुड़ा है। उनके अनुसार, “भारत में फासिस्टवाद का खतरा वास्तविक है। यह फासिस्टवाद जर्मनी की तरह एकाधिकारी पूंजीवाद का प्रतिनिधि नहीं है। वास्तव में वह साम्राज्यवाद का सहयोगी है और उसका मुख्य आधार सामंती अवशेष अथवा अनुत्पादक पूंजीपति वर्ग है। राष्ट्रवाद की विचारधारा को तोड़-मरोड़कर और जातीय संस्कृति को साम्प्रदायिक जामा पहनाकर वह अपनी शक्ति बढ़ाता है।”                                                                    
                उनके अनुसार फासीवाद विरोधी संघर्ष में प्रत्येक जाति के इतिहास की उपलब्धियों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसका जनता पर गहरा असर पड़ता है। रामविलास शर्मा का मानना था कि सांप्रदायिकता और बुनियादपरस्ती एक ही चीज़ है। इन दोनों का धर्म से कोई संबंध नही है।बल्कि धर्म के मूल सिद्धांतों को तोड़-मरोड़ कर वर्तमान पूंजीवादी हितों से जोड़ना उसका लक्ष्य रहता है। सांप्रदायिकता के तर्कजाल को विश्लेषित करते हुए उन्होंने लिखा कि सांप्रदायिक दल राष्ट्रीय एकता पर बल देतें हैं, किंतु बहुजातीय राष्ट्रीयता की उपेक्षा करतें हैं। वे धर्म आधारित जातीयता की वकालत करते हैं। वे कहतें हैं कि हिन्दुत्ववादी भारत में अनेक भाषाओं का अस्तित्व स्वीकारतें हैं किन्तु इन भाषाओं के बोलने वाली जातियों का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। ऐसे अनेक प्रगतिशील समीक्षक हैं जो रामविलास शर्मा को संघ के दृष्टिकोण का प्रतिपादक कहतें रहें हैं। इन राष्ट्रवादी और हिन्दुत्ववादी इतिहासकारों को ध्यान में रखकर उन्होंने कहा ,“जितने भी सम्प्रदायवादी इतिहासकार हैं,उनका मूल उद्देश्य यह दिखाना है कि हिन्दुओं के वास्तविक शत्रु मुसलमान हैं और मुसलमानों के हिन्दू हैं,और दोनों के सबसे बड़े हितैषी अंग्रेज हैं।”

     रामविलास शर्मा ने सांप्रदायिकता की प्रकृति में निहित दंगे की संस्कृति का विस्तार से विश्लेषण किया है।दंगे क्यों होतें हैं? दंगों की प्रकृति क्या एक जैसी रही है?उनका मानना है कि ये दंगे नही ,जनता का कत्लेआम है। पुलिस और फौज के बड़े अफसरों,नवाबों,राजाओं और बड़े-बड़े ज़मींदारों और पूंजीपति नेताओं, मुनाफाखोरों और चोर-बाजार के आढ़तियों की साजिश से ये संगठित किए गए हैं।उनके अनुसार सांप्रदायिकता का हमला जनता पर ही नही बल्कि संस्कृति और इन्सानियत पर किया गया हमला है।यह हमारे स्वाधीनता संग्राम की धर्मनिरपेक्ष विरासत के खिलाफ खुली जंग है। यह चुनौती है समूची जनता को और खास तौर पर लेखकों के लिए कि वे अगला कदम ज़िंदगी की तरफ उठातें है या मौत की तरफ। यह चुनौती हमारी मनुष्यता और देशभक्ति के लिए भी है।
                           रामविलास शर्मा के अनुसार सांप्रदायिकता वस्तुत: प्रतिक्रियावाद है जो वर्ग-संगठनों को तोड़ता है और वर्गीय-शक्तियों को क्षीण करता है। किसानों और मजदूरों की एकता में भी संप्रदायवाद बहुत बड़ा बाधक है। इतने स्पष्ट रुप में अपने विचारों को रखने के बावजूद रामविलास शर्मा को सांप्रदायिक कहा गया और उनके सांप्रदायिकता विरोधी दृष्टिकोण को नजरअंदाज किया गया। उन्होंने कहीं भी संघ के समर्थन में बात नहीं कही।कभी भी उन्होंने सांप्रदायिक शक्तियों का साथ नहीं दिया। इसके विपरीत उन्होंने बराबर सांप्रदायिकता के विपक्ष में लिखा है। संप्रदायवादियों की तीखी आलोचना की है।उनका मानना था “यदि हम धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा दे सकें,सांप्रदायिकता के खिलाफ संघर्ष कर सकें और इतिहास और संस्कृति का सही ज्ञान दे सकें तो यह हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।”






Tuesday, 13 June 2017

कोलकाता की स्त्रियां तथा उनका रूपांतरण- डॉ.सारदा बैनर्जी




किसी भी जाति की संस्कृति को बचाए रखने का श्रेय उस जाति की स्त्रियों को ही जाता है। एक ज़िंदादिल एवं उमंगभरे शहर के रूप में विख्यात कोलकाता अगर प्राणवंत है तो इसमें बंगकन्याओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अपनी भाषा के प्रति प्रेम जितना इस शहर में है उतना शायद ही कहीं मिले। बंगाली स्त्रियां चाहे कितनी भी आत्याधुनिक हो गईं हो लेकिन आपस में बांग्ला में ही बातें करना पसंद करती हैं। वहीं अपनी लोकसंस्कृति के प्रति जुड़ाव भी अब तक बंगाली स्त्रियों में मौजूद है। इस लेख में मैं उन पहलुओं पर चर्चा करना चाहती हूं जिनसे लोग अनभिज्ञ हैं और जो चिंताजनक है।

यह माना जाता है कि बंगाली जनसमुदाय में साहित्य का पठन-पाठन कमोबेश हर घर में होता रहता है। एक समय बांग्ला साहित्य का एक बड़ा पाठक वर्ग बंगाली स्त्रियां रही हैं जबकि आज हकीकत दूसरी है। आज पढ़ी-लिखी आधुनिकाओं में साहित्यिक अभिरुचि का लगातार ह्रास हुआ है। पुरानी पीढ़ी में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास पढ़ने की उत्कंठा अभी भी बरकरार है जबकि आधुनिक सुशिक्षित व नौकरीज़दा पीढ़ी को ना बांग्ला के प्रमुख कवियों-लेखकों के नाम मालूम है और ना ही उनकी रचनाओं का कोई ज्ञान। ये ना विवेकानंद को पढ़ती हैं, ना रवीन्द्रनाथ को, केवल उनका नाम जानती हैं। वास्तविकता यह है कि कोलकाता के चर्चित नाट्यघरों में जहां हर दिन नाटक खेला जाता है, पंद्रह से ज़्यादा दर्शक नहीं आते और उनमें स्त्रियों की संख्या नगण्य है। रवीन्द्रनाथ पढ़ने वाली लड़कियों को उबाऊ और लिजलिजी कहा जाता है। यह दुखद है कि बंगाली आधुनिकाओं की रुचि लैपटॉप में फ़िल्में देखने, मॉल घूमने और परनिंदा तक सीमित होकर रह गई है।

वर्तमान दौर में पूरे भारतीय मध्यवर्गीय स्त्रियों में आत्मनिर्भरता का भयानक अभाव दिखाई देता है। कोलकाता की स्त्रियां भी इससे जुदा नहीं है। वे सुशिक्षित, बढ़िया कपड़े पहनने वाली, ऊपर से बनी-ठनी दिखती हैं लेकिन हैं घरेलू कर्म में अदक्ष। वे ना सिलाई के कर्म में सिद्धहस्त हैं, ना बुनाई, ना घर की साफ़-सफ़ाई, ना खाना पकाना और ना ही साहित्य से सरोकार। आज बंगाली लड़कियां सबसे ज़्यादा कमज़ोर है। कमसिन व मेदहीन बनने की होड़ ने उसे शरीर, ज्ञान और बुद्धि से कमज़ोर किया है। घर से बाहर निकलते समय उसे एक प्रेमी रूपी अंगरक्षक की ज़रूरत पड़ती है। फलतः वह व्यक्तित्वहीन तथा दब्बू बनती जा रही है, प्रतिरोधी व प्रतिवादी चेतना से हीन होती जा रही है। यही वजह है कि कोलकाता में स्त्रियों पर हमले भी ज़्यादा हो रहे हैं। एन.सी.आर.बी. के आंकड़ों के अनुसार सन् 2015 में पश्चिम बंगाल बलात्कार के मामले में दूसरे स्थान पर है। विचारणीय है कि सबसे उन्नत जाति के रूप में जाना व माना जाने वाला बंगाली समाज व उनकी स्त्रियों में इतना बड़ा तारतम्य का कारण क्या है?

बंगाली स्त्रियों में व्यक्तित्व का जो रूपांतरण दिखाई दे रहा है उसका प्रधान कारण यह है कि पूरी बंगाली जाति ने अपने को विकसित करना बंद कर दिया है। नवजागरण ने कोलकाता में मौजूद पिछड़ेपन को दूर करने के लिए सांस्कृतिक दबाव डाला था जिसका बड़ा प्रभाव यह पड़ा कि नवजागरण के दौरान संस्कृति का विकास हुआ। संस्कृति तभी बचती है जब उसका निरंतर विकास होता जाता है। बंगाली जाति ने लगातार अपने को विकसित किया जिसके कारण राष्ट्रीय व वैश्विक स्तर पर उसकी अलग पहचान बनी। स्त्रियां पढ़ने-लिखने लगी और आगे चलकर स्कूल-कॉलेज जाने लगी। लेकिन मौजूदा समय में स्त्रियां केवल उपभोग कर रही हैं, वे टी.वी. देखती हैं, मॉल्स में जाकर कपड़े खरीदती हैं, फ़ास्ट फुड खाती हैं लेकिन देश की दैनंदिन समाचारों में दिलचस्पी नहीं लेतीं। उनके पास राजनीति की कोई जानकारी व समझ नहीं होती, अपने मोहल्ले की कोई जानकारी नहीं होती और यह हाल मध्यवर्गीय स्त्रियों की है। जबकि निम्नवर्ग की स्त्रियों में सामाजिक सचेतनता होती है, उनके पास पूरे मोहल्ले की खबरें मौजूद होती हैं, उनके पास दूसरे वर्गों को लेकर आलोचनात्मक दृष्टि होती है लेकिन मध्यवर्गीय स्त्रियां अपनी स्थानीय राजनीतिक खबरों से बिल्कुल कटी, देश व दुनिया की तमाम समस्याओं से अनजान अलगाव की अवस्था में जी रही है। इस प्रवृत्ति ने कोलकाता के शहरी मध्यवर्ग को संवेदनहीन और अमानवीय बनाया है। इस तरह की अमानवीयता के किस्से हर दिन बांग्ला न्यूज़ चैनलों में सुनने को आते हैं। रास्ते में दुर्घटना का शिकार व्यक्ति तड़पकर मृत्यु का शिकार होता है लेकिन उसे अस्पताल पहुचाने में कोई मदद नहीं करता। संवेदनाशून्यता का आलम यह है कि बंगाली स्त्रियों के लिए वास्तविक दुनिया सीरियलों की दुनिया है, उन्हें सीरियल की नायिका का दर्द दिखाई देता है लेकिन पड़ोसिन अथवा कुलिग की समस्याओं को सुनने का वक्त नहीं है।



इसी अलगाव के कारण बंगालियों में नवजागरण के पहले वाला पिछड़ापन लौट आया है। स्वाधीनता आंदोलन ने स्त्रियों की सामाजिक समस्याओं को लेकर सजग दृष्टिकोण अपनाया था। फ़िलवक्त कोलकाता के मध्यवर्ग की स्त्रियों में बलात्कार की घटनाओं को लेकर गंभीरता का भयानक अभाव है। खासकर आधुनिक स्मार्ट लड़कियों का मानना है कि बलात्कार, मीडिया द्वारा किया गया दुष्प्रचार है। अन्य लड़कियों का मानना है कि बलात्कार का कारण स्त्रियां स्वयं है; इसमें पुरुषों की कोई गलती नहीं है। दामिनी बलात्कार-कांड के एक महीने बाद तक कई लड़कियां इस घटना से अनभिज्ञ थीं। जब क्राइम पैट्रोल में घटना को फिल्माते हुए दिखाया गया तब वे वाकिफ़ हुईं।
नवजागरण के दौरान बाल-विवाह को रोकने के लिए, कॉलेजों-विश्वविद्यालयों तक स्त्रियों की पहुंच के लिए कितने आंदोलन लड़े गए लेकिन कोलकाता की सत्तर प्रतिशत लड़कियों के जीवन की हकीकत यह है कि कॉलेज की पढ़ाई खत्म होने से पहले ही उनके हाथ पीले हो जाते हैं, विवाह के बाद नौकरी की कोई परिकल्पना भी इनके पास नहीं होती। ये मानकर चलती हैं कि उनका जन्म घर बसाने के लिए हुआ है।

सबसे परेशानीमूलक बात यह है कि इन लड़कियां के पास आलोचनात्मक दृष्टि का घोर अभाव है। ये हर तरह की फिल्में देखती हैं, चाहे आर्ट हो चाहे कमर्शियल, चाहे अंग्रेज़ी हो, बांग्ला हो या हिन्दी और हर फ़िल्म देखकर ‘भालो’ कहती है। लेकिन ‘भालो’ किस वजह से है, फ़िल्म में समस्या कहां-कहां है, मध्यवर्ग/निम्नवर्ग की किन-किन समस्याओं को उठाया गया है या कोई समस्या है ही नहीं; इनसे उन्हें कोई संबंध नहीं। वे केवल ‘उपभोक्ता’ की भूमिका अदा करती हैं। उनकी चर्चा व रूचि का विषय दुपट्टा, कुर्ती, इयरिंग आदि से घिरी होती है। इस उपभोक्तावादी मनोदशा ने कोलकाता में एक समय मौजूद तर्कवादी, विवेकवादी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा विचारप्रणाली को खत्म कर दिया है। अब हर चीज़ अंधविश्वास से चलती है। बिल्ली का रास्ता काटते ही रुक जाना और किसी की प्रतीक्षा करना, हर बंगाली की उंगलियों में तीन-चार या उससे ज़्यादा ग्रहरत्नों का होना इस बात को दर्शाता है कि वे अवैज्ञानिक दृष्टि व रूढ़िवादी मानसिकता से घिरे हुए हैं। 

बंगाली मध्यवर्ग की सबसे बड़ी क्षति ज्ञानविहीन कैरियरिस्ट मनोदशा ने की है। कैरियर बनाने की होड़ ने आधुनिक युवतियों को विचारों से दूर किया है। हर विषय में बढ़िया नंबर लाने के बावजूद किसी भी विषय में उनकी गहरी पकड़ नहीं है। उनके पास कोई सामाजिक व राजनीतिक दृष्टि नहीं है, उनकी कोई सामाजिक चिंता नहीं है, देश को बदलने, समस्याओं को दूर करने की कोई फ़िक्र नहीं है। वे केवल नौकरी के लिए पढ़ती हैं, परीक्षा में अच्छे नंबर के लिए पढ़ती हैं।

यह सही है कि आज भी कोलकाता तथा बंगाली स्त्रियों में कुछ ऐसी विशेषताएं मौजूद हैं जो उन्हें अन्य राज्य की स्त्रियों से अलग करती है लेकिन बंगाली संस्कृति का जो अवमूल्यन लगातार हो रहा है उसमें उपरोक्त समस्याओं की अहम भूमिका रही है। जब तक समय के अनुसार स्त्रियां अपने को नहीं बदलेंगी तब तक संस्कृति विकसित नहीं होंगी और संस्कृति के स्थिर हो जाने का अर्थ है एक जाति का नष्ट होने के कगार पर पहुंच जाना। संस्कृति को बचाने के लिए यह ज़रूरी है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ-साथ शारीरिक व मानसिक आत्मनिर्भरता भी विकसित हो, वैज्ञानिक दृष्टि तथा साहित्य-बोध विकसित हो, हम लगातार अपग्रेड हों।


Saturday, 26 March 2016

स्त्री- मुक्ति के सवाल और यशपाल —सारदा बैनर्जी


यशपाल ने अपने उपन्यासों में स्त्री-मुक्ति के विषय को प्रमुख स्थान दिया। स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व तथा उसके अस्मिता-बोध के विकास के लिए पितृसत्ताक विचारधारा और मानसिकता से स्त्री की मुक्ति ज़रूरी है, इसे यशपाल भली-भांति समझते थे। यही वजह है कि यशपाल ने अपने उपन्यासों में ऐसे स्त्री-चरित्रों का निर्माण किया है जो पुंसवादी माहौल में पुंसवादी मान्यताओं से घिरे होकर भी अपने परतंत्र अस्तित्व की बाधाओं व परवश अस्मिता की समस्याओं से परिचित होकर पितृसत्ता की श्रृंखलाओं से स्वयं को कुछ हद तक मुक्त करने में सक्षम होते हैं। यशपाल के उपन्यास पितृसत्ताक मानसिकता, मूल्यबोध, विचारधारा तथा दृष्टिकोण के लिए बहुत बड़ी चुनौती पेश करते हैं। साथ ही यशपाल ने करुणा की मूर्ति, त्रासदी की अंतर्गाथा तथा रूदन करने वाली नायिका के रूप में स्त्री को चित्रित न करके बुद्धिमती, ज्ञानी, विवेकशील, निर्भीक, स्पष्टवादी व सामाजिक शिरकत करने वाले स्त्री-स्वरूप को सामने रखा है। इससे स्पष्ट होता है कि यशपाल समाजवाद की स्थापना केवल एक समाज-व्यवस्था के तौर पर ही नहीं अपितु स्त्री-पुरुष के आंतरिक संबंधों में भी समानता को प्रतिष्ठित करना चाहते थे।

यशपाल पुरुष की संपत्ति के तौर पर स्त्री की स्वीकृति के सख्त विरोधी थे। स्त्री विवाह से पहले पुरुष की संपत्ति और विवाह के बाद पति की संपत्ति वाले पुंसवादी मॉडेल को यशपाल नापसंद करते थे। यशपाल इसके समर्थक थे कि स्त्रियां अपनी इच्छाओं को प्रमुखता दे तथा पुरुषाश्रय से मुक्त होकर आत्मनिर्भर बन सकें। ‘दादा कॉमरेड’ उपन्यास की नायिका शैल स्वतंत्र विचारों से लैस है। वह पुरुषाश्रित नहीं है, अपनी इच्छाओं को महत्व देती है तथा उसे यथासंभव अपने जीवन में लागू भी करती है। अपने आप को पुरुष की संपत्ति के रूप में देखना उसे नागवार लगता है। क्रांतिकारी हरीश से बातचीत के दौरान हरीश के मत को जानने के उत्साह से वह सवाल करती है, “तुम्हारा भी खयाल है न, स्त्री को किसी न किसी व्यक्ति की सम्पत्ति बन ही जाना चाहिये और पुरुष उदारता से एक दूसरे को अपनी-अपनी सम्पत्ति की स्त्री पर पूर्ण अधिकार भोगने का अवसर देते रहें!”

‘पूँजीवाद की भोग्य महिला और समाजवाद की आत्म-निर्भर नारी!’ शीर्षक निबंध में यशपाल ने पूँजीवादी समाज-व्यवस्था और समाजवादी समाज-व्यवस्था में स्त्री के प्रति दृष्टिकोण के फ़र्क को सामने रखा है। इस निबंध में बड़े ही व्यंग्यात्मक लहज़े में कथोपकथन की शैली में स्त्रियों की वर्तमान अवस्था तथा उससे बेहतर अवस्था बनाने के उपायों की चर्चा हुई है। यशपाल ने लिखा है, “समाजवादी विचारधारा के अनुसार स्त्री को सम्पत्ति नहीं समझा जा सकता। उसका दान नहीं किया जा सकता। उसे खरीदा और बेचा नहीं जा सकता। वह किसी भी प्रकार की सम्पत्ति नहीं, स्वतंत्र आत्म-निर्भर व्यक्ति है।”

यशपाल के अनुसार समाजवादी समाज चूंकि स्त्री को संपत्ति के रूप में नहीं देखता इसलिए वहां स्त्री के चारित्रिक विकास की पूरी संभावनाएं मौजूद होती हैं। लेकिन पूँजीवादी समाज-व्यवस्था में स्त्री की स्वतंत्रता भी अंततः गुलामी का ही पर्याय है। जब तक स्त्रियों के प्रति समाज में वस्तुकेंद्रित मानसिकता बनी रहेगी तब तक पुंसवादी बंधन से स्त्रियों की मुक्ति संभव नहीं। लेकिन अधिकतर स्त्रियां अपने इस गुलाम अस्तित्व की अवस्थिति से अनभिज्ञ रहती हैं। ‘दादा-कॉमरेड’ की शैल स्त्री-पुरुष के समतावादी सह-अस्तित्व में विश्वास रखने वाली स्त्री है, पूंजीवादी समाज में स्त्री की अवस्था का अवलोकन करते हुए वह हरीश से सवाल करती है, “यदि स्त्री को किसी न किसी की बन कर ही रहना है तो उसकी स्वतंत्रता का अर्थ ही क्या हुआ? स्वतंत्रता शायद इसी बात की है कि स्त्री एक बार अपना मालिक चुन ले परन्तु गुलाम उसे ज़रूर बनना है।”
‘दिव्या’ उपन्यास में यशपाल ने समाज में स्त्री की भोग्या की इमेज को बार-बार पाठकों के सामने रखा और इसके ज़रिए पुंसवादी मानसिकता की हकीकत को बेपर्दा किया है। जीवन की विभिन्न परिस्थितियों के अनुभव से दिव्या को यह ज्ञान होता है कि पुरुषों की दृष्टि में स्त्री का अस्तित्व केवलमात्र भोग्या का है। अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए दिव्या कभी ‘दारा’ बनती है कभी ‘अंशुमाला’। पितृसत्ताक सामाजिक संरचना में स्त्री की परतंत्र दशा पर अंशुमाला बनी दिव्या सोचती है, “गत संध्या वह अपने मन का दुख प्रकट करने के लिये स्वतन्त्र थी। इस समय वह विनोद का साधन बनने के लिये विवश है। रसिक समाज अपने नेत्रों से उसका लावण्य भोग रहा है। वह परवश होकर भोग के लिये उपस्थित है।”

यशपाल इस बात के विरोधी थे कि स्त्री की पहचान पुरुष की पहचान के आधार पर तय हो। स्त्री की स्वतंत्रता उसकी आर्थिक मुक्ति में है, पुंस-सत्ता से पृथक सत्ता निर्मित करने में है। ‘दिव्या’ उपन्यास में मारिश जब अंशुमाला को विवाह का प्रस्ताव देता है तो अंशुमाला उसे तुरंत अस्वीकार कर देती है। मारिश के यह कहने पर कि नारी के जीवन की सार्थकता के लिए पुरुष का आश्रय आवश्यक है और नारी पुरुष का आश्रय भी है तो अंशुमाला मारिश को दो टुक जवाब देती है, “आर्य, इस प्रश्रय में नारी के जीवन की सार्थकता क्या है पुरुष द्वारा उसका भोग और उपयोग! जैसे पान की इच्छा होने पर पानपात्र की सार्थकता है। आर्य, उस प्रश्रय की इच्छा न करने पर ही नारी स्वतंत्र है।”

यशपाल स्त्रियों की मानसिक गुलामी और उनके शारीरिक दासत्व से उनकी मुक्ति के पक्षधर थे। वे चाहते थे कि स्त्रियां अपने सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण करें लेकिन यह तभी संभव होगा जब स्त्रियां आर्थिक रूप से मज़बूत हों। संवैधानिक तौर पर स्त्री के पास समानता का अधिकार होने के बावजूद व्यवहार में स्त्रियां असमान पारिवारिक व सामाजिक संरचना में जी रही हैं। समतावादी समाज के निर्माण के लिए यह ज़रूरी है कि स्त्रियां स्वावलंबी बनें। यशपाल ने उपरोक्त निबंध में लिखा है, “यदि स्त्री आर्थिक रूप से पुरुष के अधीन और आश्रित रहेगी तो समाज में उसकी स्थिति पुरुष के समान कभी नहीं हो सकेगी। समाज में पुरुष के समान अधिकार और स्थिति पाने के लिये स्त्री का आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर होना आवश्यक है।”

‘मनुष्य के रूप’ उपन्यास में यशपाल ने सोमा और मनोरमा को परनिर्भरता से मुक्त होकर क्रमशः आत्मनिर्भर बनते दिखाया है। अशिक्षित व असहाय सोमा को कभी प्रेम के लिए तो कभी आश्रय(आवास) के लिए पुरुषों पर आश्रित होना पड़ता है; केवल आश्रयदाता बदल जाता है। बदले में वह पुरुष को अपना शरीर और श्रम देती है। सोमा के परिप्रेक्ष्य में स्त्रियों की इस पराश्रित अवस्थिति पर मनोरमा सोचती है, “..सभी स्त्रियां आश्रय का मूल्य, प्रेम का मूल्य अपने शरीर से चुकाती हैं। आत्म-तुष्ट प्रेम तो वही है जो मूल्य में आश्रय न मांगे....प्रेम करने का अधिकारी वही है जो आश्रय न मांगे, जो अपने पांव पर खड़ा हो।”

लेकिन स्त्री को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में देखने वाले पितृसत्ताक समाज में आधुनिक सोच से संपन्न स्त्रियों के लिए भी हर कदम पर बाधाएं हैं। उनके मुक्त अस्तित्व को समाज स्वीकार नहीं कर पाता। ‘दादा कॉमरेड’ की शैल आधुनिक ढंग से जीना चाहती है लेकिन समाज में व्याप्त सामंती मानसिकता का बंधन कहीं न कहीं उसकी आधुनिकता में बाधा बनती है। उसका प्रेमी खन्ना उसे व्यक्तिगत संपत्ति मानते हुए उसके शरीर पर पूर्णाधिकार चाहता है। जब उसे यह पता चलता है कि अपने पूर्वप्रेमी के साथ शैल का केवल आत्मिक प्रेम ही नहीं शारीरिक संबंध भी था तब वह शैल से अपना रिश्ता तोड़ देता है। शैल अपने मित्र हरीश से कहती है, “मन की अपवित्रता क्षमा हो सकती है शरीर की नहीं......और यही खन्ना कहते थे कि वे मुझे आत्मा से प्रेम करते थे परन्तु शरीर पर एकाधिकार चाहते थे।”

यशपाल का मानना था कि प्रेम, स्त्री के शरीर और मानव-संबंधों को सिर्फ नैतिकता की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। विवेकपूर्ण नैतिकता और आरोपित नैतिकता में भेद होता है। यशपाल ने आरोपित नैतिकता को इंसान के लिए खतरनाक माना है जो इंसान को शारीरिक और मानसिक नैतिकता की जकरबंदी में कैद रखता है। वे विवेकपूर्ण नैतिकता को सही मानते थे। समाज में प्रेम के साथ नैतिकता को नत्थी करके देखा जाता रहा है। पुरुष किसी स्त्री से प्रेम करता है तो वह उस स्त्री के शरीर पर एकाधिकार चाहता है। इसके अतिरिक्त पुरुष स्त्री को यौन-शुचिता की दृष्टि से भी संपूर्ण चाहता है। यानि पुरुष का प्रेम केवल स्त्री की आत्मा व उसके शरीर से ही नहीं उसकी योनी जनित नैतिकता से भी तय होता है।

यशपाल प्रेम के मामले में शारीरिक और मानसिक हर तरह की वर्जनाओं को, हर प्रकार की कुंठाओं को तोड़ना  चाहते थे। यशपाल ने वायवीय प्रेम को सारहीन माना है और आध्यात्मिक प्रेम में विश्वास रखने वालों का मखौल उड़ाया है। साथ ही पार्थिव प्रेम को महत्व दिया है। ‘साहित्य, कला और प्रेम’ शीर्षक निबंध में लिखा है, “साहब, आध्यात्मिक प्रेम नपुंसक प्रेम है। वासना को पूरा करने की जब सामर्थ्य न हो तो मन को बहलाने का तरीका है। स्वयं जो कुछ कर सकने का अवसर नहीं, भगवान के नाम से उसकी कल्पना कर मन को बहला दिया।” ‘देशद्रोही’ उपन्यास की चंदा, भगवानदास खन्ना से प्रेम करते हुए भी विवाहित स्त्री का विवाह के बाद गैर-पुरुष से शारीरिक संबंध अनैतिक मानती है। जब खन्ना उसके हाथ को स्पर्श करता है तो चंदा दूर हट जाती है। इस पर डॉ. खन्ना अपनी राय रखता है, “शरीर तो केवल साधन मात्र है। उससे तो अच्छे-बुरे सभी स्पर्श होते हैं। प्रश्न तो है, किसी बात को बुरा समझ कर करना अवश्य उचित नहीं है परन्तु प्रत्येक स्पर्श में मनोविकार भी अवश्य हो, यह मैं विश्वास नहीं करता।”

समाज में विवाहेतर प्रेम को आम तौर पर उच्छृंखलता का पर्याय मान लिया जाता है। प्रेम और उच्छृंखलता की परिभाषा देते हुए ‘पूँजीवाद की भोग्य महिला और समाजवाद की आत्म-निर्भर नारी!’ शीर्षक निबंध में यशपाल ने लिखा है, “उच्छृंखलता तो तब होती है, जब प्रेम दिल बहलाव के लिये होता है और कला के लिये कला होती है।...हम तो प्रेम को जीवन के विकास और रक्षा का साधन मानते हैं। वह केवल व्यक्तिगत वस्तु नहीं, सामाजिक कर्तव्य के आधार पर दो व्यक्तियों का संबंध है।”

पुरुषों में स्त्रियों पर अधिकार स्थापित करने की पुंसवादी अधिकार-भावना पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए यशपाल ने उसे गलत और निस्सार बताया है। ‘देशद्रोही’ उपन्यास के डॉ. खन्ना दस साल बाद जब भारत लौटते हैं तब यमुना से उन्हें पता चलता है कि उसकी पत्नी राज का इस गलतफ़हमी में कि खन्ना की मौत हो चुकी है, खन्ना के दोस्त बद्री बाबू से विवाह हो चुका है। पहले तो वह बहुत निराश होता है लेकिन बाद में उसे अपनी निराशा का कारण राज पर उसकी पुंसवादी अधिकार-भावना नज़र आती है। अपने मन को समझाते हुए खन्ना सोचता है, “स्त्री पति को खोकर उसकी स्मृति के प्रति वफ़ादार बनी रहे, यह पुरुष का गरूर है। मर जाने के बाद पुरुष को गरूर से संतोष भी नहीं मिलता परन्तु स्त्री का जीवन और सर्वस्व भस्म हो जाता है। स्त्री के जीवन और सर्वस्व का मूल्य पुरुष के निरर्थक गरूर से भी गया बीता है? राज ने ऐसा कौन काम किया जो मैं नहीं कर आया? नर्गिस और गुलशां क्या मेरे जीवन में नहीं आईं?”

ससुराल में पति के जीवन के उत्थान-पतन को पत्नी के भाग्य के साथ नत्थी करके देखा जाता है। बहू का ससुराल में आने के साथ-साथ ससुराल के संदर्भ में बहू के कदमों के शुभ-अशुभ फलों की चर्चा शुरू हो जाती है। ‘देशद्रोही’ में यशपाल ने इसी मानसिकता पर प्रहार किया है। जब राज ने पहली बार ससुराल में कदम रखा तो ससुरालवालों का रूख अलग था लेकिन जब खन्ना की मृत्यु की खबर आई तब उसी राज के लक्षण खराब माने गए, “नये ढंग की पढ़ी-लिखी बहू के घर आने से बुआ और जेठानी ने परेशानी अनुभव की थी परन्तु डाक्टर के ऊंची नौकरी पा जाने के उत्साह में वह भुला दी गई थी। घर में बहू के आने पर लक्ष्मी के चरण पड़ने के कारण वह लाला ईश्वरदास की दृष्टि में सुलक्षणा लक्ष्मी और लाड़ली बन गई थी। सास के आसन की अधिकारी बुआ और जेठानी उसे कुछ न कह सकती थीं। परन्तु कुलक्षणा विधवा बन जाने पर वही बहू बोझ बन गई।”



स्त्रियों ने पुंसवादी फ्रेमवर्क में अपने आप को इस तरह ढाल लिया है कि उन्हें इस बात का अहसास ही नहीं होता कि उनकी अपनी स्वतंत्र इच्छाएं व स्वतंत्र व्यक्तित्व भी होना चाहिए। पुंसवादी समाज की आंतरिक संरचना में कैद स्त्री इतनी बंधनयुक्त होती है कि प्रेम के मामले में भी उसे मुक्त निर्णय का अधिकार नहीं होता। ‘देशद्रोही’ में यशपाल ने इसी निर्धारित प्रेम की सीमा पर सवालिया निशान लगाया है। विवाह संस्थान में तयशुदा या गुलाम प्रेम के चरित्र को उजागर किया है। राज इस कदर परतंत्र है कि अपने पूर्व-पति को भी आश्रय देने में असमर्थ है। हालांकि उसी राज ने अपने पति(डॉ. खन्ना) की मृत्यु की खबर सुनकर अफीम खाकर प्राण त्यागने की कोशिश की थी। यानि विवाह-संस्थान के नियमों में बंधी स्त्री मानवीयता दिखाने के लिए या अपनी इच्छाओं को व्यक्त करने के लिए भी स्वतंत्र नहीं है; उसका प्रेम भी बंधनयुक्त होता है, तयशुदा होता है। स्त्री के जीवन में इंसानियत के लिए भी कोई स्थान नहीं है कारण समाज स्त्री के इंसानियत को भी संदेह की नज़र से देखता है। इसलिए स्त्री इंसानियत को जाहिर करने से भी डरती है, मन की इच्छाओं को अभिव्यक्ति करने से भी डरती है कि कहीं उसका संसार उजड़ न जाए। उपन्यास के अंत में राज पहले तो अपना संसार उजड़ने के डर से बहन चंदा और घायल खन्ना को शरण देने से इनकार कर देती है, बाद में रात भर बिताने के बाद चले जाने को कहती है। खन्ना इस निर्णय से बेहद आहत होता है और कहता है, “मैं राज के लिए शत्रु हो गया? वह दीवार की ओट पड़ी है? मुझे देखने भी नहीं आ सकती? वह तो मेरे प्रेम में प्राण न्योछावर कर रही थी! ...आज क्या हो गया? हाय रे स्त्री! तेरा प्रेम भी मजबूरी का है, गुलामी का है...।”

इन पंक्तियों में इस बात को भी सामने रखा गया है कि गरीब मज़दूरों के हक की बात करने वालों(बद्री बाबू और राज) के अंदर जनसेवा का भाव कितना खोखला होता है कि राज किसी पीड़ित इंसान की मदद इसलिए नहीं कर सकती कि उसकी सांसारिक प्रतिष्ठा को ठेस न पहुँचे, उसके सुसरालवाले उस पर संदेह न करें।
यह दुखद है कि यशपाल के उपन्यासों के स्त्री-मुक्ति के पक्ष पर आलोचकों की दृष्टि नहीं गई। अपितु यशपाल के उपन्यासों के स्त्री–पुरुष पात्रों को अश्लील, अनैतिक और अस्वस्थ कहा गया तथा परंपरागत पात्रों से हटकर नए ढंग के पात्रों को निर्मित करने के कारण उनकी जमकर आलोचना भी हुई। ‘यशपालजी और अश्लीलता’ शीर्षक निबंध में रामविलास शर्मा ने लिखा है, “खन्ना की प्रेम कहानी एक अनैतिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ आदमी की प्रेम कहानी है। यहाँ प्रश्न अश्लीलता का नहीं वरन् उसके कमज़ोर अनैतिक आचरण का है।”
 समस्या यह है कि उपन्यास के स्त्री-पुरुष चरित्र जब तयशुदा पुंसवादी नियमों के तहत आचरण करते हैं तब वे नैतिक, संस्कारी व निष्ठावान माने जाते हैं लेकिन जब वे उस फ्रेमवर्क से तोड़कर पुरुषसत्ता विरोधी, परंपरा-विरोधी और स्वच्छंद आचरण करते हैं तब वे मर्यादाहीन-चरित्रहीन तथा अनैतिक घोषित किए जाते हैं। यशपाल इसी संकीर्ण मनोवृत्ति पर चोट करना चाहते थे। इसीलिए वे शैल के ज़रिए आधुनिक, अपनी अस्मिता के प्रति सचेत, आत्ममर्यादा संपन्न स्त्री को सामने रखते हैं। डा. खन्ना, डॉ. प्राणनाथ, भूषण और हरीश के ज़रिए यशपाल ऐसे पुरुष-चरित्रों को पेश करते हैं जो स्त्रियों का सम्मान करते हैं, स्त्री-इच्छा को प्रधानता देते हैं; स्त्रियों पर पुंसवादी दबाव नहीं पैदा करते।

‘झूठ-सच’ उपन्यास के डा. प्राणनाथ के माध्यम से यशपाल एक ऐसे पुरुष-चरित्र को चित्रित करते हैं जो अपने व्यवहार में बेहद मानवीय है। प्राणनाथ तारा से प्रेम करता है। यह जानते हुए भी कि तारा बलात्कृत हो चुकी है प्राणनाथ तारा को विवाह का प्रस्ताव देता है। तारा की चिकित्सा के लिए भी राज़ी होता है और अंततः दोनों विवाह-सूत्र में बंधते हैं। स्पष्ट होता है कि यशपाल तारा के माध्यम से आत्मनिर्भर, जीवटसंपन्न, व्यक्तित्वशालिनी व मेधावी स्त्री-चरित्र को सामने रखते हैं वहीं प्राणनाथ के माध्यम से एक ऐसे पुरुष-चरित्र को पेश करते हैं तो स्त्री को उसकी यौन-शुचिता तथा नैतिकता से पृथक करके देखता हो। प्राणनाथ इस टैबू से मुक्त है कि स्त्री केवल शरीर है और उस पर अधिकार स्थापित करना है। वह स्त्री को इंसान के तौर पर देखता है और एक इंसान के रूप में ही तारा से प्रेम करता है। जब हम स्त्री को एक इंसान के तौर पर देखेंगे तो स्त्री की समस्याएं भी नज़र आएंगी। स्त्री के नागरिक अधिकार भी दिखाई देंगे। प्राणनाथ तारा तथा दूसरी स्त्रियों के साथ बेहद आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करता है। इससे स्पष्ट होता है कि यशपाल किस तरह के पुरुषों को समाज में देखना चाहते थे।

हालांकि यशपाल के चित्रण की यह सीमा थी कि उन्होंने स्त्रियों को मुक्त होते तो दिखाया लेकिन दोबारा बंधनयुक्त होने के लिए। उनकी स्त्रियां समाज में समान अधिकार चाहती हैं, वस्तुकेंद्रित मानसिकता से संघर्ष भी करती हैं लेकिन वापस पुरुषों की शरण में जाने के लिए; वापस तयशुदा विचारों में बंधने के लिए। उनके उपन्यासों के आधुनिक स्त्री-चरित्र वैचारिक आत्मनिर्भरता को समझते-पहचानते हैं लेकिन मानसिक और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाते। ‘झूठा-सच’ की तारा को अपवादस्वरूप छोड़ दिया जाए तो उनके उपन्यासों की नायिकाएं अंततः पुरुष को ही अपने त्राणकर्ता के रूप में वरण करती हैं। ‘दिव्या’ उपन्यास में दिव्या मारिश के व्यवहार से अवगत होते हुए भी शेष में मारिश को ही जीवनसंगी के रूप में अपनाती है। ‘देशद्रोही’ की चंदा उपन्यास के अंत तक मर्यादा, उचित-अनुचित, भय आदि रूढ़िबद्ध भावनाओं से मुक्त हो जाती है और यह निर्णय लेती है कि वह स्वयं अपने जीवन के फैसले लेगी लेकिन अंत तक इसकी रक्षा नहीं कर पाती। ‘दादा कॉमरेड’ की शैल जो सुशिक्षित आधुनिक विचारों की युवती है, वह भी अंततः बिना आत्मनिर्भर बने(नौकरी किए) दादा को शरण में लेने के लिए कहती है। ‘मनुष्य के रूप’ की मनोरमा मानसिक रूप से सर्वदा भूषण पर आश्रित रहती है और उसके आत्मनिर्भर बनने में भी भूषण का ही योगदान रहता है। ‘मनुष्य के रूप’ की सोमा भी फ़िल्मों की प्रतिष्ठित नायिका बन जाने के बाद भी सर्वदा बनवारी पर अपने निर्णयों के लिए आश्रित बनी रहती है। हालांकि यशपाल स्त्रियों के आर्थिक और मानसिक स्वावलंबन के पक्षधर थे और यह भी जानते थे कि स्त्री की मुक्ति में इनकी बड़ी भूमिका है, तब भी अपने उपन्यासों में पूर्णतः आत्मनिर्भर स्त्री-चरित्र नहीं प्रस्तुत कर पाए।

यशपाल के उपन्यासों का मुख्य ज़ोर इस बात पर रहा है कि समाज में स्त्रियों के पराश्रित अस्तित्व की समस्या को पाठकों के सामने रखा जाए तथा स्त्रियों को उनकी मातहत अवस्था और अधीन मानसिकता से मुक्त किया जाए। आधुनिक समाज में पुरुषों को जितने अधिकार प्राप्त हैं वे सारे अधिकार स्त्रियों को भी मिले। इसके अतिरिक्त यशपाल पुरुषों में मानवीय, संवेदनशील तथा स्त्री-मुक्ति के पक्षधर विचारधारा को विकसित करना चाहते थे।

पूंजीवादी समाज में रहते हुए परंपरागत व गुलाम मनोदशा से स्त्रियों की मुक्ति संभव नहीं कारण पूँजीवादी समाज-व्यवस्था में अन्य वस्तुओं की तरह स्त्री भी एक वस्तु ही है। स्त्रियों का अपने इस वस्तु-बोध से मुक्त होना ज़रूरी है। स्त्रियों में यह सचेतनता होनी चाहिए कि वे अन्य की संपत्ति नहीं हैं। स्त्री एक मनुष्य है और मनुष्य होने के नाते उसका भी वही अधिकार है जो एक पुरुष का है। अधिकार-बोध की यह भावना स्त्री में अस्मिता-बोध को जागृत करता है। स्त्री की स्वंतत्र अस्मिता के निर्माण के लिए उसकी आर्थिक आत्मनिर्भरता ज़रूरी है। आर्थिक आत्मनिर्भरता उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता को पुख्ता करता है। इसके साथ ही स्त्री के पास एक वैकल्पिक समाज और सामाजिक संबंध होना ज़रुरी है ताकि वह समय का सदुपयोग कर सके। यशपाल हर तरह से आत्मनिर्भर स्त्रियों को ही समाज में देखना चाहते थे।



संदर्भ-सूची -

1 . यशपाल, दादा-कामरेड, विप्लव कार्यालय, लखनऊ, 1965, पृ.-28
2.  यशपाल, यशपाल के निबंध(खण्ड-2), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994, पृ.-134
3. यशपाल, दादा-कामरेड, विप्लव कार्यालय, लखनऊ, 1965, पृ.-28
4. यशपाल, दिव्या, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1987, पृ.-150
5.  वही, पृ.-159
6. यशपाल, यशपाल के निबंध(खण्ड-2), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994, पृ.-131
7. यशपाल, मनुष्य के रूप, लोकभारती प्रकाशन, लखनऊ, 1983, पृ.-189
8. यशपाल, दादा-कामरेड, विप्लव कार्यालय, लखनऊ, 1965, पृ.-36
9. यशपाल, यशपाल के निबंध(खण्ड-2), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994, पृ.-11
10. यशपाल, देशद्रोही, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1984(नवां संस्करण), पृ.-172
11. यशपाल, यशपाल के निबंध(खण्ड-2),लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1994, पृ.- 132
12. यशपाल, देशद्रोही, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1984(नवां संस्करण), पृ.-138
13. वही, पृ.-34
14. वही, पृ.-246
15. शर्मा, डॉ. रामविलास शर्मा, मार्क्सवाद और प्रगतिशील साहित्य, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 1994, 2008, पृ.-350

Saturday, 26 December 2015

रजस्वला स्त्री और ‘अपवित्रता’ का पुंसवादी प्रपंच– सारदा बैनर्जी


केरल के ब्रह्मचारी देवता ‘अय्यप्पा’ के सबरीमाला मंदिर में दस से लेकर पचास तक की उम्र की लड़कियों-स्त्रियों का प्रवेश निषेध है कारण यह स्त्रियों के रजस्राव होने की उम्र होती है। हाजी अली दरगाह के गर्भगृह में पंद्रहवीं शताब्दी से स्त्रियों के प्रवेश पर बैन लगा हुआ है कारण मान्यता है कि रजस्राव होने के कारण स्त्रियां अपवित्र होती हैं, इसलिए उनका प्रवेश निषिद्ध है। यही नियम कई गिरजाघरों में भी स्त्रियों पर लागू हैं। प्राचीन धर्मशास्त्रों में इस बात का उल्लेख हुआ है कि रजस्राव के दौरान स्त्रियां अपवित्र हो जाया करती हैं इसलिए किसी भी तरह के धार्मिक क्रियाकर्म(पुण्यकर्म) में वे शुमार नहीं हो सकतीं, किसी भी ईश्वरीय मूर्ति को वे रजस्वला के दौरान छू नहीं सकतीं और किसी भी धार्मिक संस्थान(मंदिर, मस्जिद, गिरजा) में कदम नहीं रख सकतीं। ‘मनुस्मृति’ के पांचवे अध्याय में इस बात का उल्लेख है कि रजस्राव के तीसरे दिन तक स्त्रियां अशुद्ध रहती हैं, चौथे दिन सिर धोकर नहाने के पश्चात वह पुनःपवित्रावस्था या शुद्धावस्था में लौट आती है। रजस्वला अवस्था में घर के सामान को स्पर्श कर लिए जाने के कारण होने वाले पाप के निवारण के लिए कई तरह के व्रत भी प्रचलित हैं जिनमें एक है ‘ऋषिपंचमी व्रत’ जो भाद्रपद शुक्लपक्ष की पंचमी को किया जाता है। ऋषिपंचमी की कथा में कथालेखकों ने श्रीकृष्ण द्वारा यह उपदेश भी दिलाया है कि यदि रजस्वला स्त्री गृहकार्य को स्पर्श करती है तो पापकर्म के कारण उसे नर्क में स्थान मिलता है। इसलिए चारों वर्णों की स्त्रियों को रजस्राव के दौरान गृहकार्य से दूर रहना चाहिए। लेकिन यह केवल उपदेश तक ही सीमित नहीं था अपितु समाज के मन में रजस्वला स्त्री के प्रति भय पैदा करने के लिए और स्त्रियों को अपवित्र करार देने के लिए एक काल्पनिक कहानी भी रची गई। कहानी यह कि सतयुग में सुमित्र नाम के खेती करने वाले ब्राह्मण को उसकी सती-साध्वी पत्नी जयश्री ने रजस्वला अवस्था में स्पर्श कर दिया तथा घर के सारे काम भी किए। अगले जन्म में जयश्री ने कुतिया की और सुमित्र ने बैल की योनी प्राप्त की।

इन नियमों का अनुसरण करते हुए पुंसवादी ताकतों ने शताब्दियों से घर-घर में स्त्रियों को रजस्राव के दौरान पूजा तथा शुद्धिमूलक कार्यों से वंचित रखा। पुंसवादी नियमों के गिरफ़्त में धीरे-धीरे स्त्रियां भी आने लगी तथा उन नियमों के प्रति उन्होंने अपनी गहरी मानसिक प्रतिबद्धता भी दिखाई। पुंसवादी आचार-संहिता ने नियमावली के प्रतिपालन की पूरी जिम्मेवारी अभी पुराणपंथी स्त्रियों के हाथ में स्थानांतरित कर दी है और घर-घर में अपवित्रता की पवित्र शिक्षा मां या दूसरी बुज़ुर्ग स्त्रियों द्वारा नव-रजस्वला लड़कियों को दी जाती है। कुछ घरों में रजस्वला अवस्था के समय की अपवित्रता इतना गंभीर अपराध है कि केवल वह पूजागृह या धार्मिक कर्मकांड तक ही स्त्रियों का प्रवेश निषिद्ध नहीं रहता अपितु रजस्वला अवस्था में स्त्री रसोईघर में भी प्रवेश करने का अधिकार खो बैठती है, अपने माता-पिता को छूने के अधिकार से वंचित हो जाती है।
हाल में सबरीमाला मंदिर के अध्यक्ष गोपालकृष्णन ने यह इच्छा जाहिर की है कि मंदिर के द्वार पर ‘मेनस्ट्रूएशन स्कैनर’ लगाया जाएगा जिससे यह पता चल पाए कि स्त्री रजस्वला की अवस्था से गुज़र रही है या नहीं। इस स्कैनिंग के पश्चात स्त्रियों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिया जाएगा। ताज्जुब की बात है कि जो बालब्रह्मचारी या ईश्वर परमपवित्र, पतितपावन, मोक्षदाता, विघ्नहर्ता, पापनिवारक, सर्वशक्तिमान के तौर में पितृसत्ताक समाज में पूजित और प्रतिष्ठित हैं वे अतिसामान्य, बलहीन, निकृष्ट, बुद्धिहीन कही जाने वाली स्त्रियों के स्पर्शमात्र से अपवित्र हो जाएंगे!! आश्चर्य यह भी है कि परमअपवित्रों(स्त्रियों) व महापतितों(स्त्रियों) को भी पवित्र कर देने की क्षमता रखने वाले मनुवादियों के ईश्वर इतने शक्तिहीन और सामर्थ्यहीन हैं कि स्त्री के दर्शनमात्र से उनका व्रतभंग हो जाता है!! यह तो बालब्रह्मचारी भगवान अय्यप्पा के संयम, तपोबल, योगशक्ति और रिपुदमन के सामर्थ्य पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है! साथ ही भगवान अय्यप्पा के परमपवित्र उच्चकोटि के भक्तों के अवैज्ञानिक सोच और पुराणपंथी मानसिकता के हकीकत को भी बेनकाब करता है।
चलिए मान लेते हैं मनुवादियों की। लेकिन धर्मशास्त्र के मतों के अनुसार ईश्वर का अवस्थान तो हर एक पदार्थ में होता है। इस युक्ति के फलस्वरूप क्या हम यह न मान लें कि ‘रज’ में भी ईश्वर का वास होता है! तो क्या रज को पवित्र न माना जाए और रजस्वला स्त्री को भी पवित्र न माना जाए? स्पष्ट होता है कि स्त्रियों को हीन करार देने के उद्देश्य से ही युक्तिहीन व अवैज्ञानिक धार्मिक प्रपंचों का आदिकाल से निर्माण किया गया है और उन्हें कठोर संहिताओं में आबद्ध करके जनमानस के हृदय में बद्धमूल किया गया। सवाल यह है कि स्त्री-शरीर की प्राकृतिक क्रियाओं को मनचाहे ढंग से नियमबद्ध करने का अधिकार पुरुषों को दिया किसने? क्या किसी पुरुष को किसी स्त्री ने शारीरिक नियमों के आधार पर कभी अपवित्र घोषित किया? मंदिर और मस्ज़िद की आंतरिक पवित्रता को अक्षुण्ण रखने के नाम पर स्त्रियों की स्वतंत्रता पर हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार पुरुषों को नहीं है।


रजस्राव एक प्राकृतिक व स्वाभाविक पद्धति है। दस से पंद्रह साल की आयु की लड़की का अंडाशय हर महीने एक विकसित अण्डा उत्पन्न करना शुरू कर देता है। वह अण्डा अण्डवाहिका नली के द्वारा नीचे जाता है जो कि अंडाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है, उसका स्तर रक्त और तरल पदार्थ से गाढ़ा हो जाता है। ऐसा इसलिए होता है कि यदि अण्डा उर्वरित हो जाए, तो वह बढ़ सके और शिशु के जन्म के लिए उसके स्तर में विकसित हो सके। यदि उस अण्डे का पुरूष के शुक्राणु से सम्मिलन न हो तो वह स्राव बन जाता है जो कि योनि से निष्कासित हो जाता है। इसी स्राव को ‘रजस्राव’ कहते हैं। जिस रज के बहाव के कारण स्त्रियों को अपवित्र करार दिया जाता है उसी रज से इंसान(स्त्री-पुरुष) के शरीर का निर्माण होता है। रजस्वला हुए बिना एक स्त्री मां नहीं बन सकती। जो यह कहते हैं कि रजस्वला के दौरान दूषित रक्त बाहर निकलता है वे प्राकृतिक नियम की सर्वथा गलत व्याख्या करते हैं। रजस्राव का शारीरिक अशुद्धता से कोई संबंध नहीं है। वरन रज का न बहना ही स्त्री के अस्वस्थ होने का लक्षण है। अचंभे की बात है कि स्त्री के मातृत्व को तो समाज सम्मान व पवित्रता की नज़र से देखता है लेकिन माता बनने की प्रक्रिया को अपवित्र माना जाता है!

आश्चर्य है कि रजस्वला स्त्री को रजस्राव के दौरान किन-किन तरह की समस्याएं होती हैं इस पर पुंसवादी पुरुष कभी बात करना पसंद नहीं करते; ना ही इसकी उन्होंने कभी पड़ताल ही की। लेकिन पुरुष-वर्चस्व को प्रतिष्ठित करने के लिए वे रजस्वला स्त्री पर अर्थहीन मानसिक नियम ज़रूर तय कर दिए। आज लोकतंत्र को लागू हुए पैंसठ वर्ष हो गए लेकिन हम लोकतांत्रिक मानसिकता और लोकतांत्रिक नजरिये को विकसित नहीं कर पाए। लोकतंत्र के अस्तित्व में आने से पहले स्त्री के अधिकारों को लेकर कभी गहराई से विचार-विमर्श नहीं हुआ। पुरुषों द्वारा बनाए गए नियम ही स्त्रियों के नियम मान लिए गए। पुरुषों द्वारा तय किए गए नियम स्त्रियों के लिए निश्चित मान लिए गए। लेकिन लोकतंत्र के आने के बाद स्त्री के नागरिक अधिकार पर पहली बार बहस हुआ और यह लोकतांत्रिक बोध पैदा हुआ कि स्त्री के पास मानवाधिकार और नागरिक अधिकार मौजूद हैं। देश में लोकतंत्र तभी विकसित होगा जब हम लोकतांत्रिक ढंग से सोचेंगे और कार्य करेंगे। नागरिक अधिकारों पर हमला करके कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता। गिरजा, मंदिर या मस्जिद में प्रवेश करने का हक स्त्रियों को भी उतना ही है जितना कि पुरुषों को। मंदिर, मस्जिद और गिरजा संस्थान के तौर पर देश की संपत्ति है ना कि पुरोहितों, मौलवियों और पादरियों की। फलतः नियम लागू करके स्त्रियों का धार्मिक संस्थानों में प्रवेश रोकना अलोकतांत्रिक क्रिया है, असंवैधानिक हरकत है।

आज तकनीक इतनी विकसित हो गई है कि हम अत्याधुनिक मशीनों का प्रयोग करने के लिए कृतसंकल्प हैं। मंदिर का पुरोहित वर्ग भी रजस्वला स्त्री की पहचान करने के लिए स्कैनर लगाने की इच्छा जाहिर कर रहा है लेकिन अत्याधुनिक तकनीकों के प्रयोग के साथ-साथ पुरुषों को अपनी चिराचरित मानसिकता में भी बदलाव करना होगा। यह ध्यान रखना होगा कि केवल तकनीक के ज़रिए हम आधुनिक नहीं बन सकते और आधुनिक तकनीकों का सामंती सोच के विस्तार के लिए इस्तेमाल करना भी गलत है। आधुनिक बनने के लिए लोकतांत्रिक नज़रिया व वैज्ञानिक सोच ज़रूरी है।

लोकतंत्र स्त्री-मुक्ति का मार्ग है। हमें बाह्य लोकतंत्र के साथ-साथ आंतरिक लोकतंत्र भी स्थापित करने की ओर आगे बढ़ना चाहिए। पुराने विचारों की स्त्रियां रजस्राव को गुप्त चीज़ कहकर युवा लड़कियों को रजस्राव होने की बात को पुरुषों से छुपाने की सलाह देती रहती हैं। इस मनोदशा से मुक्त होना ज़रूरी है और यह भी ज़रूरी है कि हम खुलकर रजस्राव और रजस्वला स्त्री की समस्याओं पर बातें करें, उसकी तकलीफ़ों को समझें। पर्दा करने पर समस्याओं का समाधान नहीं होता वरन् इससे समस्या बलवती होती है। लोकतंत्र में हर चीज़ पारदर्शी होती है। पर्दा लोकतंत्र का अंत है। आंतरिक लोकतंत्र के निर्माण के लिए ज़रूरी है कि हर चीज़ पर बहस हो। आज सामंतकालीन भक्तों और पुंसवादी शास्त्रज्ञों से ‘रजस्राव’ और ‘रजस्वला स्त्री’ की मुक्ति बेहद ज़रूरी बन पड़ा है।

Friday, 20 November 2015

आत्मनिर्णय से वंचित स्त्री की मानसिक गुलामी




वर्तमान समय में यह देखा जा रहा है कि आज़ादी से पहले स्त्रियों की स्थिति समाज में जैसी थी, आज़ादी के अड़सठ साल बाद भी उसमें बहुत गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ है। स्त्रियां स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, शिक्षित होकर उच्च पदों पर नियुक्त हो रही हैं लेकिन ज़्यादातर स्त्रियों के व्यक्तित्व में अभी भी आत्मविश्वास का अभाव बना हुआ है। अभी तक स्त्रियां पुरुषों के निर्णयों को ही सर्वोपरि मानकर जीवन के समस्त क्षेत्रों के मुख्य फैसले पुरुषों के फैसलों पर निर्भर रहकर ही ले रही हैं। अभी स्त्रियों का जीवन घर की चौहद्दी तक सीमित नहीं हैं; वे उस घेरे से बाहर निकल चुकी हैं। उन्होंने समाज को देखा-समझा है लेकिन अधिकतर स्त्रियां अपना निर्णय स्वयं लेने का अधिकार व क्षमता अब तक हासिल नहीं कर पाई हैं। उनके पहनावे से लेकर खान-पान तथा नौकरी में भी प्रेमी या पति के राय तथा इच्छा-अनिच्छा की बड़ी भूमिका होती है। स्त्रियां जीन्स पहने या साड़ी, कुर्ती पहने या सलवर-कमीज़, रंगीले-भड़कीले कपड़े पहने या सादा कपड़े, ज़्यादा सजकर घर से निकले या कम सजकर, चावल खाए या रोटी, वेज खाए या नॉन-वेज आदि-आदि निर्णय प्रेमियों/पतियों की हिदायतों के मुताबिक ही प्रेमिकाओं/पत्नियों के नित्यकर्म में शामिल हो रहा है।
 
ऐसी भी स्त्रियां हैं जो केवल संसार(घर) बसाने के उद्देश्य से ही नौकरी छोड़ रही हैं या पुरुष(पति) जिस तरह की नौकरी पसंद करता है या करने की अनुमति देता है, वैसी नौकरी ही स्वीकार कर लेती हैं। पति जिस –जिस तरह से अपनी और अपने पत्नी के संसार और जीवन को सजाना चाहता है उसी अनुरूप स्त्रियां भी परिचालित हो रही हैं और पुरुषों की हां में हां कर रही हैं। स्पष्ट है कि स्त्रियों के पास स्वायत्त निर्णय और अस्मिता-बोध का भयानक अभाव सामने आया है। सवाल उठता है कि क्या स्त्री-शिक्षा का उद्देश्य स्त्रियों को जीती-जागती गुड़िया में रूपांतरित करना है? क्या स्त्री-शिक्षा का अर्थ शिक्षित किंतु पति की आज्ञाकारी पत्नी बनाना है? क्या स्त्री-शिक्षा का अभिप्राय बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षित पत्नी का निर्माण करना लेकिन उसे पुरुषों के हिसाब से परिचालित कराना है?
ये चिंता की बात है कि शिक्षित होकर भी आधुनिकाएं आज्ञाकारी बेटी और पत्नी और प्रेमिका बन रही है यानी शारीरिक तौर पर आज़ाद होकर भी मानसिक गुलामी की शिकार हैं। हालांकि इस आज्ञाकारिता को हमारे प्राचीन पितृसत्ताक परिवार-व्यवस्था में बहुत सम्मान दिया जाता रहा है और आज भी आज्ञाकारी होना सबसे बड़ा गुण माना जाता है। लेकिन इस आज्ञाकारी मनोवृत्ति ने स्त्रियों की कितनी क्षति की है; उसका जितना भी बखान किया जाए वह कम है। इस आज्ञाकारिता ने स्त्री के व्यक्तित्व में कोई भी मूलभूत परिवर्तन नहीं होने दिया। वह हर बात में ‘हां’ कहनेवाली तथा अपनी बुद्धि का एक-तृतीयांश भी खर्च न करने वाली आज्ञाकारी गुलाम बनती जा रही है।

किसी भी प्रकार का निर्णय लेने के लिए बुद्धि, विवेक और अनुभव महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन जब स्त्रियां गुलाम मानसिकता में जीएगी तब इनके उपयोग की ज़रूरत ही महसूस नहीं होगी कारण सारे निर्णय पुरुष लेंगे और स्त्रियां उसे अनुसरण करने वाली आज्ञाकारी पत्नी बनी रहेगी। जाहिर है फिर स्त्रियां एक ऐसी गुलाम मानसिकता को समृद्ध कर रही है जो बुद्धि रहते हुए भी बुद्धिहीन, विवेक रहते हुए भी विवेकहीन और आत्ममर्यादा रहते हुए भी आत्ममर्यादाहीन है। वह चलती-फिरती गुड़िया में रूपांतरित हो रही है जो हंसती है, बोलती है, खाती है, कमाती है लेकिन ‘ना’ नहीं कहतीं। कारण ‘ना’ प्रतिवाद है और प्रतिवाद आज्ञाकारिता का विलोम रचता है। स्त्रीवादी ‘ना’ पुरुषवाद के लिए खतरा है। आज्ञाकारी स्वभाव पुरुषों को विशेष प्रिय होता है लेकिन स्त्रियों के व्यक्तित्व के विकास के लिए यह नुकसानदेह है। इस आज्ञाकारिता के कारण ही स्त्रियां अब तक पुरुषवाद के वैचारिक व दैहिक गुलामी का शिकार बनती आई है तथा अपने अधिकार व स्वायत्ता को समझने में असमर्थ रही है।

स्त्रियों के संदर्भ में शिक्षा का पहला अर्थ है अज्ञान से मुक्त होकर ज्ञान से रूबरू होना, दूसरा अर्थ है पुंसवादी गुलामी से मुक्त होना। यह मुक्ति केवल पुरानी श्रृंखलाओं से ही नहीं है जो अनादि काल से स्त्रियों के ईर्द-गिर्द बना हुआ है बल्कि उन मानसिकताओं से भी है जो स्त्रियों को परवश बनाती आई है। उन विचारधाराओं से भी है जो स्त्रियों को गुलाम बनाती आई है और उस दृष्टिकोण से भी है जो स्त्री-अस्मिता की पहचान और उसके विकास में लगातार बाधा बनती रही है। शिक्षा का सही कार्यान्वयन तब होगा जब पुरुषों की अधीनता वाली मानसिकता से स्त्रियां अपने आप को मुक्त करके जीवन में सही निर्णय ले सके व हर बात पर पुरुषों पर निर्भरशील ना हो। अपनी स्वतंत्र अस्मिता व अस्तित्व का स्वायत्त ढंग से विकास करें तथा अपने जीवन के फैसले स्वयं लें।

Saturday, 20 December 2014

बलात्कार के नए औज़ार— सारदा बैनर्जी


सोलह दिसम्बर, 2012 को मेडिकल की छात्रा निर्भया के साथ जिन अमानवीय हरकतों को किया गया उतने ही 'अमानवीय तरीके से बलात्कार करने' की धमकी देते हुए और रॉड जैसे हथियारों को साथ रखकर उसके ज़रिए दहशत पैदा करते हुए अब दूसरी लड़कियों के साथ बलात्कार को अंजाम दिेया जा रहा है। नृशंस बलात्कार की पुरानी घटनाएं अब होने वाले बलात्कार के समय औज़ार के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इसे बलात्कार के नए औज़ार के रूप में देखा जाना चाहिए। हाल में ही दिल्ली में उबेर नामक कंपनी के कैब में एक सत्ताइस साल की युवती के साथ कैब के ड्राइवर ने इसी युक्ति का सहारा लेते हुए बलात्कार किया। हरियाणा के हिसार ज़िले में बी.ए. के फार्म के लिए फॉटो खिंचवाने स्टुडियो पहुंची एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार कर उसका वीडियो बनाया गया और फिर वीडियो के ज़रिए लगातार तीन साल तक पीड़िता को ब्लैकमेल किया गया। पीड़िता ने साहस करके हाल में घटना का खुलासा किया है।
निर्भया बलात्कार कांड के अपराधियों को सज़ा दी गई। लेकिन इसके बाद भी देखा जा रहा है कि लगातार बलात्कार के वारदात होते रहे हैं। इन सारी घटनाओं ने पुराने सवालों को दोबारा उठाने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर स्त्रियां देश में कितनी सुरक्षित हैं? क्या स्त्रियों के पक्ष में दो-तीन कानून बना देने भर से ही स्त्रियां सुरक्षित हो जाएंगी? क्या समाज के गली-चौराहे कभी स्त्रियों के अनुकूल नहीं होंगे? निश्चिंत होकर कब स्त्रियां अपने घर पहुंचेगी? कब मर्द अपनी घिनौनी विचारधारा से मुक्त होगा?
निर्भया कांड ने पशुवत आचरण और हृदय रखने वालों को कितना संवेदनशील और मानवीय बनाया और बलात्कार जैसे अपराध के प्रति उन्हें कितना सचेत और सजग किया ये अब संशय के घेरे में है। शायद आए दिन आने वाली बलात्कारों की खबरें इन विकृत मानसिकता रखने वालों के लिए ईंधन का काम कर रहे हों ये भी संभव है कि जिन बर्बर बलात्कार की घटनाओं को अखबारों में पढ़कर हम सचेत और संवेदनशील नागरिक शर्मसार होते हों, वही खबरें इन पाशविक वृत्ति संपन्न इंसानों को नई ऊर्जा देती हो, नए औज़ार से लैस होकर ये बस बलात्कार करने का मौका तलाशते हों। यही वजह है कि किसी स्त्री को देखते ही सारी सभ्यताओं को तिलांजली देकर ये पुरुष अपने आदिम बर्बर रूप में आ जाते हैं जहां से स्त्री इन्हें केवलमात्र भोग्या के रूप में दिखाई देती है। सोचनेवाली बात है कि स्त्री-अनुभूति, स्त्री-संवेदना को दरकिनार कर स्त्री को केवलमात्र भोगवादी दृष्टि से देखने की यह आदिम प्रवृत्ति आई कहां से? क्या इसके लिए हम अशिक्षा को जिम्मेदार ठहराए? लेकिन बलात्कार जैसे अपराध तो एक बड़े शिक्षित समूह द्वारा भी निष्पन्न किए जा रहे हैं। फिर क्या हमारी शिक्षा-व्यवस्था में समस्या है? लेकिन ये समस्या आई कहां से? इसके कारण की पड़ताल करेंगे तो पता चलेगा कि इसके लिए सदियों से चली आ रही पितृसत्ताक विचारप्रणाली और पुसंवादी विचारबोध जिम्मेदार है जिसने समाज में उपभोग के अलावा किसी और रुप में स्त्री को देखने-समझने का मौका नहीं दिया। स्त्रियों के भोगवादी रूप को लगातार सामने रखा लेकिन एक इंसान के रूप में स्त्री की उपस्थिति को कभी दर्ज नहीं क्या गया, यही कारण है कि स्त्री-अस्मिता का विकास नहीं हो पाया। स्त्री-वजूद को सख्त बेड़ियों में बांधकर उसके स्त्री-अस्तित्व के मूल्य को बेहद संकुचित कर दिया गया।
ये हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि टेलीविज़न पर बलात्कार जैसी घटनाओं की अहर्निश निंदा हो रही है, बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों को केंद्र में रखकर विभिन्न बुद्धिजीवियों के बीच सवांद आयोजित किए जा रहे हैं, सोश्यल साइट्स में बलात्कार के खिलाफ़ खूब लेख लिखे जा रहे हैं, बलात्कार-पीड़िता के प्रति संवेदनावाक्य प्रकट हो रहा है, बलात्कार के अपराधी पर तीखे शब्दबाण बरसाए जा रहे हैं लेकिन बलात्कार है कि रुकने का नाम नहीं ले रहा। रुकना तो दूर की बात, बलात्कार नए-नए रूपों में, नए-नए तरीकों में, नए-नए औज़ारों के साथ, नित्यनूतन परिवेश में हर दिन दाखिल हो रहा है और हमारे देश की समाज-व्यवस्था की अक्षमता और असुरक्षा को जाहिरजहान कर रहा है। स्त्रियों के सामने नई-नई चुनौतियां उछाल रहा है और स्त्री-सुरक्षा को कठघरे में खड़ा कर रहा है।
हाल की परिस्थितियां यह सोचने पर मजबूर कर रही है कि हमारे देश की सरकारें(केंद्र और राज्य) बलात्कार को रोकने में नाकाम हैं। बलात्कारियों को तुरंत सज़ा देने में भी असमर्थ हैं। निर्भया कांड को हुए दो साल पूरा हुआ लेकिन आज भी बलात्कार की घटनाएं नहीं थम रही। देश में स्त्रियां आज भी सुरक्षित नहीं है, सम्मान की नजर से नहीं देखी जा रहीं। ऐसी अवस्था में प्रशासन या सरकार से किसी भी प्रकार की अपेक्षा रखना बेमानी है। अभी ज़्यादा ज़रूरी है कि स्त्रियां मानसिक रूप से मज़बूत हों। राह चलते समय स्त्रियों को अपनी बुद्धि-विवेक का भरपूर प्रयोग करना होगा जिससे आने वाले खतरों को भांपकर उसी अनुसार कदम उठाया जा सके। अगर जरूरत पड़े तो कानून की हर तरह से मदद ली जाए। स्त्रियों को अपने दिल-ओ-दिमाग़ में यह साफ़ रखना है कि उन्हें अपना रास्ता खुद निकालना है, कोई और नहीं है जो उनकी मदद करे। इस दैनंदिन संघर्ष को जीवन का अंग मानकर, जीवन जीने का तरीका मानते हुए स्त्रियों तो आगे कदम बढ़ाना है।


Wednesday, 9 April 2014

किसानों की आर्थिक बदहाली और फलस्वरूप ‘आत्महत्या’ – सारदा बैनर्जी

           
देश में किसानों की आर्थिक बदहाली और उसके परिणामस्वरूप उनकी आत्महत्या की घटनाएं पिछले दो दशकों से एक बहुत बड़ी चुनौती के रुप में सामने आया है। यह बेहद परेशान करने वाली घटना है कि देश का प्रमुख उत्पादक वर्ग एवं देश की अन्नदाता शक्ति गरीबी और आर्थिक तनाव का बुरी तरह से शिकार हैं और इसकी मार को झेलने में असमर्थ, लगातार आत्महत्या के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा रह गया है।



ध्यानतलब है कि सन् 1990 से किसानों की आत्महत्या की खबरों ने लगातार समाचारों में जगह बनाई है। सर्वप्रथम महाराष्ट्र से किसान आत्महत्याओं की खबरें सामने आई। इसके बाद भारत के विभिन्न राज्यों से लगातार आत्महत्या की घटनाएं दर्ज होती गईं। एन.सी.आर.बी. (नैशनल क्राइम रेकार्ड्स ब्यूरो) के मुताबिक सन् 1995 से सन् 2010 तक भारत में कुल 256,913 किसानों ने आत्महत्याएं की हैं।
भारत के अंतर्गत महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, कर्णाटक, केरल और पंजाब जैसे राज्यों में किसान-आत्महत्याएं ज़्यादा हुई। नैशनल क्राइम रेकार्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक सन् 2006 में अकेले महाराष्ट्र में 4,453 किसानों की आत्महत्या की घटनाएं हुई जो देश में हुई कुल आत्महत्याओं(17,060) की संख्या का एक-चौथाई हिस्सा था। सन् 2008 में भारत में कुल किसान-आत्महत्याओं की संख्या 16,196 थी तो सन् 2009 में बढ़कर 17,368 हो गई। सन् 2010 में यह संख्या 15,964 हुई। सन् 2011 में यह संख्या 14,027 दर्ज हुआ। सन् 2013 में यह संख्या घटकर 11,700 दर्ज हुआ। सन् 2014 में 5,642 दर्ज हुआ।एन. सी. आर. बी. के अनुसार भारत में हर दिन 46 किसान आत्महत्या करते हैं। इन राज्यों के अतिरिक्त पश्चिम बंगाल जिसे ‘राइसबोल ऑफ़ ईस्ट’ कहा जाता है, में भी किसानों ने बड़े पैमाने पर आत्महत्याएं की है जिनमें से अधिकतर किसान बर्धमान जिले से संबंधित हैं। बैंकों से लिए गए उधार का ब्याज चुकाने में असमर्थ तथा अपने पैदावार के अत्यधिक कम मूल्यों से परेशान होकर इन किसानों ने अपने प्राण त्याग दिए। इनके अतिरिक्त छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में भी आत्महत्या की घटनाएं हुई।

सन् 2002 में कारगिल(Cargill) और मॉनसैन्टो(Monsanto) कंपनियों ने भारतीय बाज़ार में जी.एम. बीज का प्रचार किया। ये सर्वप्रथम गुजरात में प्रयुक्त हुआ, धीरे-धीरे ये बाज़ार में फैलता गया और देशी कपासों की तुलना में जेनेडिकली निर्मित बी.टी. कपासों (Bt cotton) का प्रयोग ज़्यादा होने लगा। इन्हें कंपनियों से खरीदने में किसानों को भारी कीमतें चुकानी पड़ती है। उदाहरण के लिए, सन् 1991 में किसानों को देशी कपास का बीज 6 रुपया प्रति किलो की दर से प्राप्तहोता था लेकिन सन् 2014 में बी.टी. कपासों का वही बीज 4500 रुपया प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है। इससे किसानों की सुविधाओं का अनुमान किया जा सकता है। दूसरी समस्या, इन बीजों की उपज के लिए सिंचाई की ज़रूरत होती है यानि ज़्यादा पानी की ज़रूरत होती है, ज़्यादा कीटनाशकों और उर्वरकों की ज़रूरत होती है लेकिन पैदावार उस तुलना में कम ही होता है हालांकि इन्हें बाज़ार में प्रचार करते समय ये कहा गया था कि इसके पैदावार की संख्या देशी कपासों की तुलना में कई गुणा अधिक होगा। तीसरी समस्या, सिंचाई की सुविधा कमसंख्यक किसानों के पास है। अधिकांश किसान फसलों के लिए बरसात के पानी पर ही निर्भर रहते हैं। वर्तमान में जलवायु में आए विभिन्न बदलावों के कारण अक्सर बारिश ठीक से न होने से या सूखा हो जाने के कारण फसल मुरझा जाते हैं या मर जाते हैं, इससे किसानों की व्यापक हानि होती है। किसान ऋण की चपेट में आ जाते हैं और इस कर्ज को चुकाने का कोई वैकल्पिक माध्यम उनके पास नहीं होता। फलतः कोई उपाय न देख वे आत्महत्या की शरण लेते हैं। इसके अतिरिक्त पंजाब में किए गए एक शोध से ये भी पता चला है कि पंजाब के कई इलाकों में किसानों को कीटनाशकों के प्रयोग का सही मात्रा का कतई अनुमान नहीं है। फलतः वे अत्यधिक मात्रा में इन विषाक्त रसायनिकों का प्रयोग करते हैं जो कई बार उनकी मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार ठहरता है। इस तरह की घटनाएं आंध्र प्रदेश में भी देखने को मिली है, खासकर कपास-उत्पादक किसान इसके शिकार हुए हैं क्योंकि कपास के उत्पादन में कीटनाशकों की ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है।



बैंकों की सुविधाओं का न होना भी किसानों के लिए एक बड़ी मुसीबत है। सन् 1993 से ही बैंकों की ग्राम्य शाखाएं बंद कर दी गईं और शहरी इलाकों में जाकर शाखाएं खोली गई जहां विकास और प्रौद्योगिकी की सुविधाएं उपलब्ध थी। इससे किसानों और गांववासियों को निश्चित तौर पर असुविधाओं का सामना करना पड़ा। इधर गांवों में जो चंद बैंक बचे थे और हैं, वे किसानों को उधार नहीं देना चाहते। किसानों को हाई-टेक बीज और रसायन की खरीददारी के लिए सरकारी सुविधा के अभाव में गैर-सरकारी साहूकारों से उधार लेना पड़ता है और ये लोग अत्यधिक ब्याज-दर मांगते हैं। जायज़ है इन उधारों को लेने के चक्कर में कोई उपाय न देखकर किसान अपनी ज़मीन गिरवी रख देते हैं। अब अगर फसल खराब होते हैं तो किसानों का सब कुछ तबाह हो जाता है। न फसल बिकती है और न कर्ज चुकाने का कोई उपाय ही बचा रहता है। फलतः उन्हें न चाहते हुए भी साहूकारों का नौकर हो जाना पड़ता है। अंततः चिंताओं का बोझ सहन करने में असमर्थ होकर ये किसान कीटनाशक खाकर अपना प्राण स्वाहा कर देते हैं।


जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी तो उन्होंने किसानों की विविधमुखी समस्याओं को देखते हुए महाराष्ट्र के ‘विदर्भ’ इलाके में दौरा किया और केंद्र सरकार की तरफ़ से 110 अरब के आर्थिक पैकेज की घोषणा की। आत्महत्या करने वाले किसानों के घरों को भी एक-एक लाख रूपए देने की घोषणा हुई। यहां तक कि भारत सरकार ने पूरे देश के किसानों के कर्ज माफ़ कर दिए गए ताकि कर्ज के बोझ से पीड़ित किसानों को आत्महत्या से किसी तरह रोका जाए लेकिन देखा गया कि इसके बाद भी आत्महत्याओं की संख्या में कोई खास कमी नहीं आई। सवाल ये है कि सिर्फ कर्ज माफ़ कर देने भर से ही क्या किसानों की ज़िंदगी में परिवर्तन आता है? जवाब है, नहीं। किसानों के जीवन की चौतरफा समस्याएं हैं जिन्हें समझने की ज़रूरत है। सर्वप्रथम ज़रूरी शर्त ये है कि किसानों के कर्ज़ को माफ़ करने के साथ ही साथ फसलों के लिए नई रकम किसानों को दे दी जाए जिससे फसल उगाने के लिए जिस कीमत की ज़रुरत होती है उसे उपलब्ध करने में किसानों को दिक्कत न हो। साथ ही पैदावार फसलों को सरकार खरीदने की व्यवस्था करे चाहे फसल अच्छी हो चाहे खराब। यदि अच्छे फसलों को कंपनियां खरीदती है और खराब पैदावार को छोड़ देती है तो इसमें भी नुकसान किसानों का ही होता है, फिर जाहिरा तौर पर ये कदम अप्रत्यक्ष तौर पर किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर करता है।


किसान जिस गांव में रह रहे हैं वहां उनकी चिकित्सा के लिए सुलभ व अच्छे चिकित्सालय का प्रबंध हो तथा केंद्र सरकार की ओर से वहां निःशुल्क चिकित्सा की व्यवस्था की जाए अन्यथा दवाइयों का खर्च उठाते-उठाते किसान आर्थिक तंगी के शिकार हो जाते हैं और आर्थिक बोझ को झेलते हुए प्राण त्यागने के अलावा उनके पास कोई दूसरा उपाय नहीं होता। अगर चिकित्सालय दूर हैं तो जाने-आने का खर्च झेलना भी साधारण किसान परिवार जिसकी आमदनी 2500 रूपए हो, के लिए कष्टदायक है। इसलिए गांव में ही अच्छे निःशुल्क चिकित्सालय का होना निस्संदेह ज़रूरी है।  


किसानों के बच्चों की पढ़ाई की दिशा में भी हमें निःसंदेह सोचना चाहिए। किसान के बच्चे गांव में ही पढ़ पाएं और उन्हें दूर तक न जाना पड़े इसके लिए ज़रूरी है कि गांव में ही अच्छे स्कूलों की व्यवस्था हो तथा ऐसे स्कूलों में अच्छे शिक्षकों की नियुक्ति की जाए। आम तौर पर देखा गया है कि गांवों के स्कूल बदतर हालात में पड़े रहते हैं, वहां न अच्छी शिक्षा-व्यवस्था होती है न अच्छे शिक्षक। ऐसी अवस्था में किसानों के बच्चे दूर-दराज के शहरों में शिक्षार्थ जाते हैं लेकिन समस्या यहीं से शुरू होती है। बच्चों की सवारी का खर्च उठाना किसानों पर भारी पड़ता है जिसके फलस्वरूप वे बच्चों को पढ़ाना छोड़ देते हैं। फलतः किसानों का भविष्य अंधकायमय हो जाता है। वह बच्चा जो भविष्य में किसान परिवार में वैकल्पिक आमदनी का बड़ा श्रोत हो सकता था, खर्च के बोझ के चलते उसकी पढ़ाई बीच में ही रोक दी जाती है। इसीलिए स्कूलों की समस्या और किसानों के बच्चों की पढ़ाई की ओर सरकार को खास तौर पर ध्यान देना चाहिए। 

हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि खेतों के आसपास के इलाकों में पेय पदार्थों का कारखाना न खोला जाए। कारण इस तरह के कारखानों के लिए बड़े पैमाने पर पानी की ज़रूरत होती है और ये पानी जाहिरा तौर पर गांव के तालाबों से ही खींचा जाता है। अगर पेय पदार्थों के लिए गांव में उपलब्ध पानी का भंडार प्रयोग में लाया जाएगा तो खेतों में प्रयोग किए जाने वाले पानी में स्वाभावतः कमी आएगी। इससे पानी का स्तर नीचे चला जाएगा। हरियाणा और पंजाब में इस तरह की समस्या से दो-चार होना पड़ा है जहां जलस्तर नीचे चला गया है और इसकी वजह से वहां ज़मीन दर ज़मीन पानी के अभाव में बिना खेती के पड़ा हुआ है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक हरियाणा के राज्यों के अधिकतर जिलों में जलस्तर 7.29 मीटर नीचे चला गया है, जबकि महेंद्रगढ़ इलाके में यह 19.45 मीटर और फतेहबाद में 15.79 मीटर नीचे हैं।[5]

इस प्रकार हम देखते हैं कि किसानों में हो रही आत्महत्याओं के मूल कारण ये हैं— कर्ज का बोझ, नए बीजों के ऊंचे मूल्यों के कारण उन्हें खरादने में परेशानी और फलस्वरूप कर्जगीर होना, अर्द्ध शुष्क इलाकों में खेती की समस्या, कृषि से कम आय, खराब फसलों के बिक्री की समस्या, वैकल्पिक आय के माध्यमों का अभाव, बैंक की सुविधाओं का न होना, अच्छे स्कूलों व चिकित्सालयों का अभाव।



किसान जो देश का प्रमुख उत्पादक वर्ग है, उनको आत्महत्या से रोकना और उन्हें हर संभव मदद करना केंद्र व राज्य सरकार का दायित्व व अहम कर्तव्य बनता है। अगर किसानों की समस्याओं की ओर से हम आंख फेर लेंगे तो देश का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। देश का पूंजीपति वर्ग जब पांच सितारा होटलों में बैठकर अच्छा खाना खा रहे होते हैं या फिर महंगे कपड़े पहनकर बड़ी-बड़ी सभाओं में हिस्सा ले रहे होते हैं, घर में चैन की नींद ले रहे होते हैं उस समय गरीब किसान दिन-रात कड़ी धूप में अक्लांत परिश्रम करके खद्य उत्पादन में लगा रहता है, वस्त्र उत्पादन के लिए जी-तोड़ मेहनत करता है लेकिन अंत में कष्ट और दुख के अलावा उसे कुछ नसीब नहीं होता। चुनाव के समय सारे दलों के प्रत्याशी बड़े बड़े प्रलोभनों और वायदों के साथ गांवों में दौरा करते हैं और भोले-भाले किसान परिवारों को यह आश्वासन देते हैं कि अगर उनकी सरकार बनती है तो किसानों की अवस्था में आवश्यक सुधार कर देंगे लेकिन चुनाव के बाद कौन किसान और कौन परिवार, अगले पांच साल तक फिर उन नेताओं को गांव के आसपास फटकते नहीं देखा जाता।

सोचने का विषय ये है कि इस महनतकश वर्ग को अगर असहाय अवस्था में तकलीफ़ भरी ज़िंदगी जीने के लिए छोड़ दिया जाए और आत्महत्याओं को रोकने के लिए सरकार कोई खास कदम ना उठाए तो वह दिन दूर नहीं जब हम दाने-दाने के लिए तरस जाएंगे। अगर दिन-व-दिन किसान खुदकुशी का पथ चुन लेंगे तो फिर किसानों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज होगी और ये सिलसिला शुरु हो गया है और जाहिरा तौर पर यह देश के लिए बहुत शुभ-संवाद नहीं माना जा सकता। इसलिए ये बेहद ज़रूरी है कि किसानों की अवस्था में ज़रूरी बदलाव आए और किसान खुश हों। जिन सुविधाओं के साथ आम जनता जी रही है किसानों को भी उन सारी सुविधाओं का हक बनता है। ये बदलाव तभी संभव है जब किसानों की बेहतर परिस्थिति की ओर सरकार ध्यान दें। उन्हें ऋणमुक्त किया जाए, उन तक सारी सुविधाएं पहुंचे। ये बेहद ज़रूरी है कि सरकार देश की जमा पूंजी में से एक मोटी रकम किसानों पर खर्च करें, किसान परिवारों को खुशहाल रखने की ओर नज़र डालें।





[1] . http://agrariancrisis.in/2011/12/20/ncrb-all-india-figure-1995-2010-256913-farm-suicides/
[2] . http://en.wikipedia.org/wiki/Farmers'_suicides_in_India
[3] . http://agrariancrisis.in/2011/12/20/ncrb-all-india-figure-1995-2010-256913-farm-suicides/
[4] . http://archive.indianexpress.com/news/2.90-lakh-farmers-committed-suicide-during-19952011-govt/995981/
[5]. http://timesofindia.indiatimes.com/india/Groundwater-levels-depleting-fast-in-Haryana/articleshow/15611030.cms

पुस्तक और अवसरवाद

  मध्यवर्ग में एक अच्छा खासा वर्ग है जो पुस्तकों को 'शो-केस' में सजाकर अन्य को प्रदर्शित करना पसंद करते हैं। लेकिन अपने ही शो-केस से...