Sunday, 11 November 2012

स्त्री और कृष्ण-चरित्र – सारदा बनर्जी


             


क्या कारण है कि स्त्रियों में मिथकीय नायकों में राम की अपेक्षा कृष्ण ज़्यादा पॉप्यूलर हैं ? कृष्ण को लेकर स्त्रियों में जितनी फैंटेसी, प्रेम और उत्सुकता दिखाई देती है उतनी उत्सुकता राम को लेकर नहीं। कृष्ण को लेकर सुंदर कल्पनाएं करने, कथाएं रचने और चर्चा करने में स्त्रियां जितनी रुचि लेती हैं उतनी राम-कथा में नहीं। वजह यह है कि स्त्रियां लिबरल चरित्र को ज़्यादा पसंद करती हैं और उसे अपने निजी जीवन में अहमियत भी देती हैं।कृष्ण चरित्र में स्त्रियों को स्त्री-मुक्ति की भावना दिखाई देती है, इस चरित्र में उन्हें स्त्री-अस्मिता का बोध होता है। कृष्ण का चरित्र मुक्त विचार, मुक्त सोच, मुक्त क्रिया और मुक्त जीवन को प्रधानता देता है। यही कारण है कि कृष्ण और कृष्ण-कथा स्त्रियों को ज़्यादा अपील करता है।
आज स्त्रियां जीवन और समाज में अपनी आइडेंटिटी को लेकर काफ़ी सचेत हैं। साथ ही वे समाज से स्व-मर्यादा और स्व-सम्मान भी चाहती हैं और यह सम्मान का बोध उन्हें समाज रुपी कृष्ण-चरित्र में महसूस होता है।कृष्ण के चरित्र की ख़ासियत यह है कि वह स्त्री-मुक्ति का पक्षधर है। वह स्त्रियों के अस्तित्व को चलताऊ ढंग से नहीं देखता बल्कि उसे विशेष मर्यादा देता है, हर एक स्त्री की व्यक्तिगत इच्छाओं और मनोदशाओं को खास सम्मान करता है। यह चरित्र संपर्क में रहने वाली हर स्त्री की प्राय हर एक इच्छा को पूर्ण करता है। हर छोटी बात को अनुभूति के धरातल पर समझता है। स्त्रियां इस उदार चरित्र से स्वभावत: आकर्षित होती हैं और कृष्ण में अपने आदर्श पुरुष को देख पाती हैं। यही वजह है कि कृष्ण-राधा की कथाओं की विभिन्न कल्पनाओं में स्त्रियों को जितना आनंद मिलता है उतना राम-सीता की कहानियों में नहीं। फैंटेसिकल चिंतन में भी कृष्ण एक उदार चरित्र के रुप में स्त्री-हृदय में व्याप्त है।
कृष्ण के चरित्र की दूसरी विशेषता उसका हंसमुख स्वभाव है।चाहे सीरियल हो चाहे फिल्म हर जगह कृष्ण का चरित्र एक सुंदर हंसी के साथ सामने आता है। स्त्रियों को इस हंसमुख स्वभाव से बेहद प्यार है।सदियों से अपने हक के लिए लड़ रही स्त्रियां पुरुषों से केवल अच्छा व्यवहार और एक स्वस्थ हंसी ही चाहती हैं और वह भी उन्हें नहीं मिलता। कृष्ण का मनमोहक रुप और उससे झर-झर निसृत सुंदर हंसी कहीं न कहीं स्त्री-हदय को मुग्ध करता है।
देखा जाए तो राम का चरित्र भी स्त्री को पर्याप्त सम्मान करता है और वह एकपत्नी-व्रत चरित्र भी है फिर भी क्या वजह है कि स्त्री-हृदय में राम की अपेक्षा कृष्ण-चरित्र ही ज़्यादा छाया हुआ है। हो सकता है सीता की अग्निपरिक्षा जैसी मार्मिक घटनाओं से स्त्रियां कहीं न कहीं आहत होती हैं और राम के चरित्र को नापसंद करती हैं या राम के चरित्र से उन्हें घोर शिकायत है। ध्यानतलब है कि स्त्रियां उस चरित्र को ज़्यादा पसंद करती हैं जो समाज की परवाह न करें, जो केवल अपने हृदय की बात मानें, स्त्री-हृदय को पढ़ें, उसे सम्मान करें और ये सारे गुण प्रकटत: कृष्ण-चरित्र में है।
कृष्ण के चरित्र की तीसरी विशेषता है उसका सखा-भाव या कहें उसका फ्रेंडली एटीट्यूड। स्त्रियां आम तौर पर अपने संपर्क के हर एक पुरुष में फ्रेंडली एटीट्यूड को चाहती है, पुंसवादी रवैया और दमनात्मक व्यवहार बिल्कुल नहीं चाहती। कृष्ण–चरित्र में मेल शोवेनिस्टिक एटीट्यूड एक सिरे से गायब है। वहां स्त्री-पुरुष में मित्रता का संपर्क है चाहे उम्र में कितना भी फर्क हो। कृष्ण-कथा में कृष्ण जिन स्त्रियों के संपर्क में रहते हैं, बात करते हैं सबसे उनका फ्रेंडली रिलेशन दिखाई देता है। स्त्रियां भी अपनी व्यक्तिगत पीड़ाएं और आंतरिक अभिलाषाएं कृष्ण से शेयर करती हैं। वैसे देखा जाए तो स्त्रियों की व्यक्तिगत बातों और पीड़ाओं को राम के चरित्र ने भी सुना और समझा है लेकिन राम के चरित्र में फ्रेंडली एटीट्यूड का अभाव दिखाई देता है। यही वो जगह है जहां कृष्ण स्त्री-मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में पॉज़िटिव रुप में सामने आते हैं।
राम और कृष्ण दोनों ही चरित्रों में दुष्ट-दलन की शक्ति, शत्रु-निधन-क्षमता इत्यादि गुण देखे जाते हैं। लेकिन दिलचस्प है कि स्त्रियों को इन गुणों से कोई लगाव नहीं है। कारण यह है कि शक्ति, शौर्य आदि से स्त्री आकर्षित नहीं होती। स्त्री सर्वप्रथम विनम्र व्यवहार से मुग्ध होती है जो कृष्ण और राम दोनों चरित्रों में मौजूद है। साथ ही स्त्री सम्मान व मर्यादा की आकांक्षी होती है। वह पुंसवादी रवैया तो बिलकुल नापसंद करती है। पुंस-व्यवहार में वह हमेशा अपने लिए रेस्पेक्ट को खोजती है। सबसे अहम है वह अपने लिए स्पेस चाहती है और कृष्ण के चरित्र की यह खासियत है कि वह स्त्रियों को पर्याप्त स्पेस देता है। स्त्री-अनुभूति को महत्व देता है। फलत स्त्रियों के लिए कृष्ण का चरित्र जितना आत्मीय है उतना राम का नहीं है। कृष्ण के चरित्र से स्त्रियों की जितनी रागात्मकता है उतनी राम के चरित्र से नहीं। इसलिए स्त्रियों में कृष्ण जितने पॉप्यूलर हैं उतने राम नहीं।   


Friday, 12 October 2012

राजनीति में स्त्री दिलचस्पी की कमी – सारदा बनर्जी


                                
आम तौर पर देखा गया है कि स्त्रियों में राजनीति के प्रति दिलचस्पी बेहद कम होती है। स्त्रियां राजनीति पर बात करना, चर्चा या आलोचना करना कतई पसंद नहीं करतीं। वे दूसरे अनेक रोचक विषयों पर जमकर बात करती हैं, आलोचना करती हैं पर राजनीति से कोसों दूर रहती हैं। उसे ‘बोगस’ विषय समझती हैं। बहुत कमसंख्यक स्त्रियां हैं जो देश में घट रहीं दैनंदिन राजनीतिक गतिविधियों में दिलचस्पी लेती हैं और विभिन्न घटनाओं की खबर और जानकारी रखती हैं। यह भी देखा गया है कि इन राजनीतिक खबर रखने वाली स्त्रियों को अन्य स्त्रियां आश्चर्य भरी नज़रों से निहारती हैं। उनका भाव ऐसा होता है कि ‘ये भी कोई सुनने, देखने और समझने की चीज़ है ?’ पेइंग-गेस्ट या हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों में फिल्मी गानों ,फिल्मों, सीरियलों को देखने की होड़ लगी रहती है। इस बीच यदि कोई लड़की न्यूज़ सुनने की ज़िद कर बैठे तो वहां मौजूद दूसरी लड़कियां विरक्ती भाव से उसे देखती हैं। अगर राजनीतिक मुद्दों पर बातचीत छेड़ी जाए तो स्त्रियां उसे एवोएड करती हैं या कहती हैं, ‘पॉलिटिक्स बहुत खराब चीज़ है’ या कहती हैं, ‘कोई नेता या नेत्री क्या देश के लिए कुछ कर रहे/रही हैं ?’ बात कुछ हद तक सही है लेकिन सोचने की बात है कि क्या बिना देश की राजनीति को जाने, राजनीतिक गतिविधियों को समझे, राजनैतिक इतिहास की जानकारी रखे सिर्फ ऊपरी कमेंट पास करना ठीक है? क्या दैनंदिन राजनीतिक हरकतों की जानकारी रखे बगैर देश-सुधार या राज्य-सुधार पर विचार हो सकता है? क्या संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों की जानकारी के बिना संवैधानिक अधिकार अर्जित करना संभव है? कतई नहीं।
घर-घर में स्त्री-अत्याचार आज एक आम विषय है।यह भी सच है कि स्त्रियां इन अन्यायों, अत्याचारों और अपमानों को आए दिन घुट-घुट कर झेलती रहती हैं। एक ऐसा वर्ग है स्त्रियों का जो अपने संवैधानिक अधिकारों से एकदम अनजान है।उन्हें यह पता ही नहीं कि वे अपने अत्याचार का प्रतिरोध कर सकती है, उन्हें कानूनी सहायता मिल सकता है। इस अनजान रुख का बहुत बड़ा कारण है राजनीतिक ज्ञान का अभाव। दूसरी ओर जो स्त्रियां अपने संवैधानिक अधिकारों से वाकिफ़ हैं भी वे जीवन में कोई भी पुख्ता कदम उठाने से डरती हैं। स्त्रियों के मन में बैठे इस डर, इस अज्ञानता का बहुत बड़ा कारण उनके राजनीतिक ज्ञान या शिरकत की कमी है। लेकिन कभी किसी पुरुष को कोई राजनैतिक या संवैधानिक कदमों को उठाते हुए डरते नहीं देखा जाता क्योंकि पुरुष जमकर देश की राजनीतिक गतिविधियों में बराबर दिलचस्पी लेते रहे हैं, हिस्सा लेते रहे हैं।
स्त्री-अपदस्थीकरण का एक बहुत बड़ा कारण स्त्रियों का राजनीति के प्रति रुचि का अभाव है। यह कटु सत्य है कि भारत में अधिकतर स्त्रियां चुनाव के समय अपने मन-पसंद उम्मीदवार को वोट नहीं देतीं। वो अपने पति या पिता द्वारा कहे(समझाए) गए उम्मीदवार को ही वोट दे आती हैं। कारण अधिकांश स्त्रियां राजनीति सुनती ही नहीं, ना फ़ोलो करती हैं। उन्हें पता ही नहीं होता कि किसे वोट दिया जाए। वोट से तुरंत पहले अपने पुंस घरवालों से सीख-समझकर कुछ ज्ञान संग्रह करती हैं और उसी आधार पर अपना वोट देना सार्थक समझती हैं। कमसंख्यक स्त्रियां हैं जो राजनीति में वास्तविक रुचि लेती हैं और अपने स्वायत्त फैसले रखते हुए उसी आधार पर वोट देती हैं। लेकिन स्त्री-मुक्ति के लिए स्त्रियों का राजनीति में दिलचस्पी लेना और राजनीति में शिरकत करना दोनों बेहद ज़रुरी है।
यह देखा गया है कि ऑफिस में या परिवार में जब पुरुष-समूह राजनीतिक विषयों पर चर्चा करने लगते हैं तो स्त्रियां अचानक चुप्पी साध लेती हैं या न्यूज़ चैनलों में राजनीतिक खबरों के आते ही स्त्रियां भाग खड़ी होती हैं। यह जो उपेक्षा का भाव है राजनीति के प्रति यही खतरनाक है।यही वह जगह है जहां स्त्रियां कमज़ोर हो जाती हैं और पुरुष स्त्रियों को मूर्ख या बुद्धिहीन समझने लग जाते हैं। साथ ही स्त्रियों को राजनीतिक-शिक्षा देते-देते स्त्रियों पर अपने पुंस आधिपत्य का विस्तार करने लगते हैं।
स्त्रियों की राजनीति में कम दिलचस्पी के कारण ही देश में स्त्रियों की राजनीति में शिरकत की भी कमी है। भारत में जिस गति में पुरुष राजनीति में शिरकत करते हैं,राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं उसी अनुपात में स्त्रियां नहीं लेतीं। इसका एक कारण यह भी है कि स्त्रियों के स्वायत्त निर्णय लेने में परिवारवालों की ओर से भी पाबंदी होती है। भारत में बड़ी स्त्री-नेत्रियाँ हाथ में गिनी जा सकती हैं, जबकि पुरुषों की एक लंबी फौज राजनीति से जुड़ा है।
स्त्री अस्मिता और स्त्री-मुक्ति के लिए यह बेहद ज़रुरी है कि स्त्रियां देश के राजनीतिक गतिविधियों में रुचि लें। उसे जानें, समझें और राजनीति में शिरकत करें। राजनीतिक विषयों पर अपने विचार रखें और उन विषयों पर कायदे से तर्क करें। इससे स्त्रियों में आत्मविश्वास का संचार होगा, उन्हें पुंस दासता से मुक्ति मिलेगी।


Saturday, 29 September 2012

स्त्री-आकर्षण का केन्द्र : अनुभूति, ताकत नहीं - सारदा बनर्जी


         
                                            
         आम तौर पर पुरुषों में यह धारणा प्रचलित रही है कि स्त्रियां पुरुषों के मर्दानगी वाले एटीट्यूड, बलिष्ठ भुजाओं वाले ताकतवर शरीर से ही आकर्षित होती हैं लेकिन यह धारणा सरासर गलत है। यहां हमें अपनी परंपरागत मानसिकता में थोड़ा फेर-बदल करना होगा। स्त्री –हृदय की पड़ताल के लिए यह बेहद ज़रुरी है कि स्त्री-मनोविज्ञान की सही रीडिंग की जाए, स्त्री-मन को सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाए। स्त्री न तो  पुंस-रुप के प्रति आकर्षित होती है, और नहीं पुंस-रंग के प्रति, नहीं उसकी दौलत के प्रति, ना पुंस-ज्ञान के प्रति और ना ही पुंस-ताकत के प्रति। बल्कि स्त्रियों को पुरुषों में व्याप्त स्त्री-मन को समझने की गहन अनुभूति-क्षमता आकर्षित करती है। पुरुषों से बात करते समय स्त्रियों की यह यथार्थ फ़ीलिंग होती है कि वह पुरुष उसकी बातों को, उसके संकट को, उसकी असुविधाओं को, उसकी छोटी-छोटी खुशियों या गमों को अनुभूति के धरातल पर समझ रहा है या नहीं। यदि उस स्त्री को यह तत्काल अनुभव हो कि वह पुरुष उसे फ़ील नहीं कर रहा तो वह तुरंत मुकर जाती है, वह उस पुरुष से कोई संपर्क नहीं रखती या फिर भविष्य में अपनी कोई बात उससे शेयर नहीं करती। यही वह जगह है जिसे पुनर्परिभाषित करने की ज़रुरत है कि स्त्री अनुभूति में होती है और स्त्री पुंस-अनुभूति ही चाहती है। उसे पुरुषों की बलिष्ठता से, उसके ताकत से, उसके गांभीर्य से कोई लेना-देना नहीं। 
दिलचस्प है कि टी.वी. में भी इसी गलत समझ के आधार पर विज्ञापन प्रायोजित किए जा रहे हैं जिसके नमूने अक्सर देखने को आते हैं।मसलन् पुरुषों के गोरेपन की क्रीम, बॉडी स्प्रे या बाइक के विज्ञापनों में बलिष्ठ ‘मसेल’(muscle) संपन्न युवकों को विज्ञापन प्रमोट करते दिखाया जाता है और उसके आस-पास सुंदर अल्पवस्त्र पहनी स्त्री या स्त्रियां उसके बदन पर विभिन्न पॉस्चर में हाथ फेरती नज़र आती हैं। साफ़ है कि इसके ज़रिए दर्शकों को यह संदेश दिया जाता है कि स्त्रियां बलिष्ठ और शक्तिशाली युवक के प्रति ही ज़्यादा आकर्षित होती हैं। इसलिए स्त्रियों को आकर्षित करने का फॉर्मूला है ताकतवर होना।
   फ़िल्मों को भी इस तरह के अप-प्रचार का खास श्रेय जाता है। मसलन् सलमान खान, ऋत्विक रोशन, शाहरुख खान, आमिर खान, सैफ-अली खान जैसे बॉलीवुड के हीरो, विलेन को मसेल-पावर के ज़रिए पटकते और हीरोइन और दूसरे कमज़ोर लोगों की सम्मान व मर्यादा-रक्षा करते दिखाया जाता है, तो दूसरी ओर ‘सिक्स-पैकस्’ द्वारा हीरोइन को प्रभावित करते भी दिखाया जाता है। हीरोइन कभी हीरो के बाहुबलि शरीर पर फ़िदा होकर उसे मदहोश नज़रों से देखती हुई गाना गाने लगती हैं तो कभी उसे छूकर आनंद लेती दिखाई जाती है।
    वास्तविकता की सही पड़ताल की जाए तो यह देखा जाएगा कि अधिकतर स्त्रियों को पुरुषों के फुले हुए भुजाओं का शरीर आकर्षित ही नहीं करता। वे तो संबंधित नायक का नायिका के प्रति कहे गए अनुभूति-प्रवण वाक्यों से, सहृदयपूर्ण व्यवहार से द्रवित होती हैं। स्त्रियों पर किए गए इस अप-प्रचार में पुंसवाद और पुंस-मानसिकता की अहम भूमिका है। इस गलत मीडिया प्रोपेगेंडा से कुछ स्त्रियां तब तक प्रभावित होती हैं जब तक वास्तविकता से परिचित नहीं होतीं। वास्तविकता का सामना करते ही स्त्रियों के सामने इस फ़ेक प्रचार का वि-रहस्यीकरण हो जाता है और स्त्रियां हकीकत को पढ़ लेती हैं। इसलिए यथार्थ जीवन में वह इस फ़ेकनेस को फ़ोलो नहीं करतीं। वह पुरुषों से कोई सुझाव नहीं चाहती, बस अपने मन को खोलने का स्पेस चाहती है। जहां उसे यह स्पेस मिलता है वहां वो सार्थक फ़ील करती है।
कॉलेज या विश्वविद्यालय में पुरुष विद्यार्थियों द्वारा भी स्त्रियों के बारे में यही मिसरीडिंग देखी जाती है।मसलन् अगर किसी लड़की से उसके फ़ेबरेट हीरो का नाम पूछा गया और उसने मशहूर हीरो ‘सलमान खान’ का नाम नहीं लिया तो अधिकतर लड़के अवाक् रह जाते हैं या उस लड़की पर अविश्वास करने लगते हैं चूंकि उनके अनुसार स्त्रियां ‘मसेल’ और ताकत-संपन्न पुरुषों से ही प्रभावित होती हैं, इसलिए अगर किसी को सलमान पसंद है तो वह ‘मसेल’ की ही वजह से और अगर नहीं है तो वह लड़की ठीक नहीं कह रहीं। यानी ताकतवर पुरुषों को ही स्त्रियों का आदर्श पुरुष होना है, अन्यथा नहीं। यह कायदे से स्त्री-मनोविज्ञान की मिसरीडिंग है। 
लेकिन हकीकत बताते हैं कि स्त्रियां उन्हीं पुरुषों के साथ रहना या खुलकर अपनी बात कहना पसंद करती हैं जो उनकी अनुभूति को समझे चाहे वो ताकतवर हो चाहे न हो। यह भी संभव है कि वह पुरुष उसका पति, पिता, भाई, रिश्तेदार, नातेदार कुछ न हो पर वह केवल हमदर्द हो जहां स्त्री मुक्ति की सांस ले, अपने मन की परतों को खोलकर रख सके। इससे स्पष्ट होता है कि स्त्री वहां होती है जहां वो मुक्त हो और अनुभूति महसूस करे।  पुरुषों का बलिष्ठ शरीर कभी भी स्त्रियों को अपील नहीं करता। ना ही स्त्री ताकतवर पुरुषों को देखकर आकर्षित और सम्मोहित होती हैं। स्त्री को यदि आकर्षित करना है तो उसके मन में स्थान पाना होगा और मन में स्थान पाना तभी संभव है जब पुरुष उसकी अनुभूति को स्पर्श करे, स्त्री-हृदय को समझे। 

Monday, 17 September 2012

स्त्री के वस्तुकरण में विज्ञापन की भूमिका –



स्त्री के वस्तुकरण में जितनी मदद विज्ञापन ने की है उतना किसी और माध्यम ने नहीं।विज्ञापन ने स्त्री के इमेज को वस्तु में तब्दील करके उसे लोकप्रिय बनाने में गहरी भूमिका अदा की है।यही वजह है कि आज स्त्री घर में प्रयोग होने वाली सामान्य वस्तुओं से लेकर खास किस्म के प्रोडक्ट को भी विज्ञापनों के ज़रिए प्रोमोट करती हुई नज़र आती है। स्त्री साबुन, शैम्पु, हैंडवाश, बर्तन, फ़िनाइल, डीओ, तेल, विभिन्न तरह के लोशन, क्रीम, टॉयलेट क्लीनर से लेकर पुरुषों के दैनंन्दिन प्रयोग की चीज़ों के विज्ञापनों में भी दिखाई देती हैं। पुरुषों के अंर्तवस्त्रों या डीओड्रेंट्स के विज्ञापनों में तो अधनंगी स्त्रियां पुरुषों के साथ एक खास किस्म के कामुक जेस्चर में प्रेज़ेंट की जाती हैं। इसका उद्देश्य होता है, स्त्रियों के कामोत्तेक हाव-भाव और सम्मोहक अंदाज़ के ज़रिए पुरुष दर्शकों को टारगेटेड विज्ञापन के प्रति आकर्षित करना और उस निश्चित ब्रांड के प्रति दर्शकों के रुझान को बढ़ाना जिससे वे उसे जल्द खरीदें।
                    यह देखा गया है कि खास किस्म के विज्ञापनों में भी स्त्री-शरीर के ज़रिए विज्ञापनों को प्रमोट किया जाता है।मसलन् मोटापा कम करने या कहें स्लिम-फिटहोने के विज्ञापन मुख्यतः स्त्री-केंद्रित होते हैं।चाहे यह विज्ञापन मशीनों द्वारा वज़न कम करने का हो या रस और फल-सेवन के उपाय सुझाने वाला लेकिन हमेशा स्त्री-शरीर ही निशाने पर रहता है। इसमें एक तरफ ज़्यादा वज़न वाली अधनंगी (बिकिनी पहनी) स्त्री पेश की जाती है तो दूसरी तरफ स्लिम-अधनंगी स्त्री। एक तरफ ज़्यादा वज़न वाली के खाने का चार्ट दिखाया जाता है तो दूसरी तरफ कम वज़न वाली का। फिर दोनों की तुलना की जाती है कि किस तरह कम वज़न वाली स्त्री मशीन के प्रयोग से या कम सेवन कर आकर्षक, कामुक और सुंदर लग रही है, दूसरी तरफ अधिक वज़न वाली स्त्री वीभत्स, अकामुक और कुत्सित लग रही है।इसलिए फलां फलां चीज़ सेवन करें या फलां मशीन उपयोग में लाएं ताकि आप भी आकर्षक और कामुक दिख सकें।
                  आजकल फेसबुक जैसे सोशल मीडिया साइट्स में भी इस तरह के विज्ञापनों का खूब सर्कुलेशन हो रहा है। इस तरह के विज्ञापनों का स्त्री को अपमानित करने और वस्तु में रुपांतरित करने में बड़ी भूमिका है। मध्यवर्ग की कुछ स्त्रियां इन विज्ञापनों से प्रभावित भी होती हैं।वे या तो मशीन का उपयोग करने लगती हैं या फिर डाइटिंग के नुस्खे अपनाती हैं।इससे स्पष्ट होता है कि विज्ञापन केवल स्त्री-शरीर ही नहीं स्त्री-विचार पर भी हमला बोलता है। वह तयशुदा विचारों को लोगों के दिमाग में थोपता है और इसमें खासकर स्त्रियां निशाने पर होती हैं।
                 यह विज्ञापनों का स्त्री-विरोधी या पुंसवादी रवैया है जो स्त्री की व्यक्तिगत इच्छाओं और आकांक्षाओं पर हमला करता है।स्त्री के शरीर को केंद्र में रखकर स्त्री को स्लिम होने के लिए प्रोवोक करना कायदे से उसे पुंस- भोग का शिकार बनाना है। स्त्री के ज़ेहन में यह बात बैठाया जाता है कि अगर वह स्लिम होगी तो वह मर्दों को आकर्षित कर पाएगी। स्त्रियों में विज्ञापनों के ज़रिए यह जागरुकता पैदा किया जाता है कि वो अपने फ़िगर को लेकर सचेतन हो, उसे सही शक्ल दें। जायज़ है कि स्त्रियां अपनी इच्छाओं को महत्व न देकर दूसरों की या कहें कि पुरुषों की इच्छानुसार अपने को ढालने की जी-तोड़ कोशिश में लगी रहती है।वह अपने को आकर्षक और कामुक लुक देने के लिए अपार मेहनत करती रहती है। धीरे-धीरे स्त्री अपनी स्वायत्त इच्छाओं के साथ-साथ अपना स्वायत्त व्यक्तित्व तक खो देती है और हर क्षण पुरुषों की इच्छानुसार परिचालित होती रहती है। अंततः स्त्री व्यक्तिकी बजाय पुरुषों के लिए एक मनोरंजक वस्तुया भोग्याबनकर रह जाती है।

                   सवाल यह है कि अधिकांश विज्ञापन स्त्री-शरीर केंद्रित ही क्यों होते हैं ? क्या स्त्री के अधोवस्त्र या निर्वस्त्र शरीर के ज़रिए विज्ञापन प्रोमोट करने पर वस्तु की मार्केटिंग में इज़ाफा होता है? क्या इससे विज्ञापन कंपनी को फायदे होते हैं? ध्यान देने की बात है कि विज्ञापनों ने स्त्री के परंपरागत रुप को तवज्जो दी है लेकिन स्त्री का आधुनिक रुप विज्ञापनों में एक सिरे से गायब है। टी.वी. विज्ञापनों में स्त्री हमेशा अच्छी खरीददार के रुप में नज़र आती हैं लेकिन उसकी निर्णायक भूमिका शून्य के बराबर होता है। वह विज्ञापनों में धड़ल्ले से विभिन्न वस्तुओं को खरीदती, प्रयोग करती नज़र आती हैं, पुरुष के फैसले पर अमल करती दिखाई जाती है जो उसका ट्रैडिशनल रुप है। किंतु उसके आधुनिक रुप को सामने नहीं लाया जाता जिसमें वह खुद फैसले लेती हो और उसे भी पुरुषों के समान अधिकार उपलब्ध हों। स्त्री के ट्रैडिशनल रुप को तवज्जो देने वाले विज्ञापन स्त्री को फिर से सामंती मानसिकता और सामंती विचारों से जोड़ने लगता है। उसे मुक्त सोच और मुक्त कार्य की आज़ादी से वंचित करता है। स्त्री के दूसरे दर्जे की पुरानी इमेज को कायम रखने में मददगार होता है।
                    बुद्धि और मेधा पर ज़ोर देने वाले विज्ञापनों में स्त्रियों की भूमिका केवल मां तक सीमित रहता है। मसलन् टी.वी. पर आने वाले विभिन्न हेल्थड्रींक्स (कॉमप्लैन, हॉरलिक्स से लेकर पीडिया-स्योर तक)के विज्ञापनों में मुख्यतः लड़कों को ही हेल्थड्रींक पीकर लंबाई बढ़ाते और मेधा का विकास कराते दिखाया जाता है। सिर्फ मां के किरदार में एक औरत अपने बेटे को हेल्थड्रींक पिलाती हुई दिखाई देती हैं। लेकिन लड़कियों को केंद्र में रखकर कभी इस तरह के विज्ञापन नहीं बनाए जाते। इन हेल्थड्रींक्स के प्रयोग से मेधा में इज़ाफा होता है या नहीं यह दीगर बात है लेकिन इस बात की पुष्टि ज़रुर होती है कि विज्ञापन स्त्रियों के उन्हीं रुपों को प्रधानता देता है जो शरीर के प्रदर्शन से संबंध रखता है, उसकी बुद्धि और मेधा के विकास से नहीं, उसकी पढ़ाई से नहीं, उसकी सर्जनात्मकता से नहीं, उसकी अस्मिता से नहीं।

                  कायदे से उन विज्ञापनों पर सख्त़ पाबंदी लगनी चाहिए जो स्त्री-अस्मिता के बजाय स्त्री शरीर को प्राथमिकता दे और स्त्री को माल में तब्दील होने में भरपूर मदद करें।यह बेहद ज़रुरी है कि ऐसे विज्ञापन लौंच किए जाएं जो स्त्री के आधुनिक रुपों को सामने लाए। स्त्री हमें मौलिक फैसले लेते हुए दिखाई दे। ऑब्जेक्टके बजाय व्यक्तिके रुप में स्त्री सामने आए।


Monday, 10 September 2012

नरेन्द्र मोदी के स्त्री- कुपोषण के पुंसवादी तर्क




 नरेन्द्र मोदी के स्त्री- कुपोषण के पुंसवादी तर्क- सारदा बनर्जी



हाल ही में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी दैनिक 'वाल स्ट्रीट जर्नल' को दिए साक्षात्कार में स्त्री-कुपोषण पर बयान दिया कि गुजराती मध्यवर्गीय औरतें स्वास्थ्य की तुलना में सुंदरता के प्रति ज़्यादा जागरुक है। उन्होंने कहा कि यदि मां अपनी बेटी से कहती है कि दूध पीओ तो वह लड़ती है और कहती है कि वह नहीं पीएगी चूंकि इससे वह मोटी हो जाएगी। यहां सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या स्त्री-कुपोषण की समस्या महज सुंदरता की समस्या है? यदि ऐसा है तो बच्चों में कुपोषण क्यों है ? आदिवासी स्त्री मध्यवर्ग में नहीं आती उनमें कुपोषण की मात्रा सबसे अधिक पाई गई है ।  इसलिए सिर्फ मध्यवर्ग को ध्यान में रखकर कुपोषण को देखना गलत है।
               आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के कुपोषण के मामले में गुजरात की स्थिति बदतर है जबकि गुजरात भारत का तेज़ी से विकास करने वाला राज्य है। 2005-2006 के दौरान हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक गुजरात में 5 साल के नीचे 45 प्रतिशत बच्चों का वज़न कम पाया गया ।  पूरे देश के स्तर पर आंकड़े के हिसाब से 52 प्रतिशत कमवज़न वाले बच्चे गुजरात से है बाकि 48 प्रतिशत पूरे देश से। जहां राष्ट्रीय औसत के हिसाब से स्त्रियों में खून की कमी का प्रतिशत 1.8 है ,वहां गुजरात में यह प्रतिशत बढ़कर 2.6 है। भारत की  मानव विकास रिपोर्ट- 2011 ,के मुताबिक गुजरात भुखमरी में 13 वें नंबर पर है यानी उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम से भी नीचे है।
               ध्यान देने की बात है कि भारत में स्त्रियों में व्याप्त कुपोषण एक गंभीर चुनौती है जिस पर चर्चा नहीं होती।इस मसले पर कभी राजनीति में चुनाव नहीं लड़ा जाता।मसलन् यदि गुजरात की समस्या पर बात करनी है तो सांप्रदायिकता की समस्या पर बहस होती है,स्त्री के कुपोषण पर नहीं। हमारे यहां स्त्री के सवाल अभी तक राजनीति के सवाल नहीं बन पाए हैं।इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में राजनीति पुंस अधिकार-क्षेत्र तक ही सीमित है।चूंकि इस बार बयान नरेंद्र मोदी का था और निकट भविष्य में विधानसभा का चुनाव होने जा रहा है, इसलिए लोगों की नज़र स्त्री-कुपोषण के आंकड़ों की ओर गई।
             नरेंद्र मोदी का बयान पुंसवादी विचारधारा को व्यक्त करने वाला बयान है। कुपोषण का यह अजीब तर्क कम से कम एक मुख्यमंत्री का नहीं होना चाहिए।देखा जाए तो कुपोषण के लिए मुख्यमंत्री और प्रशासन की नीतियां ही ज़िम्मेदार हैं।  भारतीय ज़ेहन में बैठी पुंसवादी मानसिकता ज़िम्मेदार है। कायदे से हमें स्त्री-कुपोषण की समस्या को राजनीतिक और पुंसवादी दृष्टिकोण से परे जाकर देखना चाहिए।                    
             भारत में स्त्री कुपोषण का मुख्य कारण है स्त्री का हाशिए पर रहना, पुरुष के अधीन रहना और उसका अधिकारहीन होना। भारतीय परिवार का पूरा ढांचा पुंसवादी है। परिवारवाले जन्म के बाद से ही लड़का और लड़की में अनेक तरह के भेदभाव करने लगते हैं।लड़के को स्वादिष्ट भोजन परोसा जाता है,उसका खास ख्याल रखाजाता है।इसकी तुलना में लड़की पर कम ध्यान दिया जाता है। लड़की को गृहकार्य में निपुण और लड़के को पढ़ाई में तेज़ बनाने की कोशिश रहती है।लड़कियों की पढ़ाई को महत्व नहीं दिया जाता।उन्हें चलताऊ ढंग से पढ़ाया जाता है।इससे अनेक तरह की सुविधाओं से वे वंचित रह जाती हैं।उन्हें केवल अपनी सुंदरता पर ध्यान देने की बात सिखाई जाती है जिससे बड़े होने पर लड़की की विदाई में कोई परेशानी न हो, वह लड़केवालों को तुरंत पसंद आ जाए। स्वाभाविक तौर पर लड़की खाने और पढ़ने को छोड़कर विभिन्न तरह के लेप लगाने में और रुप-निखारने में लगी रहती है। धीरे-धीरे लड़कियों के जीवन में यह भेदभाव एक अंतरंग हिस्सा बन जाता है और वह इसकी अभ्यस्त हो जाती है।
            लड़कों की तुलना में लड़कियों का खाना मात्रा और गुणवत्ता दोनों ही दृष्टि से कमज़ोर होता है।प्रायः समस्त भारतीय परिवारों में यह नियम है कि स्त्री पुरुष के बाद भोजन करती है, इसका असर यह होता है कि स्त्री अंत में बचा-खुचा खाना खाती है । अपने पति, बेटे ,बुज़ुर्ग और परिवारवालों को खिलाने के बाद उसके पास खाने को सारवान खाना कम बचता है।इसका दूरगामी असर यह होता है कि घर में परिश्रम करने वाली औरतें आगे चलकर बेहद कमज़ोर हो जाती है। आगे चलकर उनमें आयरन और कैलशियम की कमी दिखाई देती है। फलतः खून और कैलशियम की कमी के कारण हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं और वे अनेक किस्म की तकलीफों को भोगती हैं। यहां तक कि गर्भवती औरतें और दूध पिलाने वाली माताएं भी लापरवाही की ही शिकार बनी रहती हैं।न पति देखभाल करता है न ससुराल वाले।उन्हें न हीं फल खिलाया जाता है न हीं पौष्टिक खाना जिसका असर आने वाले बच्चे पर पड़ता है। यही कारण है कि भारत में कुपोषण की मात्रा बच्चों और औरतों में सबसे अधिक है।यही हाल आदिवासियों का है।                                                
         यह सही है कि मध्यवर्गीय लड़कियों का एक छोटा सा भाग है जो सुंदरता और शरीर के रख-रखाव को लेकर बेहद सचेतन है।लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात है कि सुंदरता का जो मायाजाल मोदी ने गुजराता माता के बहाने बुना है वह पुंसवादी विचारधारा ने बनाया है।पुंसवाद से जितने प्रभावित पुरुष हैं उतनी ही स्त्रियां भी। असल में स्त्री की सुंदरता का तर्क पुरुष का तर्क है, ना कि स्त्री का। स्त्री स्वभावतः सुंदर होती है। स्त्रियों के दिलो-दिमाग में यह शुरु से बिठाया जाता है कि उसे कोमलांगी, लावण्यमयी, रुपवती, तन्वी होना है ,उसके ज़ेहन में बिठाया गया है कि यही स्त्री-जनित गुण है और पुरुष इसी से आकर्षित होंगे। इस बात को और पुष्ट करने में मीडिया की भी बड़ी भूमिका है।स्त्रियों का एक छोटा भाग इसे मान लेता है और इससे आकर्षित भी होता है और कोमलांगी और सुंदर दिखने के चक्कर में वह अपने सेहत और स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देतीं।इसके दो तरह के असर हुए हैं, एक तो कम खाने की वजह से लड़कियां दुर्बल हो रही हैं। शारीरिक तौर पर दुर्बल होने के कारण वह बौद्धिक रुप से भी कमज़ोर हो जाती हैं।आए दिन उन पर हमले होते रहते हैं। दूसरी ओर उनका सामाजिक अस्तित्व भी खतरे में है।                                                
    स्त्री के कुपोषण की समस्या केवल सुंदरता की समस्या नहीं है।यह किसी एक मुख्यमंत्री की भी समस्या नहीं है क्योंकि पूरा देश कुपोषण से ग्रस्त है।प्रत्येक राज्य कुपोषण का शिकार है।यह समस्या पूरे देश में व्याप्त पुंसवादी दृष्टिकोण की देन है। इसलिए स्त्री कुपोषण की समस्या को हल करने के लिए पुंसवादी पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को बदलना पड़ेगा।पुंसवादी मानसिकता को त्यागना होगा।



Saturday, 25 August 2012

अब गुस्सा पैदा क्यों नहीं करते बलात्कार के आंकड़े


भारत में आज एक बड़ी तादाद में स्त्रियां यौन-उत्पीड़न की शिकार हैं।बलात्कार स्त्री जीवन का एक खुला सच है जिसने स्त्री-शरीर और स्त्री-मन के साथ-साथ स्त्री-जीवन को गहरे तक प्रभावित किया है। नेशनल क्राइम ब्यूरो  के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में प्रति घंटे दो बलात्कार किए जाते हैं।बलात्कार के इस संकटजनक इजाफे को देखते हुए  रेप क्राइसिस इंटरवेंशन सेंटर ने दिल्ली में 2010 के शुरु से जुलाई 2011 में हुए बलात्कारों पर दर्ज एफ.आइ.आर. का गहन अध्ययन किया।इसके दौरान यह पाया गया कि 66%  बलात्कार-पीड़ित लड़कियां बीस साल की उम्र के नीचे की हैं जिनमें 22% की उम्र दस साल के भी नीचे है।दूसरी ओर 67% बलात्कारी की उम्र बीस साल के ऊपर है।यह गौरतलब है कि बलात्कारी मूलतः पीड़ित लड़की के जाने-पहचाने होते हैं जिनमें रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त, शिक्षक और अन्य संबंधी होते हैं।बहुत कम मामलों में अपरिचितों द्वारा बलात्कार हो रहे हैं।मसलन् 58 पीड़ितों में 51 जान-पहचान के बाकी 7 अपरिचित होते हैं। ट्रस्ट लॉ वोमेन द्वारा किए गए हालिया सर्वेक्षण के अनुसार भारत स्त्रियों के लिए दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक देश है।
                          चिंता की बात यह है कि अक्सर भारत में बलात्कार-पीड़ितों को बलात्कार के उत्प्रेरक के रुप में देखा जाता है ना कि पीड़िता के रुप में।उस पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह अकेली क्यों थी,रात में असुरक्षित जगह में बाहर क्या कर रही थी, उत्तेजक और पारदर्शी कपड़े क्यों पहनी हुई थी आदि। इसका सीधा अर्थ यह है कि बलात्कार के लिए खुद लड़की, उसके कपड़े, उसका रवैय्या जिम्मेदार है।इस तरह की टिप्पणियां लोगों की पिछड़ी और रुढ़िवादी मानसिकता का बोध कराती है।इस तरह का चिंतन स्त्री अपराध को स्थायी बनाता है और स्त्री की गहरी क्षति करता है।साथ ही देश और समाज में स्त्री के लिए एक सुरक्षित माहौल बनाने में बाधक है। कायदे से बलात्कार के मामले की विस्तृत खोज होनी चाहिए।सही समय पर घटनास्थल पर पुलिस के न आने का कारण पूछना चाहिए,पीड़ित लड़की के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार होना चाहिए किंतु होता इसका उलटा है।
                           यह देखा गया है कि अधिकांश मामलों में लड़कियां निजी शर्म की वजह से बलात्कार की रिर्पोट दर्ज नहीं करातीं।किंतु यदि कोई लड़की साहस करके ऐसा करती है तो उसे बेहद खराब टिप्पणी से दो-चार होना पड़ता है।खुली अदालत में उसे बलात्कार सिद्ध करने के लिए अनेक अपमानजनक और आपत्तिजनक सवालों और कुतर्कों से गुज़रना पड़ता है। बलात्कार सिद्ध होने पर उसे समाज में हिकारत भरी नजर से देखा जाता है।कई मामलों में वह परिवार और समाज द्वारा बहिष्कृत भी होती है।यहां तक कि स्त्रियों का एक तबका है जो पानी में डूब मरोजैसी घटिया टिप्पणी बलात्कार की शिकार लड़की पर उछालता नजर आता है।  यह भारतीय स्त्रियों के जेहन में बसी कुंठित, विकृत और अवैज्ञानिक सोच को सामने लाता है।
                           अनेक समय ऐसा होता है कि बलात्कार-पीड़िता का सामाजिक स्तर निम्न होने की वजह से उसके मामले को हल्के रुप में लिया जाता है और दोषी को अल्पतम सजा सुनाई जाती है। 
                           स्वाभाविक तौर पर समाज ने स्त्रियों में असुरक्षा के भय को स्थायी बनाया है।इसका दूरगामी असर यह हुआ है कि घर में और बाहर स्त्रियों पर अनेक तरह की रोक लगायी जाती है। रात में बाहर मत रहोचुस्त और खुले कपड़े मत पहनोरात में कार मत चलाओपुरुषों से ज्यादा बात मत करो आदि सावधानी-मूलक हिदायतें दी जाती हैं।साथ ही घर से बाहर जाने की आज़ादी में हस्तक्षेप किया जाता  है।मसलन् कहां जा रही होकिससे मिलनेकब तक लौटोगीज्यादा देर मत करना जैसे सवालों के घेरे में स्त्रियां हमेशा कैद रहती हैं।
                           लेकिन सोचने की बात है कि क्या इस तरह स्त्रियों की आज़ादी पर सेंसर करके बलात्कार की घटनाएं कम हो सकती हैं ? हालांकि तथ्य बताते हैं कि बलात्कारी मूलतः जान-पहचान के होते हैं। ज्यादातर मामलों में तो रिश्तेदार ही बलात्कार के दोषी पाए गए हैं। सवाल उठता है कि तो क्या बलात्कार के डर से स्त्रियां घर में ही कैद रहें और अपनी मूलभूत संवैधानिक आज़ादी से वंचित हो उत्पीड़ित होती रहें ? कतई नहीं। यहीं पर हमें अपनी पुंसवादी मानसिकता में फेर-बदल करने की ज़रुरत है। स्त्री-सुरक्षा के लिए हमें नए और वैज्ञानिक उपायों की ओर बढ़ना चाहिए जिससे स्त्रियां निडर होकर सड़कों पर चल सकें ,बे-झिझक सार्वजनिक वाहन की सवारी कर सकें और हर एक सामाजिक सुविधा का उपभोग कर सकें।  
                           आज स्त्री-सशक्तिकरण बेहद ज़रुरी मुद्दा है। इसके लिए ज़रुरी है स्त्री-शिक्षा जिससे स्त्रियों में सचेतनता बढ़े।बलात्कार और छेड़छाड़ के विरुद्ध जो कानूनी अधिकार हैं,उनके प्रति वे सतर्क और जागरुक बनें।साथ ही स्त्रियां सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में शिरकत करें जिससे उनमें आत्मविश्वास का बोध जगे।यह भी बहुत ज़रुरी है कि लड़की के साथ परिवारवालों का मित्रतापूर्ण रवैय्या हो जिससे वे अपनी डर ,शंकाओं और चिंताओं को साझा कर सकें और आने वाले खतरों से मुक्त हो सकें।बलात्कार-पीड़िता के प्रति दुर्व्यवहार न कर उसके असुरक्षा-बोध या भय को दूर करना चाहिए जिससे वह डिप्रेशन आदि की शिकार न हो जाए।आत्महत्या की कोशिश न करे।समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता को तोड़कर एक वैज्ञानिक सोच को विकसित किया जाए जिससे आने वाले समय में स्त्रियां शारीरिक उत्पीड़न से मुक्त होकर एक सुरक्षित माहौल में खुली सांस ले सकें।अपने जीवन को मुक्त रुप से जी सकें।  

Tuesday, 7 August 2012

नोट्स आधारित पढ़ाई के खतरे



                                         





आज भारत में उच्च-शिक्षा के क्षेत्र में युवा-वर्ग में स्वायत्त पढ़ाई की अपेक्षा नोट्स आधारित पढ़ाई बेहद प्रचलन में है। कॉलेज और विश्वविद्यालय से जुड़े विद्यार्थी मूलतः पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ने के अभ्यस्त हैं।पाठ्यक्रम के बाहर के विषयों में उनकी रुचि कम है।वे पाठ्यक्रम को ही पढ़ाई मानकर चलते हैं।साथ ही ये विद्यार्थी यह भी चाहते हैं कि यह पढ़ाई कष्टसाध्य न हो और परीक्षा में नंबर भी बढ़िया आए जिससे बाद में नौकरी मिलने में कोई असुविधा न हो।फलतः कॉलेज या विश्वविद्यालय में दाखिला मिलने के दूसरे दिन से ही बनी-बनाई लेखनी या तथाकथित नोट्स जुगाड़ करने की पद्धति चलती रहती है।उसके बाद ठीक परीक्षा के कुछ चंद महीने पहले से इन नोटो को रटने की रटंत-प्रक्रिया शुरु होती है।किसी तरह से नोट्स रटकर परीक्षा के उपरांत डिग्री हासिल करना इनके जीवन का मूल उद्देश्य और मूल लक्ष्य होता है।                      
                        
                         इस दौरान कमसंख्यक छात्र-छात्राएं होतें हैं जो व्यक्तिगत श्रमसाध्य कोशिश के तहत लाइब्रेरी की ख़ाक छानकर पढ़ते हैं,हर रोज़ कक्षा में जाते हैं और खुद के लिखे लेख के आधार पर परीक्षा की तैयारी कर परीक्षा देते हैं।बाकि छात्र-छात्राएं इस कोशिश में रहते हैं कि किसी तरह पढ़ाई की लड़ाई में तेज़-तर्रार और आगे रहने वाले सीनियरों से पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाने वाले विषयों पर नोट्स उपलब्ध हो जाए। इस दौरान ये छात्र-छात्राएं अपनी सारी महनत सीनियरों की चाटुकारिता या पैरोकारी में गुज़ारते हैं।बाकि समय मौज-मस्ती में व्यतीत करने में लगे रहते हैं।कक्षा में भी ये गैर-हाजिरी लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराते हैं।                       
                          
                          इसी प्रकार आगे चलकर विभिन्न प्रतियोगितामूलक परीक्षाओं जैसे नेट, सेट और एस.एस.सी. में भी ये महान विद्यार्थी व्यक्तिगत श्रम-अर्जित पढ़ाई न कर विभिन्न जगहों से जुगाड़े नोट्स को तोते की तरह रटकर यानी रटंत पढ़ाई करके परीक्षा में उत्तीर्ण होने की जी-तोड़ कोशिश में लगे रहते हैं।इस दौरान भी इन्हें किसी भी तरह के पुस्तकालयों में पढ़ते न देखा जाता है और न किताब खरीदते।फलतः गहरे ज्ञान के अभाववश परीक्षा हॉल में भी विभिन्न तरह की गलत हरकतों मसलन् कानाफूसी कर उत्तर जानना, इशारों से दूसरों तक उत्तर पास करना,उत्तर के लिए चीट की सहायता लेना आदि में ये पारदर्शी नज़र आते हैं।दिलचस्प बात यह है कि इन हरकतों के बावजूद भी अगर ये परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं होते तो शिक्षकों पर या कॉपी जांचने वालों पर सारा दोष मढ़ देते हैं और जिस विद्यार्थी को सफलता मिलती है उसके बारे में गलत अफवाह फैलाने में लगे रहते हैं।कायदे से इस तरह की हरकतें बंद होनी चाहिए।                       
                         
                          यह समस्या प्रायः हर विषय की है चाहे वह कला का विद्यार्थी हो, विज्ञान का, वाणिज्य का या किसी और विषय का।किंतु खास तौर पर साहित्य के क्षेत्र में यह समस्या ज़्यादातर नज़र आ रहा है जहां इस तरह की विद्यार्थियों के सुंदर नमूने हैं।इन विद्यार्थियों का सीधा तर्क है – गहन अध्ययन की क्या ज़रुरत है, बने-बनाए नोट्स पढ़ो और पास करो।इससे दो चीज़ साफ होती है --- एक, विद्यार्थियों में अध्ययन करने यानी मेहनत करके पढ़ाई करने की प्रवृत्ति का लोप हो रहा है और दूसरा, ज्ञान अर्जित करने की इच्छा का व्यापक तौर पर अभाव दिखाई दे रहा है। नौकरी की हुड़दंग में लगे ये विद्यार्थी किसी भी विषय से संबंधित आधी-अधूरी जानकारी रखते हैं। डिग्री हासिल कर अपने को शिक्षित समझ अपनी अधूरी जानकारी के आधार पर पढ़ने वाले विद्यार्थियों से तर्क करते हैं।कम ज्ञान के बावजूद इनके व्यवहार में विद्वतापूर्ण अचरण भी गौरतलब है।
                            
                          किंतु यह चिंता की बात है कि यदि इस तरह की रटी-रटंत या नौकरी-आधारित पढ़ाई क्रमशः प्रचलन में आता जाएगा तो आने वाली नई पीढ़ी भी इन पूर्वजों से दीक्षा लेकर इसी ओर मुखातिब होगी।फलतः शिक्षा के स्तर में भयानक गिरावट आएगी। शिक्षा के स्तर और मूल्य में इस गिरावट का नतीजा यह होगा कि शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर से लेकर विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों के ज्ञान स्तर के अभाव का हमें हर पग पर सामना करना होगा। फलतः देश में शिक्षित अज्ञानी की संख्या में भी इज़ाफा होगा जो हर हाल में ग्रहण योग्य नहीं है। इस अज्ञान की वजह से ही आज शिक्षित होने के बावजूद युवा-वर्ग की मानसिकता में बदलाव नज़र नहीं आ रहा। शिक्षित होकर भी वे भयंकर पिछड़े और संकुचित मानसिकता के शिकार नज़र आते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं है कि व्यक्ति को तराशने में शिक्षा की बहुत बड़ी भूमिका होती है।बेहतर शिक्षा के फलस्वरुप एक बेहतर इंसान का निर्माण होता है।किंतु यदि शिक्षा डिग्री के कारण ली जा रही है और हमें आधी-अधूरी ज्ञान भेंट कर रही है तो ऐसी शिक्षा का कोई मूल्य नहीं है।इस तरह की शिक्षा से व्यक्ति में अवसरवादिता, चाटुकारिता जैसी बीमारियां घर कर जाती है और आगे चलकर भी वे अपने जीवन में इसी तरह के हथकंडे अपनाते नज़र आते हैं।। स्वाभाविक तौर पर यह एक गंभीर विवेचन का मसला बनता है चूंकि यह धड़ल्ले से समाज में फैलता जा रहा है।इसका साइड एफेक्ट है, ज्ञान में कमी और संबंधित विषय में गहराई का अभाव।
                         
                           वस्तुतः इस मामले में देश की शिक्षा विभाग की ओर से पहल बेहद ज़रुरी है।विभिन्न विश्वविद्यालयों के निर्धारित पाठ्यक्रम में बदलाव ज़रुरी है।हर दो साल के अनन्तर इस पाठ्यक्रम में बदलाव होना चाहिए।इसके साथ ही नए-नए विषयों की ओर रुझान हो और विभिन्न करेंट इश्यूज़ को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। खासकर साहित्य के क्षेत्र में विभिन्न नए उपन्यासों, कहानियों, कविताओं और आलोचनाओं को पाठ्यक्रम में फेर-बदल कर रखा जाए।हालिया दौर की सूचनाओं से छात्र-छात्राओं को अवगत कराया जाए।पाश्चात्य साहित्य में हो रहे परिवर्तन से उन्हें वाकिफ़ कराया जाए। इससे विद्यार्थियों के पढ़ने की रुचि में इज़ाफा होगा और तथाकथित ढर्रे पर चली आ रही नोट्स पैटर्न की पढ़ाई का मौका उन्हें नहीं मिलेगा।चूंकि नए विषयों पर नोट्स मिलना कठिन काम है ,अतः वे संबंधित विषयों से जुड़े विभिन्न पुस्तकों का अध्ययन करने में अपना मन लगाएंगे।इसके लिए विभिन्न पुस्तकालयों में जाकर पढ़ने की आदत होती रहेगी। पुराने घिसे-पीटे विषयों की विदाई होने पर सुधी और पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी नए अनुसंधान का मौका मिलेगा।पढ़ाई में उनकी रुचि बढ़ेगी और वे नए-नए विषयों पर आधारित शोध-कार्यों की ओर मुखातिब होंगे।






पुस्तक और अवसरवाद

  मध्यवर्ग में एक अच्छा खासा वर्ग है जो पुस्तकों को 'शो-केस' में सजाकर अन्य को प्रदर्शित करना पसंद करते हैं। लेकिन अपने ही शो-केस से...